
- करीब एक साल में मंत्री परिषद की बैठक में नहीं पहुंचा मामला
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र सरकार राज्य के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक नई कैशलेस स्वास्थ्य बीमा योजना लाने जा रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत लगभग 10 लाख कर्मचारियों- अधिकारियों को प्रति वर्ष 20 लाख तक का कैशलेस चिकित्सा उपचार निर्धारित अस्पतालों में प्राप्त कर सकेगा। लेकिन विडंबना यह है कि इस कैशलेस स्वास्थ्य बीमा के इंतजार में कर्मचारी रिटायर होते जा रहे हैं। लेकिन अभी तक बीमा का प्रस्ताव मंत्रिपरिषद में भी नहीं पहुंच पाया है।
गौरतलब है कि सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की लंबे समय से मांग थी कि उन्हें गंभीर बीमारियों के दौरान आर्थिक सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाएं मिले। सरकार ने राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों की तर्ज पर इस योजना को लागू करने का फैसला किया है। योजना के वित्तीय ढांचे के अनुसार कर्मचारियों के मूल वेतन का 1 प्रतिशत प्रीमियम के रूप में तथा पेंशन भोगियों की मासिक पेंशन का 4 प्रतिशत प्रीमियम के तौर पर काटा जाएगा। इससे लाभार्थियों को इलाज के बाद मेडिकल बिलों की रीइम्बर्समेंट के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
कर्मचारियों की चिता लगातार बढ़ा रही है
आलम यह है कि मप्र में बहुप्रतीक्षित कर्मचारी कैशलैस स्वास्थ्य बीमा योजना की प्रतीक्षा लाखों कर्मचारियों की चिता बढ़ा रही है। कारण है कि प्रदेश में निरंतर सरकारी सेवकों का रिटायरमेंट हो रहा है। धीरे-धीरे एक साल निकलने वाला है लेकिन अभी तक यह मामला मंत्री परिषद की बैठक में नहीं पहुंच पा रहा। प्रदेश के हर विभागों में कार्यरत करीब दस लाख कर्मचारियों को योजना के अंतर्गत लाभान्वित होना है। पिछले साल मई माह में मुख्यमंत्री ने मप्र राज्य कर्मचारी संघ के एक कार्यक्रम में यह घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि प्रदेश में बीमार सरकारी सेवकों के लिए कर्मचारी कैशलैस स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की जाएगी। इस घोषणा के बाद कर्मचारी तब से अभी तक कैबिनेट पर निगाह लगाये बैठे हैं, लेकिन आज तक मंत्री परिषद की बैठक में योजना से संबंधित प्रस्ताव नहीं पहुंच पाया। मप्र शिक्षक संघ के प्रांताध्यक्ष डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौर का कहना है कि कर्मचारी स्वास्थ्य बीमा योजना लागू करने की लोक सेवक प्रतीक्षा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री की घोषणा को धीरे-धीरे एक साल होने वाला है। इसलिए कर्मचारियों की भावनाओं को देखते हुए तत्काल इसे लागू किया जाना चाहिए।
अभी इलाज का भार कर्मचारियों पर
सरकारी सेवकों की चिता यह है कि वे बीमार होने पर प्राइवेट अस्पतालों में पहुंचते हैं। उपचार पर महंगी धनराशि खर्च हो रही है, लेकिन इस व्यय का भुगतान शासन की ओर से समय पर नहीं हो पा रहा है। पहले तो इलाज पर हुए खर्च के बिल विभाग से ही अनुमोदित होकर स्वास्थ्य डिपार्टमेंट पहुंचने में महीनों लग रहे हैं। जैसे तैसे यह बिल हेल्थ विभाग पहुंचते तो वहां महीनों गुजरने के बाद भी बैठकें नहीं हो रही हैं। इस कारण यह भुगतान अटक रहा है।
