कविता

  • पीयूशा विजयवर्गीय

सुनो,
तुम देख रहे हो,धीर धरे ठहरा,अनंत आकाश को चूमता यह समंदर…
क्षितिज की बाहों में समाने को आतुर ये सिंदूरी सांझ…
साहिल से मिलन की प्यास समेटे ये चंचल लहरें..
अपने नीड़ को लौटता पंछियों का ये समूह…
ये सब साक्षी हैं, मेरे हृदय के उस अधूरे कोने के…
जहां रोपा था मैंनें तुम्हारे प्रेम का एक बीज…
सींचा था उसे अपनी भावनाओं से नित हर क्षण…
तुमनें भी तो अपने निश्छल प्रेम की फुहार से भिगा दी थी मेरे मन की जमीं…
और फिर क्षण- प्रतिक्षण की प्रतिक्षा के पश्चात अंकुरित हुआ वो नन्हा पौधा…
जो प्रतीक था तुम्हारे और मेरे अंतस की उस अनुभूति का…
जो हमने महसूस की थी एक-दूजे के लिए…
लेकिन…..अब नहीं खिलते वो पुष्प तुम्हारे अपनत्व के,जो महकाते थे मेरे जीवन की बगिया…
तुम्हारे बिना मुरझा रहा है हमारा ये प्रेम वन…
व्याकुल है यहां की हर शाख,हर पात तुम्हारा स्पर्श पाने को…
तुम्ही नें तो उम्मीद की किरणों से भरा था मेरे मन का वो अंधेरा कोना…
विश्वास दिलाया था कि नहीं है बांझ मेरे हृदय की जमीन…
उसमें भी खिल सकते हैं पुष्प तुम्हारे प्रेम के…
फिर क्यूं भूल गए हो कि तुम ही तो बागबां हो मेरे….
जिसे संभालना है,संवारना है मेरे जीवन की बगिया…

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