सरकारी नौकरी में दो साल का नहीं होगा प्रोबेशन पीरियड!

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  • मप्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में 3 साल के प्रोबेशन पीरियड (परिवीक्षा अवधि) को घटाकर 2 साल करने और 70-80-90 प्रतिशत वेतन नियम को समाप्त करने के लिए सरकार तैयार नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ऐसा करने से सरकार के ऊपर बड़ा वित्तीय भार आ जाएगा। ऐसे में प्रदेश के 40 हजार सरकारी कर्मचारियों के वेतन और एरियर से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है। इसमें 3 साल के प्रोबेशन पीरियड और इस दौरान मिलने वाले 70-80 और 90 प्रतिशत वेतन के नियम को असंवैधानिक करार दिया गया था।
गौरतलब है कि 6 जनवरी को जबलपुर हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए 2019 के उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें नए कर्मचारियों के वेतन में कटौती का प्रावधान था। कोर्ट ने समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत को आधार मानते हुए आदेश दिया था कि कर्मचारियों को नियुक्ति के पहले दिन से ही 100 प्रतिशत वेतन और पिछला बकाया (एरियर) दिया जाए। इसके विरोध में प्रदेश सरकार ने सुप्रीम का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार के द्वारा दायर एसएलपी वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की ‘डिफेक्ट लिस्ट’ में हैं। डायरी नंबर 20778/2026 (सीएनआर: एससी आईएइन 010207782026) के तहत दर्ज इस मामले में रजिस्ट्री ने कुछ तकनीकी कमियां पाई हैं। सरकार के पास इन कमियों को दूर करने के लिए 90 दिनों का समय है। जब तक ये त्रुटियां सुधारी नहीं जातीं, तब तक मामले की औपचारिक सुनवाई शुरू नहीं हो सकेगी।
बढ़ेगा वित्तीय भार:  राज्य सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाने का मुख्य कारण वित्तीय भार बताया है। यदि हाई कोर्ट का आदेश लागू होता है, तो सरकार को एरियर के रूप में 400 करोड़ का भुगतान करना होगा। सरकार का तर्क है कि प्रोबेशन व वेतन की शर्तें तय करना उसका नीतिगत अधिकार है। ज्ञातव्य है कि सरकार की इस अपील के खिलाफ कर्मचारियों ने तैयारी पुख्ता कर ली है। हाई कोर्ट में जीत दर्ज करने के बाद वसीम अकरम, अमनदीप सिंह बग्गा, प्रियंका श्रीवास्तव और असद सिद्धिकी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार का पक्ष सुनने के साथ-साथ कर्मचारियों का पक्ष भी सुनेगा और बिना उन्हें सुने हाईकोर्ट के आदेश पर कोई एकतरफा रोक (स्टे) नहीं लगा सकेगा।  6 जनवरी 2026 को जबलपुर हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए 2019 के उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें नए कर्मचारियों के वेतन में कटौती का प्रावधान था। कोर्ट ने समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत को आधार मानते हुए आदेश दिया था कि कर्मचारियों को नियुक्ति के पहले दिन से ही 100 प्रतिशत वेतन और पिछला बकाया (एरियर) दिया जाए।  फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण प्रदेश के हजारों शिक्षक, पुलिसकर्मी व कर्मचारियों का एरियर व बढ़ा हुआ वेतन अटक गया है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की पहली सुनवाई पर टिकी हैं, जो सरकार द्वारा कमियां दूर करने के बाद मई में होने की संभावना है।
कमियां सुधारने के लिए 90 दिन
सुप्रीम कोर्ट के नियमों (एससीआर 2013) के अनुसार याचिकाकर्ता ( राज्य सरकार) को इन कमियों को सुधारने के लिए 90 दिन का समय दिया जाता है। यदि सरकारी वकील इस अवधि में कमियां दूर नहीं करते हैं तो मामले को जज इन चेंबर के सामने लिस्ट किया जाता है, जहां देरी के लिए जुर्माना लग सकता है याचिका खारिज भी हो सकती है। जब तक ये कमियां दूर नहीं होतीं और रजिस्ट्री केस को सत्यापित नहीं कर देती, तब तक सुनवाई किसी भी बेंच के सामने नहीं होगी। इसका मतलब है कि हाई कोर्ट का 100 प्रतिशत वेतन देने वाले आदेश पर कोई कानूनी रोक नहीं है, पर तकनीकी कारणों से किसी भी कर्मचारी को एरियर का भुगतान नहीं हुआ है। सरकार का तर्क है कि उसे अपनी भर्ती नीतियों और प्रोबेशन की शर्तों को तय करने का नीतिगत अधिकार है।

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