अब तय कैलेंडर पर ही…. लेना पड़ेगा लोन

  • आरबीआई से लोन लेन की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव
  • गौरव चौहान
लोन

मप्र सरकार के कर्ज लेने के तरीके में बड़ा बदलाव हुआ है। अब राज्य सरकारें अपनी सुविधा और जरूरत के मुताबिक कभी भी बाजार से कर्ज नहीं ले सकेंगी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नए वित्तीय वर्ष 2026-27 से कर्ज लेने की प्रक्रिया को निर्धारित कैलेंडर से जोड़ दिया है। इसी वजह से मध्यप्रदेश सरकार ने इस बार वित्तीय वर्ष की शुरुआत होते ही अप्रैल से कर्ज लेना शुरू कर दिया है। मध्यप्रदेश सरकार अप्रैल, मई और जून (अब तक) के दौरान पांच चरणों में कुल 11 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले चुकी है। अप्रैल में दो किश्तों में 4,600 करोड़ रुपए, मई में दो बार 4,600 करोड़ रुपए और जून में एक बार 1,800 करोड़ रुपए का ऋण लिया गया है। वित्त विभाग के आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2026 तक मध्यप्रदेश पर कुल कर्ज करीब 4.88 लाख करोड़ रुपए था। हालिया उधारी के बाद यह बढकऱ 4.99 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो गया है। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार का वर्ष 2026-27 का कुल बजट 4 लाख 38 हजार 317 करोड़ रुपए का है।
अब तक यदि कोई राज्य अपनी निर्धारित उधारी सीमा का पूरा उपयोग नहीं करता था तो बची हुई राशि अगले वित्तीय वर्ष की उधारी सीमा में जोड़ दी जाती थी। इससे राज्यों को भविष्य में अतिरिक्त वित्तीय लचीलापन मिलता था। नए नियम के अनुसार यदि कोई राज्य निर्धारित सीमा से कम कर्ज लेता है तो बची हुई उधारी क्षमता अगले वर्ष के लिए स्वत: समाप्त हो जाएगी। यानी बची हुई राशि लैप्स मानी जाएगी। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा राज्यों की उधारी व्यवस्था में बदलाव करते हुए जो नई प्रणाली लागू की है, जिससे कर्ज लेने का पूरा ढांचा बदल जाएगा। आरबीआई का मानना है कि राज्यों द्वारा अलग-अलग अवधि और अलग-अलग समय पर जारी किए जाने वाले बॉन्ड के कारण बाजार बिखरा हुआ रहता था। इससे निवेशकों को खरीद-बिक्री में कठिनाई होती थी और बॉन्ड बाजार की तरलता प्रभावित होती थी।
आरबीआई ने लागू की नई उधारी व्यवस्था
मध्यप्रदेश उन नौ राज्यों में शामिल है जहां पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर बेंचमार्क इश्यूएंस स्ट्रैटेजी (बीआईएस) लागू की गई है। इसके तहत राज्य सरकारों को पहले से तय कैलेंडर के अनुसार ही बाजार से कर्ज लेना होगा। यानी अब राज्य यह तय नहीं कर सकेंगे कि उन्हें कब और कितनी अवधि के लिए बॉन्ड जारी करने हैं। वित्त विभाग के अधिकारियों के अनुसार आरबीआई ने मध्यप्रदेश सहित नौ राज्यों के लिए स्टेट डेवलपमेंट लोन के तहत पायलट आधार पर बेंचमार्क इश्यूएंस स्ट्रैटेजी लागू की है। इस नई व्यवस्था के तहत राज्य सरकारों को पहले से घोषित कैलेंडर के अनुसार ही कर्ज लेना होगा। बॉन्ड केवल निर्धारित अवधियों जैसे 5 वर्ष, 10 वर्ष और 15 वर्ष के लिए जारी किए जाएंगे। निवेशकों को पहले से जानकारी रहेगी कि कब और कितनी राशि के बॉन्ड बाजार में आएंगे। वहीं कर्ज प्रबंधन अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित होगा। अब तक राज्य सरकारें अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी भी समय और किसी भी अवधि के बॉन्ड जारी कर सकती थीं, जिससे बाजार में अलग-अलग अवधि के कई छोटे बॉन्ड मौजूद रहते थे और निवेशकों को खरीद-बिक्री में कठिनाई होती थी।
मार्च में दी गई थी नई व्यवस्था की जानकारी
सूत्रों के अनुसार आरबीआई ने मार्च 2026 में मुंबई में मध्यप्रदेश समेत चयनित राज्यों के वित्त अधिकारियों की बैठक आयोजित की थी। बैठक में नई बीआईएस प्रणाली, उसके उद्देश्यों और राज्यों को मिलने वाले लाभों की विस्तृत जानकारी दी गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि नई उधारी व्यवस्था से मध्यप्रदेश समेत सभी राज्यों को अपनी नकदी जरूरतों और विकास परियोजनाओं की वित्तीय योजना पहले से अधिक सटीक तरीके से बनानी होगी। अब उधारी में मनमर्जी की गुंजाइश कम होगी और तय समय पर ही बाजार से धन जुटाना पड़ेगा। नई व्यवस्था से पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन तो बढ़ेगा, लेकिन राज्यों की वित्तीय स्वतंत्रता कितनी प्रभावित होगी, यह आने वाले वर्षों में स्पष्ट होगा। फिलहाल मध्यप्रदेश उन राज्यों में शामिल है जो इस नई व्यवस्था की पहली परीक्षा से गुजर रहे हैं।
बची हुई उधारी सीमा अब नहीं जुड़ेगी अगले साल
नए नियम का सबसे महत्वपूर्ण असर राज्यों की कर्ज सीमा पर पड़ेगा। अब तक यदि कोई राज्य अपनी निर्धारित उधारी सीमा से कम कर्ज लेता था, तो शेष राशि अगले वित्तीय वर्ष की उधारी सीमा में जोड़ दी जाती थी। इससे अगले वर्ष अधिक कर्ज लेने की सुविधा मिल जाती थी। लेकिन नए नियमों के तहत  यदि कोई राज्य निर्धारित सीमा से कम कर्ज लेता है, तो बची हुई राशि लैप्स हो जाएगी। वह राशि अगले वित्तीय वर्ष की उधारी सीमा में नहीं जोड़ी जाएगी। राज्यों को तय सीमा के भीतर ही अपनी वित्तीय योजना बनानी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि नई व्यवस्था से राज्यों की उधारी प्रक्रिया अधिक अनुशासित और पारदर्शी बनेगी। वहीं सरकारों को अपने नकदी प्रबंधन और विकास परियोजनाओं की वित्तीय योजना पहले से अधिक सावधानी के साथ बनानी पड़ेगी। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही तेजी से कर्ज लेने के पीछे भी इसी नई व्यवस्था को प्रमुख कारण माना जा रहा है।

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