अगले 50 वर्षों में खतरे में पड़ सकता है नर्मदा का अस्तित्व!

  • नदी के संरक्षण के लिए सरकार का त्रिस्तरीय फॉर्मूला नाकाफी

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र की लाइफ लाइन नर्मदा के संरक्षण के अभी तक जो भी प्रयास किए गए हैं वह नाकाफी साबित हुए हैं। ऐसे में नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए मप्र सरकार द्वारा त्रिस्तरीय फॉर्मूला (शासन, समाज और समन्वय) बनाया है जो विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की नजर में नाकाफी साबित हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बैठकों और जागरूकता से नर्मदा की निर्मलता और अविरलता सुनिश्चित नहीं की जा सकती, इसके लिए कड़े जमीनी उपाय और कड़े दंड की आवश्यकता है। दरअसल, अमेरिका के वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, यदि संरक्षण के प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो अगले 50 वर्षों में नर्मदा का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है और यह एक मौसमी नाले में बदल सकती है।
गौरतलब है कि मोहन सरकार ने नर्मदा को संकटों से बचाने के लिए प्रदेश, जिला व विकासखंड स्तर पर तीन अलग-अलग समितियां बनाने का निर्णय लिया है। दावा है, ये समितियां नर्मदा के संरक्षण की पूरी चिंता करेंगी और समय-समय पर सरकार को नर्मदा संरक्षण से जुड़े प्रस्ताव व रिपोर्ट देंगी। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नर्मदा को पहुंचाए जा रहे नुकसानों से बचने का यह पूरा इलाज नहीं है, इसके लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। यदि समग्र इलाज की चिंता समय रहते हो जाए तो अच्छा होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, नर्मदा के अस्तित्व को बचाने के लिए नर्मदा समग्र मिशन जैसी बैठकों के अलावा, कड़े पर्यावरणीय कानूनों के जमीनी अमल, अवैध रेत उत्खनन पर पूर्ण रोक और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की क्षमता बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है।  प्रदेश स्तरीय समिति का जिम्मा जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर को दिया है। वे समिति के अध्यक्ष होंगे। जबकि जिलों में समिति के अध्यक्ष कलेक्टर व विकासखंड स्तर पर अनुविभागीय अधिकारी रहेंगे। समिति को अनुश्रवण समिति नाम दिया है। समिति में नर्मदा नदी पर कार्यरत नदी संरक्षण, पर्यावरण, जैवविविधता के विषय-विशेषज्ञों के अलावा कई विभागों के अफसर भी सदस्य होंगे। समिति की बैठक प्रत्येक 3 माह में होगी।
नर्मदा नदी को बचाने ये जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि नर्मदा नदी को बचाने के लिए  नर्मदा के समग्र बहाव क्षेत्र के दोनों किनारों को विशेष क्षेत्र अधिसूचित करें। अवैध उत्खनन की निगरानी ड्रोन, सेटेलाइट समेत विभिन्न आधुनिक संसाधनों से किया जाए। अवैध उत्खनन में लिप्त पाए जान वालों के खिलाफ अलग से कड़ी सजा के प्रावधान हो। नर्मदा में जल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों, संस्थाओं, निकायों से नुकसान की भरपाई के प्रावधान हो। उद्योगों की स्थापना नदी से दूर की जाए, उनके छोड़े जाने वाले पानी की सतत निगरानी हो। जो पानी उद्योगों को दिया जा रहा है, उसके उस बदले उद्योगों से नर्मदा के कैचमेंट में जल संरक्षण के बड़े काम कराए जाए। नर्मदा की सहायक नदियों की मैपिंग हो, उनका डिजिटल रिकार्ड तैयार कर उनके संरक्षण के लिए नर्मदा नदी के संरक्षण से जुड़े सभी प्रावधान लागू किए जाए।  किनारों से जुड़े क्षेत्रों में पौधे लगाने का सरकारी खेल बंद कर व्यक्तिगत व संस्थागत रूप से प्रोत्साहन देकर पौधे लगवाए जाएं। पौधों की जीवितता के आधार पर इन संस्थाओं को भुगतान किया जाए। जिन क्षेत्रों में अवैध उत्खनन पाया जाता है, वहां के कलेक्टर, एसपी, एसडीएम, तहसीलदार के लिए अलग से दंड का प्रावधान किया जाए। नदी तंत्र को अब तक पहुंच चुके नुकसान का अध्ययन नए सिरे से देश की शीर्ष संस्थाओं से कराया जाए।
नर्मदा संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास
नर्मदा संरक्षण के लिए सरकार ने अब तक कई प्रयास किए हैं। तत्कालीन सरकार ने नर्मदा के दोनों किनारों पर करोड़ों पौधे लगाए, ये बर्बाद हो गए, नदी के दोनों किनारों का अंधाधुंध कटाव हो रहा। अवैध रेत उत्खनन बंद नहीं हुआ। मोहन सरकार ने सेटेलाइट से सर्वे करने, अतिक्रमण चिह्नित करने के निर्देश दिए, एमपीएसईडीसी यह काम करने जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नर्मदा कैचमेंट में दोनों किनारों से 5 किलोमीटर की परिधि में अंतर मण हटाने का दूरगामी व प्रभावी निर्णय लिया था, लेकिन अंदरूनी विवाद के चलते वापस लेना पड़ा। अब कैचमेंट में पौधे लगाने की तैयारी है, प्रयास किए जा रहे हैं कि ये पौधे जिंदा रहें। विशेषज्ञों के मुताबिक यह कितना सफल होगा, इस पर संशय है।

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