अकेले स्वास्थ्य विभाग नहीं… छह विभागों की साझा जंग

  • एंटीबायोटिक पर अब वन हेल्थ फॉर्मूला
  • 2019 की अधूरी नीति से सबक, अब जवाबदेही, बजट और समयसीमा के साथ एएमआर पर नया एक्शन प्लान

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। एंटीबायोटिक दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग और उससे पैदा हो रहे एंटीमाइक्रोबियल रजिस्टेंस (एएमआर) से निपटने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है। 2019 में केवल स्वास्थ्य विभाग के भरोसे बनी नीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी, इसलिए अब सरकार ने वन हेल्थ मॉडल अपनाते हुए पहली बार छह विभागों को एक साझा प्लेटफॉर्म पर लाकर जवाबदेही तय की है। इस अभियान का तकनीकी नेतृत्व एम्स भोपाल करेगा।
नई व्यवस्था में स्वास्थ्य के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, कृषि, खाद्य एवं औषधि प्रशासन तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी शामिल किया गया है। सभी विभागों ने अपने-अपने क्षेत्र के लिए अलग कार्ययोजना और बजट प्रस्ताव तैयार कर दिए हैं।
2019 की कमी, 2026 में नई रणनीति
सरकार की पिछली नीति का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष यह था कि एंटीबायोटिक का उपयोग केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है। पशुपालन, पोल्ट्री, मत्स्य पालन, कृषि और पर्यावरण में भी एंटीबायोटिक का व्यापक उपयोग होता है। ऐसे में केवल स्वास्थ्य विभाग के प्रयास पर्याप्त नहीं थे। यही वजह है कि अब मानव, पशु और पर्यावरण को एक साथ जोडकऱ वन हेल्थ मॉडल लागू किया जा रहा है।
सिर्फ इलाज नहीं, पूरे सिस्टम पर फोकस
नई कार्ययोजना केवल मरीजों को दवा देने तक सीमित नहीं है। इसमें संक्रमण रोकने, लैब नेटवर्क मजबूत करने, एंटीबायोटिक के वैज्ञानिक उपयोग, निगरानी, रिसर्च और जनजागरूकता तक पूरी श्रृंखला को शामिल किया गया है। इसके तहत जिला अस्पतालों के साथ पशु चिकित्सालयों और कृषि क्षेत्र में माइक्रोबायोलॉजी लैब विकसित होंगी। बिना आवश्यकता एंटीबायोटिक लिखने की प्रवृत्ति रोकने के लिए स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइन लागू की जाएगी और जांच आधारित उपचार को बढ़ावा मिलेगा।
अब जवाबदेही भी तय होगी
इस बार सरकार ने केवल योजना बनाकर छोडऩे की बजाय प्रत्येक विभाग के लिए लक्ष्य, समयसीमा और नोडल अधिकारी तय किए हैं। उच्चस्तरीय मॉनिटरिंग सिस्टम लगातार समीक्षा करेगा, ताकि योजना कागजों तक सीमित न रह जाए। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में एंटीबायोटिक दवाएं बिना पर्चे के आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं और पशुपालन सहित कई क्षेत्रों में भी इनका अनियंत्रित उपयोग होता है। ऐसे में असली चुनौती नीति बनाना नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी की होगी।

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