
- 110 साल पुराने दस्तावेज बनाम गजट का दावा, अब समिति के फैसले पर टिकी नजर
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश की नगरीय प्रशासन एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर विवाद निर्णायक दौर में पहुंच गया है। सोमवार को अनुसूचित जाति छानबीन समिति ने दोनों पक्षों की विस्तृत सुनवाई की। एक ओर शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने 1950, 1977 और 2007 के सरकारी गजट का हवाला देते हुए मंत्री की अनुसूचित जाति की पात्रता पर सवाल उठाए, वहीं मंत्री प्रतिमा बागरी ने 110 साल पुराने पारिवारिक दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए पूरे मामले को राजनीतिक साजिश बताया।
अब समिति दस्तावेजों की जांच के बाद इसी महीने फैसला सुना सकती है। यह निर्णय केवल मंत्री प्रतिमा बागरी के राजनीतिक भविष्य ही नहीं, बल्कि प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र संबंधी मामलों की व्याख्या और भविष्य के विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विवाद का केंद्र बागरी जाति की अलग-अलग उपजातियों और उनकी सामाजिक-वैधानिक स्थिति है। शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार का दावा है कि प्रतिमा बागरी जिस समुदाय से आती हैं, वह राजपूत की बागरी उपजाति है, जबकि अनुसूचित जाति में शामिल बागरी समुदाय अलग है। उनका कहना है कि दोनों समुदायों के नाम समान होने का लाभ लेकर अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया।
शिकायतकर्ता के प्रमुख तर्क
समिति के सामने प्रदीप अहिरवार ने कई सरकारी दस्तावेज पेश किए। उन्होंने कहा कि 1950 के राष्ट्रपति आदेश में बागरी समुदाय अनुसूचित जाति सूची में नहीं था। 1977 की अधिसूचना के बाद मध्य प्रदेश में बागरी की अलग-अलग उपजातियों को अलग श्रेणियों में रखा गया। उज्जैन-इंदौर क्षेत्र के बागरी अनुसूचित जाति में आते हैं। सतना-विंध्य क्षेत्र के बागरी राजपूत उपजाति माने जाते हैं। 2007 के गजट नोटिफिकेशन में भी यह स्थिति स्पष्ट की गई। प्रतिमा बागरी का परिवार पहले सामान्य वर्ग में था और बाद में अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज कराया गया।
प्रतिमा बागरी का जवाब
मंत्री प्रतिमा बागरी ने समिति के सामने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि 1950 की अधिसूचना का हवाला देना उचित नहीं क्योंकि उस समय मध्य प्रदेश राज्य अस्तित्व में ही नहीं था। सरकार 1976 की अधिसूचना को मान्यता देती है। उनके पास 110 वर्ष पुराने दस्तावेज मौजूद हैं। बागरी समाज का राजपूत समाज से कोई रोटी-बेटी का संबंध नहीं है। पूरे मामले को राजनीतिक लाभ के लिए उछाला जा रहा है। कांग्रेस अनुसूचित जाति वर्ग की महिला मंत्री को स्वीकार नहीं कर पा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके समाज की पहचान सिद्ध करने के लिए गांव में मुनादी तक कराई गई, जिससे उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराया गया।
आरक्षित सीटों का उदाहरण भी रखा
अपने पक्ष में मंत्री ने पूर्व के कई जनप्रतिनिधियों का उदाहरण देते हुए कहा कि पूर्व मंत्री जुगुल किशोर बागरी पांच बार अनुसूचित जाति आरक्षित सीट से विधायक रहे। महेंद्र बागरी और शिवदयाल बागरी भी आरक्षित सीटों से चुनाव जीत चुके हैं। कांग्रेस ने भी पूर्व में बागरी समाज के उम्मीदवारों को अनुसूचित जाति आरक्षित सीट से टिकट दिया था। उनका तर्क है कि यदि बागरी समाज अनुसूचित जाति में शामिल नहीं होता, तो ये चुनाव कैसे लड़ते?
सिर्फ एक शिकायतकर्ता नहीं, और भी आपत्तियां
सुनवाई के दौरान सतना और पन्ना जिले के कई लोगों ने भी मंत्री के जाति प्रमाण पत्र पर आपत्ति दर्ज कराई। इनमें प्रमुख रूप से सी.एल. बौद्ध, डी.पी. साकेत और जितेंद्र जाटव सहित अन्य लोगों ने समिति को ज्ञापन सौंपकर जांच की मांग की। पूरे विवाद का मूल प्रश्न यह है कि क्या बागरी नाम की सभी उपजातियां अनुसूचित जाति में आती हैं, या केवल अधिसूचना में वर्णित विशिष्ट उपजातियां ही इस श्रेणी में शामिल हैं? इसी प्रश्न का उत्तर समिति के फैसले की दिशा तय करेगा।
समिति किन बिंदुओं की जांच करेगी?
1950, 1976, 1977 और 2007 की अधिसूचनाओं की वैधानिक स्थिति। प्रतिमा बागरी के परिवार का सामाजिक एवं राजस्व रिकॉर्ड। पुराने जाति प्रमाण पत्र। वंशावली और राजस्व अभिलेख। जनगणना एवं अन्य सरकारी रिकॉर्ड। दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता। यदि समिति मंत्री के पक्ष में निर्णय देती है तो उनका जाति प्रमाण पत्र वैध माना जाएगा और विवाद समाप्त हो सकता है। यदि शिकायत सही पाई जाती है तो मामला केवल जाति प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चुनावी पात्रता, आरक्षित सीट से निर्वाचन और अन्य कानूनी पहलुओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे किसी भी आगे के कदम का निर्धारण संबंधित कानूनों और सक्षम प्राधिकारियों की प्रक्रिया के अनुसार होगा। यह मामला अब केवल एक जाति प्रमाण पत्र का विवाद नहीं रह गया है। विपक्ष इसे सामाजिक न्याय और आरक्षण व्यवस्था से जोडकऱ देख रहा है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक प्रेरित शिकायत बता रही है। समिति का फैसला आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण असर डाल सकता है। दोनों पक्ष अपने-अपने दस्तावेज समिति के समक्ष रख चुके हैं। अब फैसला अनुसूचित जाति छानबीन समिति के परीक्षण और निष्कर्ष पर निर्भर करेगा, जिसकी घोषणा इसी महीने होने की संभावना जताई जा रही है।
