- 111 में 40 एमपी में, रिजर्व से बाहर भी बड़ा खतरा

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश को देश में सबसे ज्यादा बाघों वाला राज्य होने का गौरव हासिल है, लेकिन बाघों की मौत का आंकड़ा भी अब चिंता बढ़ाने वाला है। एनटीसीए के आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष 19 जुलाई 2026 तक देश में 111 बाघों की मौत दर्ज हुई है। इनमें सबसे ज्यादा 40 मौतें मध्य प्रदेश में हुई हैं। यानी देश में हुई बाघों की मौतों में से करीब 36 फीसदी सिर्फ मध्य प्रदेश में हुई हैं। महाराष्ट्र 25 मौतों के साथ दूसरे और तमिलनाडु नौ मौतों के साथ तीसरे स्थान पर है।
40 में 16 मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर
आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मध्य प्रदेश में हुई 40 मौतों में 24 बाघ टाइगर रिजर्व के अंदर और 16 की मौत रिजर्व के बाहर दर्ज हुई है। यानी प्रदेश में करीब 40 फीसदी मौतें टाइगर रिजर्व की सीमा से बाहर हुईं। रिजर्व के बाहर दर्ज मामलों में नर्मदापुरम, सीहोर, शहडोल, छिंदवाड़ा, बुरहानपुर, उमरिया, बालाघाट, सिवनी, नरसिंहपुर और सतना जैसे क्षेत्र शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर जनवरी में नर्मदापुरम और सीहोर, फरवरी में शहडोल, मार्च में छिंदवाड़ा, अप्रैल में बालाघाट-सिवनी-उमरिया और जून-जुलाई में नरसिंहपुर, सतना तथा अन्य क्षेत्रों में मौतें दर्ज हुईं। वहीं रिजर्व के भीतर बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, पन्ना, सतपुड़ा, संजय-डुबरी, रातापानी और वीरांगना दुर्गावती जैसे टाइगर रिजर्व में मौतें दर्ज हुई हैं। मौतों का यह पैटर्न संरक्षण व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या बाघों की बढ़ती आबादी के लिए सिर्फ टाइगर रिजर्व सुरक्षित रखना पर्याप्त है? युवा और वयस्क बाघ नए इलाके की तलाश में रिजर्व से बाहर निकलते हैं। ऐसे में उनके लिए सुरक्षित कॉरिडोर, आसपास के वन क्षेत्र और मानव बस्तियों के बीच संघर्ष को कम करना बेहद जरूरी हो जाता है। टाइगर डे पर मध्य प्रदेश के सामने अब चुनौती सिर्फ बाघों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने की है। 785 बाघों वाला यह राज्य अगर टाइगर स्टेट का दर्जा कायम रखना चाहता है तो रिजर्व के बाहर बाघों की सुरक्षा भी संरक्षण नीति का उतना ही बड़ा हिस्सा बनानी होगी। वन विभाग के रिकॉर्ड में बिजली के करंट से बाघों की मौत के कई मामले दर्ज हैं। जंगल से बाहर निकलने वाले बाघों के लिए बिजली के तार, फेंसिंग, सडक़, रेलवे और मानव बस्तियां नए खतरे बन रहे हैं। एनटीसीए भी बाघों के संरक्षण में कॉरिडोर, मानव-वन्यजीव संघर्ष और जंगलों के विखंडन को महत्वपूर्ण चुनौती मानता है।
महाराष्ट्र से 15 और तमिलनाडु से चार गुना ज्यादा मौतें
राज्यवार आंकड़े देखें तो मध्य प्रदेश में 40 मौतों के मुकाबले महाराष्ट्र में 25, तमिलनाडु में 9, कर्नाटक में 7 और असम में 5 बाघों की मौत दर्ज हुई है। इस तरह मध्य प्रदेश में बाघों की मौतें महाराष्ट्र से 15 अधिक और तमिलनाडु की तुलना में चार गुना से भी ज्यादा हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है क्योंकि मध्य प्रदेश में बाघों की बड़ी आबादी टाइगर रिजर्व के भीतर ही नहीं, बल्कि उनके आसपास के जंगलों और दूसरे वन क्षेत्रों में भी फैल रही है।
बाघ बढ़े तो आपसी संघर्ष भी बढ़ा
वन विभाग के उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक 2025 में बाघों की मौत के 53 मामले दर्ज हुए, जबकि 2026 में मई तक 29 मौतों की रिपोर्ट सामने दी है। 2025 के रिकॉर्ड में बाघों की मौत का एक बड़ा कारण आपसी संघर्ष रहा। बांधवगढ़, कान्हा, पेच, सतपुड़ा और संजय जैसे क्षेत्रों में बाघों के बीच संघर्ष के मामले सामने आए। आपसी संघर्ष के 17, करंट से 7, प्राकृतिक रूप से 6, अज्ञात 5, ट्रेन हादसा 2, बीमारी/ संक्रमण तीन के आसपास और हादसे से अन्य की मौत हुई है। वहीं, 2026 के शुरुआत चार माह में 29 बाघों की मौत दर्ज की गई है। वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार 22 मौतें प्राकृतिक एवं अन्य कारणों से और 7 मौतें शिकार के कारण दर्ज है। शिकार के सात मामलों में छह बाघों की मौत करंट से हुई, जबकि एक मामला सीधा शिकार से जुड़ा है। प्राकृतिक और अन्य कारणों से सात बाघों की मौत आपसी संघर्ष से हुई है।
