- सत्ता और संगठन की बैठकों में बनी सहमति
- गौरव चौहान

मप्र में जहां एक तरफ निगम-मंडल-प्राधिकरणों में राजनीतिक नियुक्तियों का मामला लगातार टलता जा रहा है, वहीं सहकारी बैंकों और समितियों में राजनीतिक नियुक्तियों की तैयारी तेज हो गई है। सत्ता और संगठन की बैठकों में इसके लिए सहमति बन गई है। सूत्रों के मुताबिक, सहकारिता विभाग में लंबे समय से लंबित नियुक्तियों को अब तेजी से पूरा करने की योजना बनाई जा रही है। इसके तहत अपेक्स बैंक सहित जिला सहकारी बैंकों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, संचालक मंडल और अन्य समितियों में पदाधिकारियों की नियुक्ति जल्द हो सकती है। बताया जा रहा है कि निगम-मंडलों के साथ-साथ सहकारी संस्थाओं में भी राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की जा रही है।
यह नियुक्तियां आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए बेहद अहम मानी जा रही हैं। हाल ही में इस मुद्दे को लेकर केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के बीच मुलाकात भी हो चुकी है। इसके अलावा क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जमवाल के साथ भी इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है। सूत्रों की मानें तो पहले इन पदों पर नियुक्तियां की जाएंगी और उसके बाद सहकारी संस्थाओं में चुनाव कराने की रणनीति पर काम होगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सहकारिता क्षेत्र में ये नियुक्तियां चुनावी समीकरणों को साधने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
अभी अधिकारी-कर्मचारी हैं प्रशासक
गौरतलब है कि प्रदेश में कृषक कल्याण वर्ष मनाया जा रहा है। इसमें किसानों के हित में कई काम किए जा रहे हैं। अब इनसे जुड़ी संस्थाओं के चुनाव कराने की तैयारी है। चुनाव न होने के कारण वर्तमान में समितियों के कामकाज को संचालित करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर अधिकारियों-कर्मचारियों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। अब इन्हें मुक्त करके राजनीतिक नियुक्तियां की जाएंगी। दरअसल, पिछले दिनों राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर सत्ता और संगठन की जो बैठकें हुईं, उनमें यह बात निकलकर सामने आई कि अब कार्यकर्ताओं को सहकारी और कृषि उपज मंडियों में समायोजित किया जाए। इसके लिए पहले मनोनयन होगा। इसकी तैयारी काफी समय से चल भी रही है लेकिन सहमति नहीं बनने के कारण मामला रुका हुआ था। प्रदेश में 4,345 सहकारी समितियों, 38 जिला सहकारी केंद्रीय बैंक और राज्य शीर्ष बैंक (अपेक्स बैंक) हैं।
कानूनी पेचीदगी और प्रशासनिक बदलाव
2018 से इनके चुनाव अलग-अलग कारणों से नहीं हुए हैं। हाई कोर्ट बार-बार चुनाव कराने को लेकर निर्देश दे रहा है। सरकार ने अवमानना से बचने के लिए अधिनियम में संशोधन करके यह प्रविधान तो कर लिया कि विशेष परिस्थितियों में चुनाव आगे बढ़ाए जा सकते हैं लेकिन अब कार्यकर्ताओं को समायोजित करने की बात है। इससे पहले राजनीतिक नियुक्तियों के क्रम में नगरीय निकायों में एल्डरमैन (मनोनीत पार्षद) नियुक्त किए जा चुके हैं। अब सबसे बड़े क्षेत्र सहकारी समितियों की बारी है। दरअसल, पंचायत के बाद प्रदेश में इनका ही बड़ा नेटवर्क है। समितियों से लगभग 65 लाख किसान जुड़े हैं। भले ही समितियों के चुनाव राजनीतिक आधार पर नहीं होते हैं मगर इनकी भूमिका पंचायत से लेकर विधानसभा-लोकसभा के चुनाव में महत्वपूर्ण रहती है। पार्टी के पक्ष में वातावरण बनाने का दायित्व इन्हीं का रहता है।
पहले प्राथमिक समितियों में मनोनयन होगा
लंबे समय से चुनाव न होने के कारण सहकारिता के क्षेत्र में सक्रिय कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं। कई बार संगठन स्तर पर नियुक्ति को लेकर बात भी हो चुकी है लेकिन यह किसी न किसी कारण से टलती रही लेकिन अब राजनीतिक व्यक्तियों को प्रशासक पद पर मनोनीत करने की तैयारी है। सूत्रों का कहना है कि पहले प्राथमिक समितियों में मनोनयन होगा। इसके लिए जिला इकाइयों के साथ स्थानीय विधायकों से फीडबैक लिया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि सहकारी समितियों के चुनाव प्रशासकों की देखरेख में कराए जाएंगे। ये ही सदस्यता सूची बनवाएंगे और फिर चुनाव कराएंगे। प्रशासक उसे ही मनोनीत किया जाएगा जो समिति का सदस्य हो और चुनाव लडऩे की पात्रता रखता हो। यानी डिफाल्टर न हो। किसी प्रकार का आपराधिक रिकार्ड न हो।
