खेती के साथ गोपालन से समृद्ध हो रहे किसान

किसान
  • मुख्यमंत्री डॉ. मोहन का नवाचार…

बिच्छू डॉट कॉम/ भोपाल//विनोद कुमार उपाध्याय। मध्य प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अब खेती के साथ गोपालन को भी आय का मजबूत आधार बनाने की तैयारी है। मौसम की अनिश्चितता और कृषि लागत के बीच पशुपालन किसानों को नियमित आमदनी का विकल्प दे सकता है। इसी संभावना को विस्तार देने के लिए राज्य सरकार दुग्ध उत्पादन, सहकारिता, पशु चिकित्सा और डेयरी प्रसंस्करण को एक साथ जोडऩे पर जोर दे रही है। विगत दिनों भोपाल में आयोजित राज्यस्तरीय गोपालक सम्मेलन में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दुग्ध उत्पादन को किसानों और गोपालकों की आर्थिक समृद्धि से जोडऩे की रणनीति सामने रखी। प्रदेश में 90 लाख से अधिक गोपालकों के बड़े समूह को इस अभियान का आधार बनाया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य दूध संग्रहण को बढ़ाकर प्रतिदिन 50 लाख लीटर तक पहुंचाना है। इस दिशा में सहकारी समितियों का विस्तार, नए डेयरी संयंत्र, पशुओं के उपचार की सुविधाएं और गोपालकों को वित्तीय सहायता देने जैसे कदम शामिल हैं। हालांकि, योजनाओं का वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि दूध का उचित मूल्य मिलने, उत्पादन लागत घटने और ग्रामीण परिवारों की शुद्ध आय बढऩे में कितनी मदद मिलती है। प्रदेश में 1700 से अधिक दुग्ध सहकारी समितियां गठित किए जाने की जानकारी दी गई है। जिन गांवों में अभी समितियां नहीं हैं, वहां भी इनके गठन की योजना है। सरकार का मानना है कि संगठित संग्रहण व्यवस्था से गोपालकों को दूध बेचने के लिए स्थानीय बाजार मिलेगा और बिचौलियों पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी। सहकारी समितियां दूध की मात्रा और गुणवत्ता की जांच, संग्रहण, परिवहन तथा भुगतान को व्यवस्थित कर सकती हैं। सांची और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के बीच हुए समझौते से भी दुग्ध संग्रहण व्यवस्था को विस्तार देने की उम्मीद है। हालांकि, समितियों की सफलता केवल उनकी संख्या से नहीं मापी जा सकती। उनका नियमित संचालन, पारदर्शी भुगतान और किसानों को मिलने वाला दूध का मूल्य अधिक महत्वपूर्ण होगा। छोटे पशुपालकों को भी व्यवस्था से जोडऩा जरूरी है, ताकि दुग्ध क्षेत्र का लाभ कुछ बड़े डेयरी संचालकों तक सीमित न रहे।
मध्य प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था लंबे समय से खेती और पशुपालन के सहारे आगे बढ़ती रही है। गांवों में बड़ी संख्या में परिवार खेती के साथ गाय-भैंस पालते हैं। लेकिन पशुपालन की आर्थिक क्षमता का पूरा लाभ तभी मिलता है, जब दूध का नियमित संग्रहण हो, उत्पादकता बेहतर हो और किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले। खेती की आय अक्सर फसल चक्र, मौसम, सिंचाई और बाजार भाव पर निर्भर रहती है। इसके विपरीत, बेहतर प्रबंधन के साथ दुग्ध उत्पादन से नियमित अंतराल पर नकदी प्राप्त हो सकती है। यही कारण है कि सरकार अब किसानों की आय बढ़ाने की रणनीति में पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, बकरी पालन, मुर्गी पालन और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को भी शामिल कर रही है। इस मॉडल में एक किसान के पास आय के कई स्रोत विकसित करने की संभावना है। फसल उत्पादन के साथ दूध बेचने, गोबर से जैविक खाद बनाने, पशुओं के लिए चारा उगाने और दूध से दही, घी, पनीर जैसे उत्पाद तैयार करने से ग्रामीण परिवारों की आर्थिक गतिविधियों का दायरा बढ़ सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि पशुपालन में चारा, पशु चिकित्सा, नस्ल, श्रम और रखरखाव की लागत जुड़ी होती है। इसलिए केवल पशुओं की संख्या बढ़ाने से आय में उसी अनुपात में वृद्धि सुनिश्चित नहीं होती। उत्पादकता और लागत के बीच संतुलन बनाना इस पूरी रणनीति की सबसे महत्वपूर्ण शर्त होगी।
उज्जैन में 225 करोड़ का मिल्क प्रोसेसिंग प्लांट
दुग्ध क्षेत्र में निवेश और प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने के लिए उज्जैन में 225 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले मिल्क प्रोसेसिंग प्लांट का भूमिपूजन किया गया। इस संयंत्र की प्रस्तावित क्षमता प्रतिदिन तीन लाख लीटर दूध प्रसंस्करण की है। दूध उत्पादन बढ़ाने के साथ उसका मूल्य संवर्धन भी जरूरी है। कच्चा दूध बेचने की तुलना में दही, घी, पनीर और अन्य दुग्ध उत्पादों के निर्माण से बाजार में अलग-अलग श्रेणियों के उत्पाद उपलब्ध कराए जा सकते हैं। इससे डेयरी कारोबार का विस्तार करने और संबंधित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने की संभावना बनती है। भोपाल में नए डेयरी प्लांट और राज्यस्तरीय गुणवत्ता प्रयोगशाला के लोकार्पण तथा शिवपुरी में मिनी डेयरी प्लांट को मजबूत करने जैसे कदम भी इसी दिशा से जुड़े हैं। दुग्ध प्रसंस्करण की क्षमता बढऩे का लाभ तभी व्यापक होगा, जब इसका संबंध गांवों में दूध देने वाले किसानों से सीधे बने। संयंत्रों को नियमित और गुणवत्तापूर्ण दूध की आपूर्ति मिले तथा गोपालकों को समय पर भुगतान और उचित दर प्राप्त हो, तो ग्रामीण स्तर पर डेयरी गतिविधियां टिकाऊ बन सकती हैं। इस क्षेत्र में गुणवत्ता जांच भी महत्वपूर्ण है। दूध की गुणवत्ता, मिलावट की रोकथाम, स्वच्छ संग्रहण और सुरक्षित परिवहन से उपभोक्ताओं का भरोसा मजबूत होता है। इसलिए प्रयोगशालाओं और आधुनिक प्रसंस्करण सुविधाओं का विस्तार उत्पादन बढ़ाने जितना ही जरूरी है।
मध्य प्रदेश में दुग्ध सहकारी व्यवस्था को मजबूत करने का एक प्रमुख उद्देश्य गोपालकों और बाजार के बीच सीधा संबंध विकसित करना है। जब गांव के पशुपालक संगठित होकर दूध बेचते हैं, तो उन्हें संग्रहण और विपणन की बेहतर व्यवस्था मिल सकती है। सहकारी समितियां दूध की गुणवत्ता जांच, मात्रा के रिकॉर्ड, भुगतान और बाजार तक आपूर्ति को व्यवस्थित करने में भूमिका निभा सकती हैं। इससे छोटे पशुपालकों को अलग-अलग खरीदारों पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन सहकारी समितियों की वास्तविक सफलता केवल उनकी संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि कितनी समितियां नियमित रूप से काम कर रही हैं, कितने पशुपालक उनसे जुड़े हैं, दूध का कितना संग्रहण हो रहा है और भुगतान में कितनी नियमितता है। समितियों के संचालन में पारदर्शिता, स्थानीय स्तर पर जवाबदेही और किसानों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देना भी आवश्यक होगा। यदि गोपालकों को दूध की दर, गुणवत्ता के मानकों और भुगतान की गणना की स्पष्ट जानकारी मिलती है, तो सहकारी व्यवस्था में उनका भरोसा बढ़ सकता है।
कामधेनु योजना से छोटे पशुपालकों को सहारा
गोपालन को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना के तहत सहायता का प्रावधान किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, योजना में 25 गायों के पालन के लिए 40 लाख रुपये तक के ऋण और 10 लाख रुपये की सब्सिडी का प्रावधान है। इस प्रकार की सहायता पशुपालन को व्यवसाय के रूप में विकसित करने की संभावना बढ़ा सकती है। बड़े स्तर पर डेयरी शुरू करने वाले परिवार पशुओं की खरीद, शेड निर्माण और अन्य जरूरी सुविधाओं के लिए वित्तीय संसाधन जुटा सकते हैं। लेकिन ऋण और सब्सिडी का लाभ उठाने से पहले पशुपालकों के लिए व्यवसाय की लागत और संभावित आमदनी का आकलन करना जरूरी है। पशुओं की खरीद के अलावा चारा, श्रमिक, बिजली, पानी, बीमा, पशु चिकित्सा और दूध के विपणन पर भी खर्च होता है। डेयरी व्यवसाय की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि दूध की बिक्री से मिलने वाली आय इन खर्चों को पूरा कर पा रही है या नहीं। इसलिए योजना के साथ प्रशिक्षण, बैंकिंग सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार से जुड़ाव भी जरूरी है। शहरी क्षेत्रों में गौशालाओं को मिलने वाले अनुदान में भी वृद्धि की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नगर निगम क्षेत्र की गौशालाओं के लिए प्रति गाय अनुदान 20 रुपये से बढ़ाकर 40 रुपये किया गया है। इससे गौशालाओं के संचालन और पशुओं के संरक्षण में अतिरिक्त सहायता मिलने की उम्मीद है।
ग्रामीण परिवारों में पशुपालन की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से पूरी होती है। पशुओं को चारा देना, दूध निकालना, उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना और दुग्ध उत्पाद तैयार करना जैसे कामों में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। दुग्ध सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों से महिलाओं की भागीदारी को अधिक व्यवस्थित किया जा सकता है। यदि उन्हें दूध की बिक्री का भुगतान सीधे मिले और डेयरी संबंधी निर्णयों में भागीदारी मिले, तो परिवार की आय पर उनका आर्थिक अधिकार मजबूत हो सकता है। दूध से दही, घी, पनीर और अन्य उत्पाद तैयार करने जैसे काम गांवों में छोटे उद्यमों के लिए अवसर पैदा कर सकते हैं। इसी तरह गोबर से जैविक खाद और बायोगैस तैयार करने की गतिविधियां भी अतिरिक्त आय के रास्ते खोल सकती हैं। हालांकि, इन संभावनाओं को वास्तविक रोजगार में बदलने के लिए प्रशिक्षण, बाजार, वित्तीय सहायता और उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की व्यवस्था विकसित करनी होगी। केवल योजना घोषित कर देने से स्थानीय उद्यम अपने आप खड़े नहीं होंगे।
हर ब्लॉक में वृंदावन गांव की योजना
प्रदेश के सभी 313 ब्लॉकों के वृंदावन गांवों में उत्कृष्ट गोपालकों की प्रतियोगिता कराने की घोषणा की गई है। इसमें प्रथम पुरस्कार एक लाख रुपये, द्वितीय पुरस्कार 50 हजार रुपये और तृतीय पुरस्कार 25 हजार रुपये रखा गया है। ऐसी प्रतियोगिताएं पशुपालकों को बेहतर प्रबंधन और उन्नत पशुपालन के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं। यदि इनमें पशुओं के स्वास्थ्य, दूध उत्पादन, पोषण और स्वच्छता जैसे मानकों को महत्व दिया जाए, तो दूसरे गोपालकों को भी वैज्ञानिक पद्धतियां अपनाने का अवसर मिलेगा। वृंदावन गांवों की अवधारणा को सफल बनाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजना बनानी होगी। चारे की उपलब्धता, पानी, पशुओं की नस्ल और बाजार की मांग हर क्षेत्र में अलग हो सकती है।
मध्य प्रदेश देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्यों में शामिल है। अब चुनौती इस स्थिति को गोपालकों की बेहतर आमदनी में बदलने की है। इसके लिए दूध संग्रहण बढ़ाने के साथ उचित मूल्य, समय पर भुगतान, पशु चिकित्सा और प्रसंस्करण सुविधाओं को मजबूत करना होगा। प्रतिदिन 50 लाख लीटर दूध संग्रहण का लक्ष्य तभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को व्यापक लाभ दे सकेगा, जब छोटे और सीमांत पशुपालक भी संगठित बाजार से जुड़ें। सहकारी समितियों की कार्यक्षमता, डेयरी संयंत्रों की उपयोगिता और पशुपालन की लागत पर लगातार निगरानी भी जरूरी होगी। मध्य प्रदेश में गोपालन की परंपरा पहले से मौजूद है। अब इसे आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक पशुपालन और संगठित विपणन से जोडऩे की कोशिश है। योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तो खेती के साथ पशुपालन ग्रामीण परिवारों के लिए आय का अधिक स्थिर स्रोत बन सकता है। दुग्ध क्रांति की असली सफलता दूध के उत्पादन का आंकड़ा बढऩे में नहीं, बल्कि गोपालक की लागत घटने, उचित मूल्य मिलने और उसके परिवार की आमदनी बढऩे में होगी।

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