- किसानों ने उठाए जमीनों के वर्गीकरण पर सवाल
- 5500 आपत्तियों में कैचमेंट और डूब क्षेत्र का मुद्दा
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। राजधानी के मास्टर प्लान-2047 के ड्राफ्ट पर सबसे बड़ा विवाद जमीनों के वर्गीकरण को लेकर सामने आया है। अब तक प्राप्त 9 हजार से अधिक दावे-आपत्तियों में करीब 5500 कैचमेंट एरिया और डूब क्षेत्र से संबंधित हैं। यानी कुल आपत्तियों में लगभग 60 प्रतिशत का केंद्र तालाब का जलग्रहण क्षेत्र और उसके आसपास की जमीनें हैं। किसानों का आरोप है कि एक ही इलाके में कुछ जमीनों को आवासीय या लो-डेंसिटी रेजिडेंशियल (एलडीआर) श्रेणी में रखकर विकास का रास्ता खोला गया, जबकि उनसे लगी दूसरी जमीनों को कैचमेंट में शामिल कर दिया गया। इससे जमीनों के बाजार मूल्य और भविष्य में विकास की संभावनाओं पर असमान असर पडऩे की आशंका है। मास्टर प्लान के ड्राफ्ट पर आपत्तियों की संख्या पिछली बार के मुकाबले तीन गुना से अधिक हो गई है। मास्टर प्लान-2031 के ड्राफ्ट पर 3005 दावे-आपत्तियां और सुझाव मिले थे। इस बार बड़ी संख्या में आपत्तियां आना बताता है कि जमीनों के उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और शहरी विस्तार के प्रस्तावों पर हितधारकों के बीच व्यापक असहमति है।
किसानों की मुख्य आपत्ति यह है कि आसपास की जमीनों के वर्गीकरण में एकरूपता नहीं दिखाई दे रही। उनका कहना है कि जिन जमीनों को आवासीय या एलडीआर श्रेणी में रखा गया है, उनकी विकास संबंधी संभावनाएं बढ़ सकती हैं, जबकि कैचमेंट में शामिल जमीनों पर निर्माण और उपयोग को लेकर प्रतिबंधों की आशंका है। किसानों के मुताबिक, इससे एक ही क्षेत्र की जमीनों के मूल्य में बड़ा अंतर पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, नीलबड़ सहित कुछ क्षेत्रों में एलडीआर श्रेणी को लेकर भी आपत्तियां हैं। यहां लोग कम घनत्व वाले आवासीय क्षेत्र के बजाय मुख्य आवासीय क्षेत्र में जमीन शामिल करने की मांग कर रहे हैं। यानी एक तरफ कैचमेंट से बाहर करने की मांग है, तो दूसरी तरफ एलडीआर से मुख्य आवासीय श्रेणी में बदलाव का दबाव है। इससे साफ है कि मास्टर प्लान का विवाद केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन के वर्तमान उपयोग, भविष्य के विकास और आर्थिक मूल्य से भी जुड़ा है।
78 से अधिक गांवों के कैचमेंट में शामिल होने पर विरोध
भारतीय किसान संघ के तहसील अध्यक्ष अखिलेश मीणा और किसान नेता मनोहर सिंह ठाकुर ने आरोप लगाया कि भंवरी, बरखेड़ा सालम, मुगालिया छाप, खंदा, बड़झिरी, फंदा, नीलबड़ और रातीबड़ सहित 78 से अधिक गांवों को कैचमेंट और बफर जोन की बीआईजेड-01 व 02 श्रेणियों में शामिल किया गया है। उनका कहना है कि इससे किसानों को खेती और निर्माण संबंधी गतिविधियों में परेशानी हो सकती है। किसान नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि किसानों की जमीनों पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, जबकि तालाब के आसपास निजी संस्थानों, स्कूलों, होटलों और कॉलोनियों को निर्माण की छूट मिल रही है। भारतीय किसान संघ का दावा है कि उसने करीब 5000 आपत्तियां दर्ज कराई हैं। संगठन ने आपत्तियां दर्ज कराने की समय-सीमा बढ़ाने और निराकरण समिति में किसान प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग भी की है।
पिछली बार भी तालाब और ग्रीन एरिया पर थीं दो हजार आपत्तियां
मास्टर प्लान-2031 के ड्राफ्ट पर मिली 3005 आपत्तियों में से करीब 2000 बड़े तालाब, कैचमेंट एरिया में निर्माण और ग्रीन एरिया से संबंधित थीं। इस बार आपत्तियों की संख्या में हुई वृद्धि ने प्रशासन के सामने चुनौती बढ़ा दी है। अब सवाल यह है कि क्या आपत्तियों के परीक्षण के बाद कैचमेंट, बफर जोन, एलडीआर और आवासीय क्षेत्र के वर्गीकरण में बदलाव होंगे या मौजूदा प्रस्तावों को बरकरार रखा जाएगा।
आपत्तियों की छंटनी के बाद होगी सुनवाई
नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के संचालक कौशलेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, अंतिम समय-सीमा तक प्राप्त सभी आपत्तियों की स्क्रूटनी की जाएगी और उन्हें स्कैन कराया जाएगा। एक जैसे मुद्दों पर मिली आपत्तियों के समूह बनाए जाएंगे, ताकि संबंधित मामलों की सुनवाई एक साथ की जा सके। विभाग को उम्मीद है कि दीपावली से पहले सुनवाई शुरू हो सकती है। मास्टर प्लान की अधिसूचित समिति में सांसद, विधायक, महापौर, जनपद प्रतिनिधि, कलेक्टर और नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के अधिकारी सहित कुल 83 सदस्य शामिल होते हैं। आपत्तिकर्ताओं को उनके दर्ज मोबाइल नंबर पर व्हाट्सएप के माध्यम से सूचना भेजने की व्यवस्था होगी। सभी मामलों की सुनवाई एक साथ नहीं होगी, बल्कि अलग-अलग समय स्लॉट दिए जाएंगे। सुनवाई के तुरंत बाद किसी आपत्ति को स्वीकार या खारिज किए जाने की अंतिम जानकारी नहीं मिलेगी। समिति अपने विचार और प्रस्ताव तैयार करेगी, जबकि अंतिम निर्णय राज्य शासन लेगा।
अब फैसले पर टिकी नजरें
मास्टर प्लान-2047 में एक ओर भोपाल के नियोजित विस्तार और आवासीय जरूरतों को पूरा करने की चुनौती है, तो दूसरी ओर बड़े तालाब के जलग्रहण क्षेत्र और पर्यावरणीय संवेदनशील इलाकों को सुरक्षित रखने की जरूरत है। हजारों आपत्तियों के बीच प्रशासन के सामने दोनों पक्षों के तर्कों का परीक्षण करना अहम होगा। खास तौर पर यह देखना होगा कि समान परिस्थितियों वाली जमीनों के वर्गीकरण में एकरूपता है या नहीं और कैचमेंट में शामिल जमीनों पर लागू नियमों को लेकर किसानों की आशंकाओं का समाधान किस तरह किया जाता है।
