महंगी खरीदी गई बिजली का बोझ उपभोक्ताओं पर

  • 8 महीने में छठवीं बार बढ़ा सरचार्ज

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश में बिजली खरीद की बढ़ी लागत का असर सीधे उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है। बिजली वितरण कंपनियों की महंगी बिजली खरीद का समायोजन अब अगस्त के बिलों में 4.59 प्रतिशत फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज (एफपीपीएएस) के रूप में किया गया है। खास बात यह है कि जनवरी से अगस्त के बीच आठ महीनों में यह छठवीं बार है, जब उपभोक्ताओं के बिजली बिल में इस तरह का सरचार्ज जोड़ा गया है।
इस बार सरचार्ज की वजह जून में बिजली खरीद की वास्तविक लागत का टैरिफ में पहले से तय अनुमान से ज्यादा होना है। जून में वितरण कंपनियों ने सभी स्रोतों से करीब 906.65 करोड़ यूनिट बिजली खरीदी। इसकी वास्तविक औसत खरीद लागत 3.92 रुपए प्रति यूनिट रही, जबकि टैरिफ में औसत खरीद लागत 3.64 रुपए प्रति यूनिट मानी गई थी। यानी बिजली खरीद अनुमान से 28 पैसे प्रति यूनिट महंगी रही।
महंगी खरीद का अंतर उपभोक्ता से वसूला
नियामकीय व्यवस्था के तहत बिजली खरीद की वास्तविक लागत और टैरिफ में स्वीकृत लागत के बीच के अंतर का समायोजन एफपीपीएएस के जरिए किया जाता है। जून में हुई महंगी खरीद का असर दो महीने बाद अगस्त के बिजली बिल में दिखाई दे रहा है। हालांकि 4.59 प्रतिशत एफपीपीएएस का मतलब यह नहीं है कि पूरे बिजली बिल में सीधे 4.59 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह बिजली खरीद लागत में अंतर का नियामकीय समायोजन है। उपभोक्ता पर वास्तविक असर उसकी बिजली खपत, श्रेणी और लागू टैरिफ के अनुसार अलग-अलग होगा। खपत जितनी ज्यादा होगी, सरचार्ज की राशि भी उतनी ही बढ़ सकती है।
906 करोड़ यूनिट खरीद, 28 पैसे का अंतर
जून में कुल 9,06,64,75,575 यूनिट बिजली खरीदी गई। इसमें से 28,63,94,615 यूनिट की थोक बिक्री हुई। इसे घटाने के बाद सरचार्ज की गणना के लिए नेट बिजली खरीद करीब 878.01 करोड़ यूनिट रही। बिजली खरीद पर हुए खर्च और थोक बिक्री से मिली आय के समायोजन के बाद वास्तविक औसत खरीद लागत 3.92 रुपए प्रति यूनिट निकली। इसके मुकाबले टैरिफ में स्वीकृत लागत 3.64 रुपए थी। इस तरह 0.28 रुपए प्रति यूनिट का अंतर सामने आया, जो अगस्त के एफपीपीएएस की गणना का प्रमुख आधार बना।
सिर्फ खरीद लागत नहीं, कई मानकों से तय हुआ 4.59 प्रतिशत
एफपीपीएएस केवल 28 पैसे प्रति यूनिट के अंतर के आधार पर तय नहीं होता। इसके लिए निर्धारित नियामकीय फॉर्मूला लागू किया जाता है। अगस्त की गणना में 13.22 प्रतिशत वितरण हानि और 7.44 रुपए प्रति यूनिट औसत बिलिंग रेट (एबीआर) को शामिल किया गया। इसके अलावा बिजली की लागत निकालते समय 3.83 प्रतिशत अंतरराज्यीय ट्रांसमिशन लॉस और 2.60 प्रतिशत राज्य के भीतर ट्रांसमिशन लॉस जैसे मानकों को भी गणना में शामिल किया गया। इन सभी घटकों के आधार पर अगस्त 2026 के लिए मासिक एफपीपीएएस 4.59 प्रतिशत निर्धारित हुआ।
557 करोड़ यूनिट बाहर से आई
जून की कुल बिजली खरीद में करीब 557.15 करोड़ यूनिट बिजली राज्य के बाहर के स्रोतों से, जबकि करीब 349.50 करोड़ यूनिट राज्य के स्रोतों से प्राप्त हुई। ट्रांसमिशन लॉस और थोक बिक्री को समायोजित करने के बाद सरचार्ज की गणना के लिए प्रभावी बिजली करीब 833.65 करोड़ यूनिट रही। यानी बिजली खरीद की वास्तविक लागत और अनुमानित लागत के बीच अंतर का हिसाब आखिरकार उपभोक्ताओं के बिल में पहुंच रहा है। आठ महीने में छह बार सरचार्ज बढऩे से यह सवाल भी उठ रहा है कि महंगी बिजली खरीद और उसकी लागत के प्रबंधन का असर बार-बार उपभोक्ताओं पर ही क्यों डाला जा रहा है।

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