राजा हृदय शाह जयंती के बहाने… बदलती सियासत की तस्वीर

  • उमा-प्रहलाद की जुगलबंदी से पार्टी में बन सकते हैं नए समीकरण
  • राकेश अग्निहोत्री
राजा हृदय शाह जयंती

28 अप्रैल को वीर शिरोमणि, बलिदानी महाराजा हृदय शाह की जयंती के अवसर पर भोपाल में प्रस्तावित कार्यक्रम अब केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं रह गया है, बल्कि यह मध्य प्रदेश की राजनीति में नए संकेतों और समीकरणों का केंद्र बनता नजर आ रहा है, लोधी समाज के इस आयोजन की अगुवाई जहां पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल के भाई और पूर्व विधायक जालम सिंह कर रहे हैं, वहीं इस मंच पर संभावित रूप से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उमा भारती, मंत्री प्रहलाद पटेल, धर्मेंद्र लोधी जैसे दिग्गज नेताओं की एक साथ मौजूदगी इसे खास बनाती है.. सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो लंबे अरसे वाद पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के साथ मंच पर नजर आएगी.. उमा भारती के एक हालिया ट्वीट ने इस कार्यक्रम को लेकर उत्सुकता और बढ़ा दी है, उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि वे उत्तराखंड के देवगुरु पर्वत पर एक धार्मिक अनुष्ठान में व्यस्त हैं, लेकिन इसके साथ ही प्रयास करूंगी कि 28 तारीख को भोपाल पहुंच जाऊं जैसे शब्दों ने राजनीतिक गलियारों में किंतु-परंतु की गुंजाइश छोड़ दी है, यही गुंजाइश अब इस आयोजन को साधारण से असाधारण बना रही है..
महाराजा हिरदेशशाह का इतिहास गोंडवाना क्षेत्र से जुड़ा है, लेकिन वर्तमान में उन्हें लोधी समाज के गौरव प्रतीक के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है, यह प्रवृत्ति नई नहीं है, भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का पुनर्पाठ अक्सर सामाजिक पहचान और राजनीतिक संदेश के साथ जुड़ जाता है.. हिरदेश शाह की जयंती को बलिदान दिवस के रूप में मनाना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है, जहां इतिहास और वर्तमान राजनीति एक-दूसरे से संवाद करते दिखते हैं.. यदि इस कार्यक्रम में उमा भारती, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रहलाद पटेल एक साथ मंच साझा करते हैं, तो यह केवल एक फोटो फ्रेम और फोटो ऑप नहीं होगा, लंबे समय बाद इन तीनों नेताओं की संयुक्त उपस्थिति कई संकेत दे सकती है, उमा भारती, जो लंबे समय से सक्रिय राजनीति से थोड़ी दूरी बनाए हुए थीं, यदि इस मंच पर आती हैं, तो सवाल क्या यह उनकी राजनीतिक सक्रियता के नए अध्याय का संकेत हो सकता है. डॉ. मोहन यादव, जो वर्तमान में प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, उनके लिए यह कार्यक्रम सामाजिक संतुलन और राजनीतिक संदेश दोनों का अवसर है, वहीं प्रहलाद पटेल, जो खुद लोधी समाज से आते हैं, उनके लिए यह आयोजन अपने सामाजिक आधार को सुदृढ़ करने का माध्यम बन सकता है, पहली नजर में यह कार्यक्रम लोधी समाज का एकजुटता प्रदर्शन लगता है, उमा भारती के ट्वीट में भी एकजुटता की शक्ति दिखाने की अपील इस बात को मजबूत करती है, लेकिन राजनीति में कोई भी बड़ा मंच केवल एक समाज तक सीमित नहीं रहता.. यह आयोजन भाजपा के भीतर सामाजिक  समीकरणों को साधने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, इस आयोजन में अभी समय है लेकिन परिदृश्य तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब लोधी समाज के ही विधायक प्रीतम लोधी अपनी पार्टी के निशाने पर आ जाते हैं… लेकिन 72 घंटे की मोहलत के अंदर प्रीतम के भोपाल पहुंचने ही यह मामला सशर्त निपटा दिया जाता है.. चलो जी समाज की प्रस्तावित कार्यक्रम से पहले प्रीतम से अब भाजपा का प्यार समझाया जा सकता है. मध्य प्रदेश में ओबीसी, आदिवासी और अन्य वर्गों के बीच संतुलन बनाना हमेशा से एक चुनौती और अवसर दोनों रहा है, इससे पहले किरार, धाकड़ समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले शिवराज सिंह चौहान और अब यादव समाज से मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव और इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जो लोधी समाज से आती है.. कांग्रेस को शिकायत देने में भाजपा का यह ओबीसी वोट बैंक बड़ी भूमिका पिछले दो दशक में निभा रहा है.. ऐसे में लोधी समाज, जो कई क्षेत्रों में प्रभावशाली है, उसे साधने के लिए यह मंच महत्वपूर्ण साबित हो सकता है..।
यह मंच भाजपा के भीतर भी कई स्तरों पर संदेश दे सकता है..
पहला, संगठन और सरकार के बीच तालमेल का संकेत.. दूसरा, वरिष्ठ और वर्तमान नेतृत्व के बीच सामंजस्य.. तीसरा, सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति.. मोहन काल में डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा जिस तरह से नए सामाजिक समीकरण गढऩे की कोशिश कर रही है, उसमें ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.. धार्मिक बनाम राजनीतिक आयाम उमा भारती ने अपने टवीट में जिस धार्मिक कार्यक्रम का जिक्र किया है, वह भी इस पूरे घटनाक्रम को एक अलग आयाम देता है, एक ओर वे हिमालय में तपस्या और धार्मिक अनुष्ठान में व्यस्त होने की बात कहती हैं, वहीं दूसरी ओर भोपाल आने की संभावना भी जताती हैं.. यह द्वंद्ध धर्म और राजनीति के बीच उमा भारती की पहचान का हिस्सा रहा है, और यही कारण है कि उनकी हर गतिविधि केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि व्यापक संदेश के रूप में देखी जाती है.. भोपाल में होने वाला यह कार्यक्रम कई मायनों में महत्वपूर्ण है, यह केवल महाराजा हृदयशाह की जयंती का आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता, राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व के सामंजस्य का प्रतीक बनता जा रहा है.. यदि इस मंच पर उमा भारती, डॉ. मोहन यादव और प्रहलाद पटेल एक साथ नजर आते हैं, तो यह तस्वीर मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नए अध्याय का संकेत दे सकती है.. शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि यह आयोजन केवल एक समाज विशेष तक सीमित नहीं रहेगा, इसके संदेश दूर तक जाएंगे संगठन के भीतर, सामाजिक समूहों के बीच और आने वाले चुनावी परिदृश्य तक मंच तैयार है, संकेत स्पष्ट हैं, अब नजर इस बात पर है कि 28 अप्रैल को भोपाल में तस्वीर क्या आकार लेती है.. भीड़ के मापदंड पर यह कार्यक्रम यदि गौर करने लायक होगा तो तालियां कौन बटोरता है इसको भी नजरअंदाज करना मुश्किल होगा..

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