90 प्रतिशत शिकायतें साक्ष्य के अभाव में खारिज

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और सरकारी पद के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए गठित लोकायुक्त संगठन की कार्यप्रणाली को लेकर आंकड़े कई सवाल खड़े कर रहे हैं। वर्ष 2020 से 2025 के बीच लोकायुक्त ने 1451 आपराधिक प्रकरण दर्ज किए, लेकिन इनमें सिर्फ 477 मामलों में ही कोर्ट में चालान पेश किया गया। यानी पांच साल में दर्ज मामलों के केवल 32.87 प्रतिशत में चालान अदालत तक पहुंच सका। विधानसभा के मॉनसून सत्र में विधायक बाला बच्चन के सवाल के लिखित जवाब में सरकार ने लोकायुक्त संगठन की कार्रवाई से जुड़े ये आंकड़े प्रस्तुत किए। आंकड़ों से यह भी सामने आया कि प्रकरण दर्ज होने के बाद जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में लंबा समय लग रहा है।
वर्ष 2020 से 2025 के बीच लोकायुक्त संगठन में कुल 1451 आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध किए गए। इनमें से 477 मामलों में कोर्ट में चालान पेश हुआ। यह कुल मामलों का 32.87 प्रतिशत है। इन मामलों में से अदालत में सुनवाई के बाद केवल 84 प्रकरणों में निर्णय हो सका। इनमें 55 मामलों में आरोपियों को सजा हुई, जबकि 26 प्रकरणों में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर आरोपी दोषमुक्त हो गए। तीन मामले आरोपियों की मृत्यु के कारण समाप्त कर दिए गए। इस तरह दर्ज मामलों की तुलना में अंतिम न्यायिक निर्णय तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या बेहद कम रही।
जांच में देरी को लेकर सरकार ने दिया यह तर्क
लोकायुक्त संगठन की कार्रवाई में देरी के सवाल पर सरकार की ओर से बताया गया कि शिकायत एवं जांच शाखा में प्राप्त शिकायतों पर संबंधित विभागों से जांच प्रतिवेदन मंगाया जाता है। रिपोर्ट मिलने के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाती है। इसी प्रक्रिया के कारण कार्रवाई में समय लगता है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि शिकायत से लेकर जांच, प्रकरण दर्ज करने और फिर कोर्ट में चालान पेश करने तक की प्रक्रिया लंबी होने के कारण कई मामले वर्षों तक लंबित रह सकते हैं।
90 प्रतिशत शिकायतें जांच तक नहीं पहुंचीं
लोकायुक्त संगठन के आंकड़ों में सबसे बड़ा सवाल शिकायतों के निस्तारण को लेकर सामने आता है। वर्ष 2018-19 से जनवरी 2026 तक लोकायुक्त संगठन को कुल 37,967 शिकायतें प्राप्त हुईं। इनमें से केवल 3,716 शिकायतों यानी 9.77 प्रतिशत में जांच शुरू की गई। वहीं 34,251 शिकायतें, यानी करीब 90 प्रतिशत, दस्तावेजी साक्ष्यों के अभाव में जांच के स्तर तक नहीं पहुंच सकीं। इसका मतलब यह है कि लोकायुक्त के पास पहुंचने वाली हर 10 में से करीब 9 शिकायतें प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त हो गईं। इससे शिकायतकर्ताओं की ओर से पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध कराने और लोकायुक्त की प्रारंभिक जांच प्रक्रिया, दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।
2020 से 2025 के बीच 27 हजार से ज्यादा शिकायतें
लोकायुक्त संगठन की शिकायत एवं जांच शाखा तथा तकनीकी शाखा में वर्ष 2020 से 2025 के बीच कुल 27,192 शिकायतें प्राप्त हुईं। इनमें से 24,717 शिकायतों का निराकरण किया गया, जबकि 2,475 शिकायतें जांच के लिए पंजीबद्ध की गईं। इसी अवधि में नए और पूर्व से लंबित प्रकरणों को मिलाकर कुल 2,279 प्रकरण समाप्त किए गए। आंकड़ों से स्पष्ट है कि शिकायतों की संख्या बड़ी है, लेकिन आपराधिक प्रकरण में बदलने वाली शिकायतों का अनुपात काफी कम है।
2019-20 में सबसे ज्यादा शिकायतें
वर्षवार आंकड़ों में लोकायुक्त के पास सबसे ज्यादा शिकायतें 2019-20 में 5,493 प्राप्त हुईं। इसके बाद शिकायतों की संख्या में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। सबसे कम शिकायतें 2024-25 में 4,183 दर्ज हुईं। हालांकि शिकायतों की संख्या में कमी आई है, लेकिन जांच शुरू होने वाली शिकायतों का अनुपात अभी भी सीमित है। सरकार के जवाब में यह भी बताया गया कि वर्ष 2018 से जनवरी 2026 तक सरकारी पद के दुरुपयोग से संबंधित कुल 236 प्रकरण दर्ज किए गए। लोकायुक्त का गठन सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग पर प्रभावी कार्रवाई के लिए किया गया है। ऐसे में प्रकरण दर्ज होने के बाद चालान पेश करने में लगने वाला समय और पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में मामलों का खत्म होना संस्था की प्रभावशीलता के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है।
सवाल यह कि शिकायत से सजा तक कितने मामले पहुंच रहे?
लोकायुक्त के आंकड़ों में सबसे अहम अंतर शिकायत से लेकर अंतिम सजा तक की प्रक्रिया में दिखाई देता है। हजारों शिकायतों में से कुछ ही जांच तक पहुंचती हैं, जांच से आपराधिक प्रकरण बनने वाले मामलों की संख्या और कम होती है और दर्ज मामलों में भी एक-तिहाई से कम में पांच साल के दौरान चालान पेश हुआ। अदालत में निर्णय वाले 84 मामलों में 55 में सजा हुई है। यानी जिन मामलों में अभियोजन अदालत में प्रभावी ढंग से पहुंचा और निर्णय हुआ, वहां सजा का अनुपात अपेक्षाकृत बेहतर रहा। असली चुनौती शिकायत से जांच, जांच से प्रकरण और प्रकरण से चालान तक की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने की दिखाई देती है।

Related Articles