गौशालाओं में गौवंश कम, भूसा खरीदी का हिसाब लाखों में

गौशालाओं में गौवंश कम
  • रजिस्टर में दर्ज संख्या और मौके की हकीकत में बड़ा अंतर, कई गौशालाओं में हजारों से लाखों रुपए के भूसे की खरीदी

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में सरकार की कोशिश है कि सडक़ों पर घुमने वाले गोवंश को गोशालाओं में रखा जाए ताकि उनकी ठीक ढ़ंग से देखरेख हो सके। इसके लिए गौशालाओं को कई तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। लेकिन देखा जा रहा है कि प्रदेश में गौ संरक्षण के नाम पर गौशालाओं में गायों की संख्या अधिक दिखाकर उनके चारे के लिए मिलने वाली राशि में गोलमाल दिया जा रहा है। ऐसा ही मामला दतिया जिले में सामने आया है। दतिया जिले में गौवंश संरक्षण के लिए संचालित गौशालाओं में दर्ज गौवंश की संख्या और मौके पर मौजूद गौवंश के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। खास बात यह है कि जिन गौशालाओं में निरीक्षण के दौरान दर्ज संख्या से काफी कम गौवंश मिले, उन्हीं के रिकॉर्ड में अलग-अलग तारीखों पर बड़ी राशि के भूसे की खरीदी दर्ज है। इससे गौशालाओं में गौवंश की वास्तविक संख्या, भूसे की जरूरत और खरीदी-भुगतान की प्रक्रिया की निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं। जांच-पड़ताल में जिले के सेंवदा, भांडेर और दतिया विकासखंड की कई गौशालाओं में यह अंतर सामने आया। डिरौलीपार गौशाला में रिकॉर्ड के अनुसार 50 गौवंश दर्ज हैं। यहां 8 सितंबर 2026 को 48,750 रुपए और 24 अगस्त को 58,280 रुपए के भूसे की खरीदी दर्ज है। निरीक्षण के दौरान गौशाला की व्यवस्थाओं में अन्य खामियां भी सामने आईं। यहां नाबालिग से काम कराया जा रहा था। भांडेर विकासखंड की पंडोखर गौशाला में स्थिति और अधिक चौंकाने वाली मिली। रिकॉर्ड में यहां 74 गौवंश दर्ज हैं, जबकि निरीक्षण के दौरान मौके पर केवल एक गौवंश मिला। ऐसे में रजिस्टर में दर्ज संख्या के आधार पर होने वाली व्यवस्थाओं और वास्तविक जरूरत के बीच अंतर की जांच जरूरी हो जाती है।
दतिया की बीकर गौशाला में भी अंतर
दतिया विकासखंड की बीकर गौशाला में रिकॉर्ड के अनुसार 90 गौवंश हैं, जबकि निरीक्षण के दौरान करीब 40 गौवंश मिले। यहां 4 जनवरी को 94,240 रुपए और 26 अगस्त को 88,800 रुपए के भूसे की खरीदी दर्ज है। रिकॉर्ड में 28 अगस्त को 50 हजार, 10 सितंबर को 35 हजार, 25 सितंबर को 30 हजार और 29 सितंबर को 20 हजार रुपए के भूसे की खरीदी भी दर्ज है। इन भुगतानों के मुकाबले मौके पर मौजूद गौवंश की संख्या का अंतर यह सवाल खड़ा करता है कि भूसे की वास्तविक खपत का सत्यापन किस आधार पर किया गया।
आठ गौवंश, लेकिन 1.58 लाख के भूसे की खरीदी
कसेरुआ गौशाला के रिकॉर्ड में 73 गौवंश दर्ज हैं, जबकि निरीक्षण के दौरान मौके पर केवल आठ गौवंश मिले। यहां 30 अगस्त को 1 लाख 58 हजार 400 रुपए के भूसे की खरीदी दर्ज है। गुमानपुरा गौशाला में भी इसी तरह का अंतर मिला। रिकॉर्ड में 50 गौवंश दर्ज हैं, लेकिन मौके पर केवल चार गौवंश मिले। यहां 10 सितंबर को 26,350 रुपए के भूसे की खरीदी दर्ज है। इसी तारीख को 32 हजार और 38,250 रुपए के भूसे की अन्य खरीदी का रिकॉर्ड भी सामने आया। बघावली गौशाला में 50 गौवंश दर्ज हैं, जबकि मौके पर 24 गौवंश मिले। यहां 30 अगस्त को 63 हजार और 20 अप्रैल को 92,400 रुपए के भूसे की खरीदी दर्ज है। ग्यारा की गौशाला में रिकॉर्ड में 93 गौवंश दर्ज हैं, जबकि मौके पर 44 गौवंश मिले।
83 में से 66 गौशालाएं ही संचालित मिलीं
जिले में कुल 83 गौशालाएं संचालित हैं। प्रभारी जिला पंचायत सीईओ के निरीक्षण में इनमें से 66 गौशालाएं संचालित मिलीं। ऐसे में शेष गौशालाओं की स्थिति के साथ-साथ उन गौशालाओं के रिकॉर्ड की भी विस्तृत जांच जरूरी है, जहां रजिस्टर में दर्ज गौवंश और मौके पर मिले गौवंश की संख्या में बड़ा अंतर है। गौशालाओं में भूसा खरीदी का भुगतान सामान्यत: दर्ज गौवंश और उनकी जरूरत के आधार पर होना चाहिए। इसलिए प्रत्येक गौशाला के गौवंश रजिस्टर, उपस्थिति, भूसा खरीदी, बिल-वाउचर, भुगतान और वास्तविक खपत का आपस में मिलान कराना जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि रिकॉर्ड में दर्ज गौवंश की संख्या और खरीदे गए भूसे की मात्रा वास्तविक जरूरत के अनुरूप थी या नहीं। पड़ताल में सामने आए आंकड़े फिलहाल रिकॉर्ड और निरीक्षण के बीच अंतर को उजागर करते हैं। इस अंतर की वास्तविक वजह क्या है, यह प्रशासनिक स्तर पर दस्तावेजों और मौके के संयुक्त भौतिक सत्यापन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

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