
- मोहन ‘राज’ में साकार हो रहा नारी शक्ति से आत्मनिर्भर भारत का संकल्प
लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) भले ही पारित नहीं हो पाया है, लेकिन मोहन ‘राज’ में नारी शक्ति से आत्मनिर्भर भारत का संकल्प पूरा हो रहा है। आज गांव से लेकर ग्लोबल मंच तक मप्र की महिलाएं उभर रहीं हैं। सरकार के प्रयासों का परिणाम है कि आज मप्र महिला सशक्तिकरण का राष्ट्रीय मॉडल बन गया है।
विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। जब किसी राज्य का नेतृत्व केवल योजनाएं नहीं बनाता, बल्कि स्वयं जनभावनाओं के साथ जुडक़र उन्हें सशक्त करता है, तब एक नई क्रांति जन्म लेती है। मप्र में महिला सशक्तिकरण की यही क्रांति मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में आकार ले रही है। एक ओर जहां राज्य की महिलाएं आर्थिक, सामाजिक और डिजिटल रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं, वहीं दूसरी ओर मप्र पूरे देश के लिए महिला सशक्तिकरण मॉडल के रूप में उभर कर सामने आया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का स्पष्ट मानना है कि जब तक नारी सक्षम नहीं होगी, समाज समृद्ध नहीं हो सकता। यही सोच आज प्रदेश की नीतियों, योजनाओं और जमीनी बदलावों में साफ नजर आती है। उन्होंने ग्रामीण स्व-सहायता समूहों से लेकर शहरी महिला उद्यमिता, सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा तक, बहुआयामी हस्तक्षेपों के जरिए महिलाओं को सशक्त बनाने की मजबूत आधारशिला रखी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की नेतृत्व क्षमता, दूरदर्शी सोच और समाज के हर वर्ग को जोडऩे की रणनीति ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर संकल्प मजबूत हो, तो परिवर्तन संभव है। आज मप्र की महिलाएं घरेलू भूमिकाओं से निकलकर उद्यम, प्रशासन, शिक्षा, और नवाचार के हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं। मप्र में लाड़ली बहना योजना सबसे प्रभावशाली पहल बन चुकी है। इस योजना के तहत अब तक 1.26 करोड़ महिलाओं को प्रतिमाह 1551.86 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे उनके खातों में ट्रांसफर की जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लाड़ली बहनों को भाई दूज से 1500 रुपये की राशि देने का निर्णय लिया है। अब तक 43 हजार 376 करोड़ रुपये से अधिक की आर्थिक सहायता दी जा चुकी है, जिससे महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के साथ-साथ डिजिटल लेन-देन में दक्ष बन रही हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा शुरू की गई लखपति दीदी योजना के अंतर्गत प्रदेश की 1 लाख से अधिक महिलाएं प्रति वर्ष 1 लाख से अधिक की आय अर्जित कर रही हैं। लक्ष्य है कि 5 लाख से अधिक स्व-सहायता समूहों के माध्यम से 62 लाख महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाए। ये महिलाएं अब लघु उद्योग, कृषि, हस्तशिल्प और सेवा क्षेत्र में नए अवसर सृजित कर रही हैं।
राज्य की लोकप्रिय लाड़ली लक्ष्मी योजना के तहत 2024-25 में 2.73 लाख बालिकाओं का पंजीकरण किया गया और 223 करोड़ रुपये की छात्रवृत्तियाँ वितरित की गईं। अब तक इस योजना से 50 लाख से अधिक बेटियाँ लाभान्वित हो चुकी हैं। स्वच्छता क्षेत्र में, किशोरियों के लिए 19 लाख से अधिक सैनिटेशन किट्स वितरित की गईं और 57 करोड़ रुपये की सहायता दी गई, जिसे यूनिसेफ ने भी सराहा है। राज्य में महिला हेल्पलाइन 181, 112 आपात सेवा, महिला पुलिस थाने, साइबर हेल्पलाइन, और महिला आरक्षी भर्ती जैसे कदमों ने महिला सुरक्षा की दिशा में ठोस बदलाव लाए हैं। अब तक 1.5 लाख से अधिक महिलाओं को समय पर सहायता प्रदान की जा चुकी है। राज्य सरकार ने सरकारी सेवाओं में 35 प्रतिशत और स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर महिलाओं को निर्णयात्मक भूमिकाओं में आगे बढ़ाया है। वर्ष 2025-26 के जेंडर बजट में 19,021 करोड़ रुपये की वृद्धि की गई है और महिला कल्याण पर कुल 1.21 लाख करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। लोकमाता अहिल्या बाई होल्कर की 300वीं जयंती पर आरंभ देवी अहिल्या नारी सशक्तिकरण मिशन महिलाओं को स्टार्टअप, निवेश, और कौशल विकास से जोड़ रहा है। अब तक 8.10 करोड़ रुपये के निवेश पत्र वितरित किए जा चुके हैं। एमएसएमई क्षेत्र में 850 से अधिक इकाइयों को 275 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई है, जिससे महिला उद्यमिता को मजबूत आधार मिला है। रेडीमेड गारमेंट उद्योग में कार्यरत महिलाओं को प्रतिमाह ?5000 की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। मप्र अब केवल भूगोलिक दृष्टि से देश के हृदय में नहीं है, बल्कि महिला सशक्तिकरण की धडक़न भी यहीं से तेज़ हो रही है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के मार्गदर्शन में यह राज्य आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में नारी शक्ति को केंद्र में रखते हुए नई इबारत लिख रहा है- जो आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय नहीं, वैश्विक मॉडल बन सकता है।
योजनाओं में महिलाओं को प्राथमिकता
मप्र में राज्य सरकार की कई योजनाओं में महिलाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। स्व-सहायता समूह (एसएचजी) के ग्रुप के माध्यम से काम और कम दरों पर बैक से ऋण दिए जा रहे हैं। लाड़ली बहना योजना से महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए 1500 रुपए की राशि दिी जा रही है। आवास योजनाओं और स्वरोजगार योजनाओं में महिलाओं को विशेष लाभ मिल रहा है। कई योजनाओं में संपत्ति महिला के नाम पर देने को प्रोत्साहित किया जा रहा है। मप्र में महिला-नेतृत्व विकास की दिशा में लगातार ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य, पोषण और आर्थिक सहयोग को ध्यान में रखते हुए संचालित प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना उल्लेखनीय परिणाम दे रही है। वर्ष 2025-26 में इस योजना के अंतर्गत राज्य ने 91 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। महिला एवं बाल विकास मंत्री सुश्री निर्मला भुरिया ने कहा कि यह सफलता राज्य सरकार के महिला सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्ध प्रयासों और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का प्रमाण है। योजना के माध्यम से न केवल मातृ स्वास्थ्य को सुदृढ़ किया जा रहा है, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच को भी बढ़ावा मिल रहा है। यह योजना भारत सरकार द्वारा 1 जनवरी 2017 से लागू की गई है, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के प्रावधानों के अनुरूप संचालित है। योजना का मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को आंशिक वेतन हानि की भरपाई हेतु आर्थिक सहायता प्रदान करना तथा विशेष रूप से दूसरी संतान के रूप में बालिका जन्म को प्रोत्साहित करना है। योजना में प्रथम प्रसव पर महिलाओं को 5,000 रुपये की राशि दो किश्तों में प्रदान की जाती है, जबकि दूसरी संतान के रूप में बालिका के जन्म पर 6,000 रुपये की राशि एकमुश्त दी जाती है। प्रदेश में योजना की शुरुआत से अब तक 52.5 लाख से अधिक हितग्राही पंजीकृत किए जा चुके हैं। वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 में 6.61 लाख के लक्ष्य के विरुद्ध 6.01 लाख हितग्राहियों का पंजीयन किया गया, जो कि 91 प्रतिशत उपलब्धि को दर्शाता है। मप्र में महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई अहम कदम उठाए हैं। प्रदेश में महिलाओं को सरकारी नौकरियों, स्थानीय निकायों और राजनीति सहित विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण और प्राथमिकता दी जा रही है। इससे महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और वे हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। मप्र में महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया है। यह आरक्षण मुख्य रूप से सीधी भर्ती में लागू होता है। पहले यह 33 प्रतिशत था, जिसे बढ़ाकर 35 प्रतिशत किया गया है। एमपीपीएससी और अन्य विभागीय भर्तियों में इसका लाभ महिलाओं को मिल रहा है। प्रदेश के वन विभाग सहित कई अन्य विभागों में भी महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया है। इससे पारंपरिक रूप से पुरुष प्रधान माने जाने वाले क्षेत्रों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, जिला पंचायत और नगरीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत तक आरक्षण दिया गया है। इसके चलते बड़ी संख्या में महिलाएं सरपंच, पार्षद और महापौर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर पहुंची हैं और स्थानीय शासन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। प्रदेश में ग्राम पंचायत से जिला पंचायत स्तर तक तीन लाख 95 हजार 552 जनप्रतिनिधि हैं। इनमें 2 लाख नौ हजार 41 महिला जनप्रतिनिधि हैं। यह 52 प्रतिशत से अधिक हैं।
महिलाएं चला रही हैं ग्रामीण सरकार
प्रदेश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ रही है। पंचायत स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुका है, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में उल्लेखनीय वृद्धि है। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत-तीनों स्तरों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। कुल जनप्रतिनिधियों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 52.84 प्रतिशत दर्ज की गई है। ग्राम पंचायत स्तर पर महिला प्रतिनिधियों का प्रतिशत करीब 52.83 प्रतिशत है, जबकि जनपद पंचायत में यह आंकड़ा 53.22 प्रतिशत तक पहुंच गया है। जिला पंचायत में भी महिलाओं की भागीदारी 53.71 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो दर्शाता है कि नेतृत्व के उच्च स्तर पर भी महिलाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। मप्र में पंचायत राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, इसके विपरीत 52.84 प्रतिशत महिलाएं पंचायत राज संस्थाओं में ग्रामीण सरकार का नेतृत्व कर रही हैं। इनमें पंच, सरपंच, जनपद पंचायत की सदस्य, अध्यक्ष और जिला पंचायत के अध्यक्ष व सदस्य शामिल हैं। अभी 2,09,041 महिलाएं ग्रामीण विकास की बागडोर मजबूती से संभाल रही हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत संसद और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने से इन महिलाओं में नई उम्मीद जागी है। मप्र उन अग्रणी राज्यों में शामिल है, जिसने महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया। आज राज्य के कुल निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से लगभग 52.84 प्रतिशत महिलाएं हैं। राज्य की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में कुल 3,95,552 निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या 2,09,041 है। मप्र ने पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान लागू किया है। यह देश के उन 21 राज्यों में से एक है जिन्होंने संवैधानिक रूप से अनिवार्य 33 प्रतिशत से अधिक आरक्षण प्रदान किया है। राज्य की 313 जनपद पंचायतों में 179 में महिलाओं का नेतृत्व है। 52 जिला पंचायतों में भी आधे में महिला जिलाध्यक्ष हैं। प्रदेश में जारी नारी शक्ति वंदन पखवाड़ा इन जनप्रतिनिधियों के आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दे रहा है। जिला पंचायत से लेकर ग्राम पंचायत की गलियों तक, महिला नेतृत्व शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे मुद्दों पर संवेदनशीलता के साथ काम कर रहा है। कभी घूंघट की ओट में रहने वाली बेटियां आज पंचायतों में विकास का एजेंडा तय कर रही हैं, जिससे ग्रामीण लोकतंत्र अधिक समावेशी और सशक्त हुआ है। मप्र के पंचायत राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि पंचायत राज संस्थाओं में महिलाओं का आगे रहना हमारे लिए गर्व की बात है। विभागीय जानकारी अनुसार कुल 23 हजार 11 निर्वाचित सरपंचों में से 11 हजार 683 महिलाएं हैं, जो ग्रामीण नेतृत्व में महिलाओं की सशक्त भूमिका को दर्शाती है। वहीं 3 लाख 64 हजार 895 निर्वाचित पंचों में से 1 लाख 93 हजार 284 महिला प्रतिनिधि चुनी गई हैं। जनपद पंचायत स्तर पर भी महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय है। कुल 313 निर्वाचित जनपद पंचायत अध्यक्षों में से 179 महिलाएं हैं। इसी प्रकार 6 हजार 458 जनपद पंचायत सदस्यों में से 3 हजार 425 महिलाएं निर्वाचित हुई हैं। 52 जिला पंचायत अध्यक्षों में से 26 महिलाएं हैं, जबकि 823 जिला पंचायत सदस्यों में 444 महिला जनप्रतिनिधि निर्वाचित हुई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बढ़ता ग्राफ न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का भी प्रतीक है। पंचायतों में महिलाओं की सक्रिय भूमिका से ग्रामीण विकास योजनाओं में पारदर्शिता और प्राथमिकताओं में बदलाव देखने को मिल रहा है। महिलाएं अब केवल प्रतिनिधि नहीं हैं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। जल, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर उनका फोकस ग्रामीण जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रहा है। सरकारी योजनाओं और आरक्षण नीति के प्रभाव से महिलाओं को नेतृत्व के अवसर मिल रहे हैं, जिससे वे आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ समाज में नई पहचान भी स्थापित कर रही हैं।
महिलाओं के हाथों में होम-स्टे की कमान
गांव की महिलाएं स्वयं होम-स्टे का संचालन कर रही हैं। पर्यटकों के स्वागत से लेकर भोजन व्यवस्था, आवास और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रबंधन तक की पूरी जिम्मेदारी वे ही निभाती हैं। इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि सास-बहू, देवरानी-जेठानी जैसे रिश्ते केवल पारिवारिक संबंध ही नहीं, बल्कि सहयोग और विश्वास के मजबूत आधार भी बन सकते हैं। यही साझेदारी आज छिंदवाड़ा के ग्रामीण पर्यटन को नई पहचान दे रही है और महिलाओं को आत्मनिर्भर बन रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि होम-स्टे की यह पहल गांव की महिलाओं को सशक्त बनाने के साथ-साथ पर्यटन ग्रामों की पहचान भी तेजी से बढ़ा रही है। आने वाले समय में यहां पर्यटन गतिविधियों के और विस्तार की संभावनाएं भी दिखाई दे रही हैं। सास-बहू, मां-बेटी या देवरानी-जेठानी के रिश्तों को अक्सर तकरार और मतभेद के उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पर्यटन ग्राम इन धारणाओं को बदलते हुए एक नई मिसाल कायम कर रहे हैं। जिले के गॉवों की महिलाएं आपसी सहयोग और विश्वास के साथ होम-स्टे चला रही हैं और रिश्तों की मजबूती को तरक्की की नई राह में बदल रही हैं। पर्यटन ग्राम धूसावानी की श्रीमती मनेशी धुर्वे और अलका धुर्वे रिश्ते में सास-बहू हैं, लेकिन जब उनके होम-स्टे में पर्यटक आते हैं तो दोनों मिलकर पूरे उत्साह से मेहमाननवाजी में जुट जाती हैं। इसी तरह सावरवानी में श्रीमती मालती यदुवंशी अपनी सास श्रीमती शारदा यदुवंशी के साथ मिलकर होम-स्टे का संचालन कर रही हैं। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि पूरे जिले में उभरती एक नई सामाजिक और आर्थिक तस्वीर है, जहां रिश्तों की साझेदारी महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही है। छिंदवाड़ा के पर्यटन ग्रामों में चल रहे होम-स्टे केवल आय का साधन नहीं हैं, बल्कि ये महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान और आत्मविश्वास का भी प्रतीक बन चुके हैं। यहां सास-बहू, मां-बेटी और देवरानी-जेठानी मिलकर पर्यटकों का स्वागत करती हैं, भोजन तैयार करती हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। इन रिश्तों की सामूहिक ताकत ने यह साबित किया है कि जब परिवार की महिलाएं साथ मिलकर काम करती हैं, तो घर ही नहीं बल्कि पूरा गांव विकास की राह पर आगे बढ़ सकता है। मध्यप्रदेश में सर्वाधिक होम-स्टे संचालित करने वाले जिलों में शामिल छिंदवाड़ा में इस समय 50 से अधिक होम-स्टे संचालित हैं। खास बात यह है कि इन सभी होम-स्टे का पंजीयन महिलाओं के नाम पर किया गया है और संचालन की अधिकांश जिम्मेदारी भी महिलाएं ही संभाल रही हैं। सावरवानी, चोपना, काजरा, देवगढ़, चिमटीपुर, गुमतरा और धूसावानी जैसे पर्यटन ग्रामों में स्थानीय महिलाएं पारंपरिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ पर्यटन गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। गांव की महिलाएं पर्यटकों के लिए पारंपरिक और स्वादिष्ट स्थानीय व्यंजन तैयार करती हैं। इसके साथ ही वे लोकनृत्य और लोक गायन से क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी पर्यटकों को परिचित कराती हैं। इससे पर्यटकों को ग्रामीण जीवन और संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिलता है, वहीं महिलाओं को आय का सम्मानजनक साधन भी प्राप्त हो रहा है।
हर चौथी एमएसएमई इकाई की मालिक महिला
मप्र में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी से जुड़े आंकड़े भी नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। मप्र में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक राज्य में अब हर चौथी एमएसएमई इकाई महिला उद्यमियों के नेतृत्व में संचालित हो रही है। यह बदलाव न केवल महिलाओं की आत्मनिर्भरता को दर्शाता है, बल्कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था में उनके बढ़ते योगदान को भी रेखांकित करता है। 28 फरवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार मप्र में कुल 8,87,087 पंजीकृत एमएसएमई इकाइयां हैं। इनमें से 2,28,959 इकाइयों का संचालन महिलाएं कर रही हैं। यानी प्रदेश की लगभग हर चौथी एमएसएमई इकाई महिला उद्यमियों के हाथ में है, जो आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत संकेत है। महिला उद्यमियों की बढ़ती संख्या का असर रोजगार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। वर्ष 2020-21 में जहां एमएसएमई क्षेत्र में 1,53,493 महिलाएं कार्यरत थीं, वहीं 2026 तक यह संख्या बढक़र 10,07,995 हो गई है। यह छह गुना से अधिक की वृद्धि दर्शाती है कि महिलाएं न केवल खुद आगे बढ़ रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। वर्ष 2020-21 में उद्यम पोर्टल शुरू होने के बाद महिला उद्यमियों की संख्या में तेजी आई। उस समय 14,239 महिला स्वामित्व वाले एमएसएमई थे। 2022-23 में यह बढक़र 2,07,795 और 2023-24 में 7,44,746 तक पहुंच गई। 2025-26 में यह संख्या 2,28,959 पर दर्ज की गई है। देशभर में भी महिला उद्यमिता तेजी से आगे बढ़ रही है। उद्यम पोर्टल पर अब तक 3.07 करोड़ महिला नेतृत्व वाले एमएसएमई पंजीकृत हो चुके हैं। महाराष्ट्र एमएसएमई पंजीकरण में अग्रणी है, जबकि महिला नेतृत्व वाले उद्यमों में आंध्र प्रदेश शीर्ष पर है। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु भी इस सूची में मजबूत स्थिति में हैं। मप्र के ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं अब सिर्फ घर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यवसाय और उद्योग में भी अपनी मजबूत पहचान बना रही हैं। यह बदलाव नारी शक्ति के सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बढ़ते कदम को दर्शाता है। महिला उद्यमियों की इस बढ़ती संख्या ने मप्र में रोजगार के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि पिछले 6 सालों में एमएसएमई के माध्यम से महिलाओं को काम मिलने की रफ्तार में जबरदस्त उछाल आया है। वर्ष 2020-21 में जहां राज्य के एमएसएमई में केवल 1,53,493 महिलाएं कार्यरत थीं, वहीं 28 फरवरी 2026 तक यह संख्या बढक़र 10,07,995 हो गई है। यह 6 गुना से अधिक की बढ़ोत्तरी बताती है कि महिला उद्यमी न केवल खुद को स्थापित कर रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी बड़े पैमाने पर आजीविका के रास्ते खोल रही हैं। कभी घर की जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली नीमच जिले के ग्राम बमोरा की प्रेमलता पाटीदार आज एक सफल उद्यमी के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना ने उनके सपनों को पंख देकर आत्मनिर्भरता की नई राह दिखाई है। प्रेमलता बताती हैं कि वे हमेशा कुछ अपना करना चाहती थीं, लेकिन संसाधनों की कमी और मार्गदर्शन के अभाव में आगे बढऩा आसान नहीं था। इसी दौरान उन्हें उद्यानिकी विभाग के माध्यम से पीएमएफएमई योजना की जानकारी मिली। योजना के तहत उन्होंने 23.61 लाख रुपये की लागत से ‘बालाजी उद्योग’ नाम से खाद्य तेल प्रसंस्करण इकाई स्थापित की। उद्योग की स्थापना के लिए उन्होंने नीमच जिले में भारतीय स्टेट बैंक की जीरन शाखा से 20 लाख रुपये का ऋण प्राप्त किया। शासन की ओर से उन्हें 8.26 लाख रुपये का अनुदान भी मिला, जिससे उनका आत्मविश्वास और मजबूत हुआ। प्रेमलता ने ‘गोपाल कृष्ण’ नाम के ब्रांड से कोकोनट ऑयल का पंजीयन कराया और अपने उत्पाद को बाजार में उतारा। गुणवत्तापूर्ण उत्पाद और निरंतर मेहनत के बल पर उनका व्यवसाय तेजी से आगे बढ़ा। आज उनका मासिक टर्नओवर लगभग 8 से 10 लाख रुपये है और वे प्रतिमाह 2 से 3 लाख रुपये की शुद्ध आय अर्जित कर रही हैं। सालाना लाभ लगभग 30 लाख रुपये से अधिक पहुंच चुका है। प्रेमलता की सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। उन्होंने अपने उद्योग में 7 स्थानीय लोगों को रोजगार देकर गांव में आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया है। वे कहती हैं कि सरकार की योजना ने मुझे हिम्मत दी, लेकिन सफलता मेहनत और विश्वास से मिली। नीमच जिले में पीएमएफएमई योजना का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है। जिले में अब तक 210 हितग्राहियों को योजना से लाभान्वित किया गया है, जबकि चालू वित्तीय वर्ष में 125 नए उद्योग स्थापित हुए हैं। इस उपलब्धि के साथ नीमच जिला प्रदेश और संभाग के अग्रणी जिलों में शामिल हो गया है। प्रेमलता पाटीदार की यह कहानी बताती है कि आत्म विश्वास के साथ सही मार्गदर्शन और सरकारी सहयोग मिल जाये तो एक गृहिणी भी सफल उद्योगपति बन सकती है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण का सशक्त उदाहरण है।
