
- भाजपा-कांग्रेस की मिशन 2028 की तैयारी…
मप्र में सत्ता का फाइनल 2028 में होगा। इससे पहले प्रदेश की दोनों पार्टियों की परीक्षा सेमीफाइनल माने जाने वाले नगरीय निकाय चुनाव में होगी। ऐसे में दोनों पार्टियां का फोकस अपने-अपने संगठन को गढऩे या मजबूत और जवाबदार बनाने पर है।
गौरव चौहान/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। मप्र में भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां मिशन 2028 की तैयारी में जुट गई हैं। सत्ता में बरकरार रहने के लिए भाजपा, सरकार और संघ संयुक्त रणनीति बनाकर काम कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस भी पूरे दल बल के साथ मोर्चा तैयार कर रही है। लेकिन इससे पहले दोनों पार्टियों की रणनीति की परीक्षा 2027 में होने वाले नगरीय निकाय चुनाव में होगी। इसलिए दोनों पार्टियां अपने-अपने संगठन को मजबूत करने और पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं को संगठित करने में जुट गई हैं। वैसे तो 2023 के बाद से मप्र में राजनीति का नया दौर शुरू हो गया है। यानी भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों का फोकस वरिष्ठ नेताओं के स्थान पर युवा और तीसरी पीढ़ी के नेताओं पर है। मप्र भाजपा में 2023 विधानसभा चुनाव के बाद से ही स्पष्ट पीढ़ी परिवर्तन देखने को मिल रहा है, जिसके तहत वरिष्ठ नेताओं के स्थान पर युवा और तीसरी पीढ़ी के नेताओं को कमान सौंपी जा रही है। मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. मोहन यादव का चयन इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। पार्टी पुरानी पीढ़ी को हटाकर नए चेहरों के साथ मिशन 2028 और 2029 की तैयारी कर रही है। पीढ़ी परिवर्तन भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति है, जिसका उद्देश्य पार्टी को युवा बनाना और नए नेतृत्व को तैयार करना है। इसी रणनीति के तहत हेमंत खंडेलवाल जैसे ऊर्जावान नेताओं को प्रमुख सांगठनिक जिम्मेदारियां दी गई हैं। हितानंद शर्मा जैसे संगठन महामंत्री की संघ में वापसी और नए पदाधिकारियों की नियुक्ति के साथ संगठन में 50 प्रतिशत से ज्यादा नए चेहरे सामने आए हैं। वहीं प्रदेश भाजपा के अनुषांगिक संगठनों की जो टीमें घोषित की गई हैं, उनमें 90 प्रतिशत पदों पर नए कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं मप्र में संगठन सृजन अभियान के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा है। इस अभियान के बाद प्रदेश की कांग्रेस अब काफी हद तक नई पीढ़ी के नेताओं के हाथों में आ गई है। करीब 40-45 वर्ष बाद पार्टी ने प्रदेश स्तर पर नेतृत्व में पीढ़ी परिवर्तन की जो पहल की थी, उसका असर अब संगठन और नेतृत्व दोनों में स्पष्ट रूप से नजर आने लगा है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने संगठन में महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए कमलनाथ को प्रदेश नेतृत्व से हटाकर युवा नेता जीतू पटवारी को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दी थी। इसी के साथ पार्टी ने आदिवासी नेता उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी। अब जीतू पटवारी और उमंग सिंघार की यह नई जोड़ी प्रदेश में कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और पार्टी को पुनर्जीवित करने के प्रयास में जुटी हुई है। पार्टी के भीतर इसे नेतृत्व परिवर्तन की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के तहत संगठन में व्यापक बदलाव किए हैं। पार्टी ने इस अभियान के दौरान पदाधिकारियों के लिए उम्र सीमा 50 वर्ष से कम तय की थी। इसके अनुसार संगठन के सभी स्तरों ब्लॉक, जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर लगभग आधे पदाधिकारियों की नियुक्ति 50 वर्ष से कम उम्र के नेताओं में से की गई है। इसके अलावा नई व्यवस्था के तहत किसी भी व्यक्ति को एक पद पर 5 वर्ष से अधिक नहीं रखा जाएगा, ताकि संगठन में लगातार नए नेताओं को अवसर मिल सके। कांग्रेस की नई नीति का असर प्रदेश नेतृत्व में भी दिखाई देता है। जीतू पटवारी और उमंग सिंघार दोनों को लगभग 50 वर्ष की उम्र में ही बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी। वर्तमान में दोनों नेता 52 वर्ष के होने वाले हैं। यह बदलाव कांग्रेस की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत पार्टी युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाना चाहती है। मप्र भाजपा में भी नेतृत्व परिवर्तन देखने को मिला है। वर्तमान में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में हेमंत खंडेलवाल दोनों ही अपेक्षाकृत नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं। यदि दोनों दलों में नेतृत्व परिवर्तन की तुलना की जाए तो भाजपा में यह बदलाव अपेक्षाकृत आसानी से स्वीकार किया गया, जबकि कांग्रेस में शुरुआत में कुछ हिचक देखने को मिली। हालांकि अब पार्टी का पुराना नेतृत्व भी नए नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहा है। दरअसल, 1985-90 के दौर में भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व ने जिस पीढ़ी को आगे बढ़ाया था, वही लंबे समय तक मप्र की राजनीति में सक्रिय रही। उस समय शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, नरोत्तम मिश्रा और जयंत मलैया जैसे नेताओं को विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उतारा गया था।
संगठन में नए चेहरों को जगह
गौरतलब है कि मप्र में भाजपा पीढ़ी परिवर्तन के दौर में है। यही वजह है कि पार्टी के संगठनात्मक नियुक्तियों में नए चेहरों को जगह मिल रही है। सरकारी पदों पर राजनीतिक नियुक्तियों में भी नए कार्यकर्ताओं को महत्व दिए जाने की कवायद की जा रही है। मप्र में आने वाले कुछ वर्षों में भाजपा की कमान पूरी तरह से नए और युवा हाथों में होगी, इसके संकेत मिलने लगे हैं। भारतीय जनता युवा मोर्चा से लेकर महिला मोर्चा, पिछड़ा वर्ग मोर्चा और अनुसूचित जाति मोर्चा में ऐसे युवाओं को दायित्व सौंपे गए हैं, जो फिलहाल संगठन की मुख्य धारा से दूर नजर आते थे। दरअसल प्रदेश भाजपा के अनुषांगिक संगठनों की जो टीमें घोषित की गई हैं, उनमें 90 प्रतिशत पदों पर नए कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। जानकारों का कहना है कि यह पूरी कवायद पीढ़ी परिवर्तन के तौर पर देखी जा रही है। जानकारों का कहना है कि भाजपा संगठन में युवाओं को अधिक महत्व देना संघ की रणनीति का हिस्सा है। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ युवाओं को अपनी विचारधारा से जोडऩे के लिए काफी समय से सक्रिय है। अब यही काम भाजपा द्वारा किया जा रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा जिलों के प्रवास के दौरान युवाओं से सीधा संवाद किया जाता है, तो उनके कार्यकर्ता घर-घर जाकर युवाओं को भाजपा की विचारधारा से अवगत करा रहे हैं। राज्य सरकार भी अपनी योजनाओं के जरिए युवाओं को तमाम सुविधाएं देकर उन्हें जहां रोजगार युक्त बना रही है, तो वहीं ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि देश के युवाओं को भाजपा की सरकार आगे बढ़ा रही है। भाजपा से जुड़े सूत्रों की मानें तो संघ ने शताब्दी वर्ष के दौरान अपने संकल्पों में युवाओं को आगे बढ़ाने की बात कही है। हरियाणा में संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक में इस विषय पर चर्चा भी की गई है। पिछले दिनों भोपाल के शारदा विहार परिसर में संघ और भाजपा संगठन की समवन्य बैठक में भी इस विषय पर मंथन किया गया है। इसमें भाजपा ने संघ की मंशानुरूप संगठन में युवाओं को ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व दिए जाने की बात कही थी। भाजपा जिस तरह अपने मोर्चों में अधिक से अधिक नए चेहरों को शामिल कर रही है, उससे संभावना जताई जा रही है कि प्रदेश में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों में भी युवाओं को महत्व मिलेगा। जानकारों की मानें तो प्रदेश सरकार जब भी निगम-मंडलों के पदों पर नियुक्तियों की घोषणा करेगी, तब अधिकांश पदों पर ऐसे कार्यकर्ता दिखाई देंगे, जो पहली बार इन पदों पर बैठेंगे। दो बार इन पदों पर रह चुके कार्यकर्ताओं को किसी भी स्थिति में मौका नहीं मिलेगा। कहा जा रहा है कि भाजपा संगठन ऐसा रणनीति के तहत कर रही है। इन पदों पर बैठाकर पार्टी अपना नया नेतृत्व तैयार करेगी, जिससे भविष्य में उन्हें बड़े चुनावों में मैदान में उतारा जा सके।
वहीं कांग्रेस भी अपने संगठन के चेहरों को चमका रही है। राजधानी के रविंद्र भवन में कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्षों का सम्मेलन आयोजित किया गया। इस अवसर पर मप्र कांग्रेस के प्रभारी हरीश चौधरी ने कहा कि ब्लॉक अध्यक्ष होने के नाते आप सभी से अपेक्षा है कि अपने ब्लॉक में हर स्तर पर संगठन का निर्माण करें। मंडल, ब्लॉक कार्यकारिणी, गांव और वार्ड स्तर की इकाइयों के साथ बीएलए-2 की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि जिन गांवों में इकाइयां बन चुकी हैं, उनका सत्यापन किया जाए और उनकी स्थिति का प्राथमिकता से मूल्यांकन किया जाए। गांव की इकाइयों और बीएलए-2 का सत्यापन करना जरूरी है। हरीश चौधरी ने कहा कि पार्टी की ओर से प्रभारी नियुक्त किए गए हैं। उनके साथ मिलकर केवल ब्लॉक मुख्यालय तक सीमित न रहें, बल्कि हर गांव में जाकर इकाइयों का सत्यापन करें और बीएलए-2 से व्यक्तिगत रूप से मिलकर उनका सत्यापन सुनिश्चित करें। हरीश चौधरी ने कहा कि कनेक्ट सेंटर की व्यवस्था के तहत संगठन की सभी बैठकों और उनमें शामिल लोगों की सूची अनिवार्य रूप से भेजी जाए। यदि कोई पदाधिकारी बैठक में शामिल नहीं होता है, तो इसकी जानकारी कनेक्ट सेंटर को दी जाए, पार्टी स्वयं इस पर निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि किसी भी स्तर का पदाधिकारी हो, उसे अपने क्षेत्र की बैठकों में शामिल होना अनिवार्य है। ब्लॉक स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों में कौन-कौन शामिल हुआ, इसकी रिपोर्ट भी कनेक्ट सेंटर को भेजनी होगी। चौधरी ने स्पष्ट किया कि बैठक में शामिल न होने वाले पदाधिकारियों पर कार्रवाई का अधिकार पार्टी के पास है। इस संबंध में आगे सर्कुलर जारी कर जानकारी दी जाएगी। उन्होंने विधानसभा प्रभारियों से भी ब्लॉक अध्यक्षों को सहयोग देने की अपील की और कहा कि संगठन की असली ताकत जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता हैं, जिनके सहयोग से संगठन मजबूत होगा। वहीं कांग्रेस द्वारा अब किसी भी चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर अपने किसी नेता की मां-बहन या बेटी को टिकट नहीं दिया जाएगा। अब महिला कांग्रेस में काम करने वाली कार्यकर्ताओं को ही कांग्रेस द्वारा टिकट दिया जाएगा। यह ऐलान प्रदेश महिला कांग्रेस के पदाधिकारी की बैठक में किया गया। इस समय जब सांसद और विधानसभा में महिला आरक्षण को लागू करने की कवायद चल रही है उस समय पर कांग्रेस ने फैसला लिया है कि चुनाव में महिला कांग्रेस की कार्यकर्ताओं को टिकट दिया जाएगा। अब किसी सीट के महिला होने पर किसी नेता जी के परिवार की महिला को टिकट नहीं देंगे। इस बैठक को संबोधित करते हुए मप्र कांग्रेस के प्रभारी महासचिव हरीश चौधरी ने कहा कि महिला आरक्षण का कानून सबसे पहले कांग्रेस लेकर आई थी। उस समय पर भाजपा और दूसरे राजनीतिक दलों ने साथ नहीं दिया। कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में ही मप्र में नगर निगम और पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था को लागू किया गया था।
कमजोर सीटों की जिम्मेदारी मंत्रियों को
मप्र में विधानसभा की सभी 230 सीटें जीतने का लक्ष्य तय कर भाजपा ने मिशन 2028 के लिए रणनीति बनाई है। इसके तहत भाजपा कमजोर सीटों पर सबसे अधिक फोकस करेगी। अपनी इस रणनीति के तहत ऐसी करीब 70 सीटों को चिह्नित कर भाजपा न सिर्फ संगठनात्मक गतिविधियों को अभी से बढ़ा दिया है बल्कि इन क्षेत्रों में मंत्रियों को भी तैनात करने का निर्णय लिया है। पार्टी की रणनीति के अनुसार कमजोर सीटों पर भाजपा को मजबूत करने की जिम्मेदारी मंत्रियों को देकर उन्हें वहां निरंतर रात बिताने और बैठकें करने का निर्देश दिया गया है। उन्हें हार के कारणों का अध्ययन करने और उन्हें दूर करने के लिए मजबूत रणनीति बनाने को कहा गया है। ऐसी कई सीटों पर कांग्रेस अपने जिन दिग्गज नेताओं के प्रभाव के कारण मजबूत है, उनका किला भी भेदने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। मप्र भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ है। वहीं कांग्रेस भी अन्य राज्यों की अपेक्षा मजबूत है। ऐसे में भाजपा ने राज्य की उन विधानसभा क्षेत्रों में अपना जनाधार बढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं, जहां भाजपा कमजोर है या फिर वहां विपक्षी दल का विधायक लगातार चुनाव जीत रहा है। इसके लिए जिलों के प्रभारी मंत्रियों को विधानसभा मुख्यालयों में रात्रि बिताने एवं वहां चौपाल लगाने को कहा गया है। गौरतलब है कि भाजपा ने पिछले दिनों एक आतंरिक सर्वे के बाद अपनी ऐसी लगभग 70 विधानसभा सीटों को चिह्नित किया है, जहां पर उनका जनाधार पहले से नीचे गिरा है। जिसे निकाय और त्रि स्तरीय पंचायती राज चुनावों से पहले सुधारने के लिए रणनीति तय कर दी है।
जानकारों की मानें तो मंत्रियों से कहा गया कि वे जब भी अपने प्रभार वाले जिलों का दौरा करें, तो सरकारी कामकाज निपटाने के बाद कमजोर हो चुकी विधानसभा सीट मुख्यालय में एक रात रुकें और वहां रात्रि में सभाएं या चौपाल लगाकर लोगों को बताएं कि किस तरह से भारतीय जनता और उसकी सरकार जनता के हितों को लेकर काम कर रही है। इधर भाजपा संगठन को भी सक्रिय किया गया है। प्रदेश पदाधिकारियों, संभाग प्रभारी एवं जिला प्रभारियों को टाइम लाइन थमा दी गई है। जिसमें प्रदेश अध्यक्ष से लेकर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को जनता व कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें करने की बात कही गई है। पार्टी ने अपनी इस नई गाइडलाइन के तहत प्रदेशाध्यक्ष सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं से कहा है कि वे प्रत्येक महीने के शुरुआती 10 दिनों में मैदानी दौरे और जिला स्तरीय बैठकों में शामिल होंगे। महीने के पहले सप्ताह में संगठन और पदाधिकारियों का पूरा फोकस मंडल स्तर पर रहेगा। इस दौरान मंडल की बैठकें आहुत की जाएगी, जिसमें मंडल अध्यक्ष, मंडल पदाधिकारी, मंडल मोर्चा अध्यक्षों व वार्ड संयोजकों के साथ समन्वय स्थापित होगा। वहीं हर माह के मध्य में 11 से 20 तारीख के बीच प्रदेश स्तरीय बैठकें और वरिष्ठ पदाधिकारियों का प्रवास रहेगा। महीने के चौथे सप्ताह में पार्टी की विशिष्ट इकाईयों और शक्ति केन्द्रों पर ध्यान दिया जाएगा। जिसमें मन की बात और बूथ समिति की बैठक का एजेण्डा निर्धारित किया जाएगा। शक्ति केन्द्र टोली की बैठकों के बाद टिफिन बैठकों का आयोजन किया जाएगा। बताया गया है कि यह रोडमैप दो महीने के रोटेशन के आधार पर हर महीने 50 प्रतिशत मंडलों में आयोजित की जाएंगी। भाजपा ने इन कठिन सीटों के लिए मिशन-2028 के तहत एक बहुआयामी माइक्रो-प्लानिंग रणनीति तैयार की है। बूथ स्तर पर पकड़ मजबूत करने के लिए पार्टी का लक्ष्य प्रत्येक बूथ पर 51 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करना है। इसके लिए पन्ना प्रमुखों को सक्रिय कर घर-घर संपर्क अभियान चलाया जा रहा है।अल्पसंख्यक और जातिगत समीकरण को देखते हुए इन सीटों पर प्रभावी जाति समूहों एससी-एसटी व अन्य को साधने के लिए नजदीकी विधायकों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचाने का निर्देश दिया गया है। मंत्रियों की तैनाती भी इन कठिन सीटों पर की गई है। संगठन के दिग्गज मंत्रियों और कोर ग्रुप के सदस्यों को प्रभारी बनाया गया है ताकि वे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का भरोसा जीत सकें। वहीं भाजपा की नई रणनीति तो लेकर पार्टी मुख्यालय में संभाग और जिला प्रभारियों की बैठक हुई, जिन्हें गाइललाइन के मुताबित टारगेट सौंपे गए। बैठक को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने संबोधित किया। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर कहा कि पार्टी के कार्यक्रमों को धरातल पर उतारने के लिए कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर ज्यादा और मेहनत करनी होगी। जब तक हम सब मिलकर पार्टी के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए एक जुट होकर काम नहीं करेंगे, तब तक हमारी योजनाओं में सफलता नहीं मिल सकती। हमें समाज के हर वर्ग से संवाद बढ़ाना होगा। प्रदेशाध्यक्ष खंडेलवाल ने कहा कि पार्टी की सफलता कार्यकर्ताओं की मेहनत, निष्ठा और एकजुटता पर निर्भर करती है। हमारी सरकार और संगठन की योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए हमें एकजुट होकर काम करना होगा।
संगठन में कसावट और बदलाव
मप्र में 2028 के विधानसभा चुनाव और 2027 के नगरीय निकाय चुनावों को लेकर संगठन में बदलाव की प्रक्रिया जारी है। इसका उद्देश्य बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना है। भाजपा गांव-बस्ती चलो जैसे अभियानों के जरिए मंत्री, सांसद और विधायक को सीधे ग्रामीण स्तर पर सक्रिय कर रही है, ताकि जनता से सीधा संवाद हो सके। संघ अपने सांगठनिक ढांचे में बदलाव (प्रांत प्रणाली की जगह संभाग व्यवस्था) कर रहा है, ताकि गांवों और मोहल्लों तक बेहतर पहुंच बन सके। संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच लगातार समन्वय बैठकें हो रही हैं। भाजपा ने संगठन को मजबूत करने के लिए 1500 से अधिक सक्रिय कार्यकर्ताओं को पद देने की योजना तैयार की है। यह कदम कार्यकर्ताओं को नई जिम्मेदारियां देकर संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय रखने और ट्रिपल इंजन सरकार के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उठाया जा रहा है। प्रदेश कार्य समिति, जिला स्तर, निगम-मंडल, और विभिन्न प्रकोष्ठों में रिक्त पदों पर कार्यकर्ताओं का समायोजन किया जाएगा। जानकारी के अनुसार पार्टी का उद्देश्य निकाय और पंचायत चुनावों में जीत हासिल कर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत जमीन तैयार करना है। कार्यकर्ताओं को बूथ जीतो-चुनाव जीतो का मंत्र दिया जा रहा है और बूथ प्रबंधन को मजबूत करने पर जोर है। संगठन में युवा, महिला, और अन्य वर्गों को नए चेहरों के रूप में अवसर दिए जाने की तैयारी है। माना जा रहा है कि नगर निगमों में होने वाली नियुक्तियां आगामी चुनावी समीकरणों को सीधे प्रभावित कर सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, एल्डरमैन की नियुक्ति केवल संगठन विस्तार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर प्रभावी नेतृत्व तैयार करने की रणनीति का हिस्सा भी है। मप्र के नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति आमतौर पर प्रशासनिक अनुभव और नगर पालिका अधिनियम की समझ के आधार पर की जाती है। हालांकि ये मनोनीत सदस्य परिषद की बैठकों में सक्रिय भागीदारी कर सकते हैं, लेकिन इन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता। मप्र में आगामी नगरीय निकाय चुनाव को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक और संगठनात्मक नियुक्तियों की प्रक्रिया तेज कर दी है। पार्टी अब एल्डरमैन नियुक्तियों को प्राथमिकता देते हुए जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने में जुट गई है। सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश में अगले कुछ दिनों के भीतर करीब 1500 से अधिक सक्रिय कार्यकर्ताओं को विभिन्न पदों पर नियुक्त करने की तैयारी है। इस रणनीति के तहत 200 से अधिक नगरीय निकायों में एल्डरमैन नियुक्त किए जाएंगे, वहीं 500 से अधिक सरकारी कॉलेजों की जनभागीदारी समितियों में भी नियुक्तियां प्रस्तावित हैं। इन नियुक्तियों को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के बीच अंतिम दौर की बैठक भी हो चुकी है, जिससे संकेत मिलते हैं कि प्रक्रिया जल्द ही जमीन पर दिखाई देगी। गौरतलब है कि इससे पहले भी प्रदेश के 169 नगरीय निकायों में कुल 768 एल्डरमैन की नियुक्ति की जा चुकी है। इनमें 123 नगर परिषदों में चार-चार और 46 नगर पालिकाओं में छह-छह एल्डरमैन नियुक्त किए गए हैं। हालांकि, अभी नगर निगमों में एल्डरमैन नियुक्ति लंबित है, जिसे राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस बीच, संगठन ने नियुक्तियों को लेकर सख्त दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। संभाग प्रभारियों, जिला प्रभारियों और जिला अध्यक्षों को स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी स्थिति में विवादित चेहरों को नियुक्ति सूची में शामिल न किया जाए। पार्टी का मानना है कि विवादित नियुक्तियां उसकी छवि को नुकसान पहुंचा सकती हैं। दरअसल, हाल के दिनों में जिला कार्यकारिणी की कुछ नियुक्तियों को लेकर विवाद की स्थिति बनी थी, जिसके बाद पार्टी को कुछ फैसले वापस भी लेने पड़े थे। इसी अनुभव को देखते हुए इस बार चयन प्रक्रिया में विशेष सावधानी बरती जा रही है।
वहीं कांग्रेस की बैठकों में संगठन मजबूती पर जोर दिया जा रहा है। जिलाध्यक्ष- ब्लॉक अध्यक्षों को साथ लेकर चलने और गांव-गांव पहुंचने के निर्देश दिए गए हैं। नए पदाधिकारियों को हिदायत दी गई कि वे जिले और ब्लॉक स्तर के वरिष्ठ नेताओं से सामंजस्य बनाकर काम करें, ताकि संगठन मजबूत हो और पार्टी की आवाज जनता तक पहुंचे। बैठक में संगठन की स्थिति की समीक्षा के साथ आगामी कार्यक्रमों की रणनीति तय की गई। गांव-गांव तक संगठन विस्तार, कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने और जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने पर विशेष जोर रहा। बैठक में यह भी कहा गया कि जिलाध्यक्ष और ब्लॉक अध्यक्ष संगठन की रीढ़ हैं। हालांकि विधानसभा टिकट को लेकर स्पष्ट किया गया कि यह निर्णय चुनाव के समय ही होगा। फिलहाल उनकी जिम्मेदारी अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करना है, ताकि 2028 विधानसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सके। वहीं राहुल गांधी के संगठन सृजन अभियान की लंबी प्रक्रिया के बाद एमपी में बनाए गए कांग्रेस के जिलाध्यक्षों में कई दिग्गज उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की ओर से एमपी भेजे गए वामसी रेड्डी की समीक्षा में करीब 12 जिला अध्यक्षों की रिपोर्ट चिंताजनक पाई गई है। अब एआईसीसी यानी राष्ट्रीय नेतृत्व को जिलाध्यक्षों की रिव्यू रिपोर्ट भेजी जाएगी। दिल्ली की हरी झंडी मिलने के बाद पुअर परफॉरमेंस वाले जिला अध्यक्षों को हटाया जा सकता है। पार्टी सूत्रों की मानें तो जिन जिला अध्यक्षों की रिपोर्ट रिव्यू में कमजोर मिली है। उनमें सीनियर लीडर भी बतौर जिलाध्यक्ष फेल साबित हुए हैं। पूर्व मंत्री और कांग्रेस की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के मेंबर ओमकार सिंह मरकाम (जिलाध्यक्ष डिंडोरी), सतना विधायक और ओबीसी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सिद्धार्थ कुशवाह (जिलाध्यक्ष सतना), मंडला के पूर्व विधायक डॉ अशोक मर्सकोले (जिलाध्यक्ष मंडला) जैसे नेता भी जिलों में अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे।
