- पार्टी के आंतरिक आकलन ने संगठन की रणनीति उलझाई, वरिष्ठों के प्रभाव ने बढ़ाई संगठन की धडक़न
- गौरव चौहान
मध्यप्रदेश भाजपा में वरिष्ठ नेताओं को मुख्यधारा से अलग कर नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कवायद फिलहाल आसान होती नहीं दिख रही है। पार्टी के भीतर कराए गए फीडबैक और क्षेत्रीय आकलन ने संगठन की उस रणनीति को ही उलझा दिया है, जिसके तहत कुछ वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित करने पर विचार चल रहा था। संकेत हैं कि ओरछा में होने वाली प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद इस मुद्दे पर संगठन स्तर पर नए सिरे से मंथन हो सकता है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जिन नेताओं को लंबे समय तक क्षेत्रीय राजनीति का चेहरा माना गया, उनके प्रभाव का विकल्प तैयार नहीं हो पाया है। संगठन के स्तर पर भले ही नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति बनाई जा रही हो, लेकिन जमीनी समीकरणों में कई वरिष्ठ नेता अभी भी अपने क्षेत्र के साथ-साथ आसपास की सीटों पर भी असर रखते हैं।
सूत्रों के अनुसार, कुछ वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित करने से पहले उनके विधानसभा क्षेत्रों में फीडबैक लिया गया। रिपोर्ट में यह बात सामने आने की चर्चा है कि यदि इन नेताओं को अचानक हाशिए पर किया जाता है, तो सिर्फ उनकी सीट ही नहीं, बल्कि आसपास की तीन-चार विधानसभा सीटों पर भी असर पड़ सकता है। यही आकलन अब पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया है। संगठन के सामने सवाल है कि क्या वरिष्ठ नेताओं को हटाकर खाली हुई जगह को तत्काल प्रभावी दूसरी लाइन भर सकती है? फिलहाल कई क्षेत्रों में इसका जवाब पार्टी के पक्ष में नहीं दिख रहा है।
गोपाल भार्गव से लेकर नरेंद्र सिंह तोमर तक चुनौती
गोपाल भार्गव जैसे नेताओं का प्रभाव केवल उनकी विधानसभा सीट तक सीमित नहीं माना जाता। नौ बार के विधायक और लंबे समय तक मंत्री व नेता प्रतिपक्ष रहे भार्गव का सागर क्षेत्र में संगठनात्मक और राजनीतिक नेटवर्क मजबूत है। ऐसे में उनके विकल्प को लेकर पार्टी को स्थानीय समीकरणों का ध्यान रखना होगा। विजय शाह के मामले में आदिवासी क्षेत्रों का गणित महत्वपूर्ण है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि आदिवासी बेल्ट में उनके प्रभाव का तत्काल विकल्प कौन होगा। यही कारण है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनकी राजनीतिक उपयोगिता को पूरी तरह नजरअंदाज करना संगठन के लिए आसान नहीं माना जा रहा। रुस्तम सिंह का नाम भी मुरैना और आसपास के इलाकों में प्रभाव रखने वाले नेताओं में लिया जा रहा है। इसी तरह नरेंद्र सिंह तोमर का मामला अलग महत्व रखता है। विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका के अलावा चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में उनका पुराना राजनीतिक प्रभाव और संगठन के भीतर स्वीकार्यता पार्टी के लिए अहम मानी जाती है।
दूसरी लाइन तैयार नहीं, यही सबसे बड़ी अड़चन
भाजपा की समस्या सिर्फ वरिष्ठ नेताओं को लेकर नहीं है। असली संकट उन सीटों पर है जहां पार्टी नेतृत्व बदलाव चाहता है, लेकिन दूसरी पंक्ति का कोई नेता अभी इतना मजबूत नहीं है कि वह तत्काल वरिष्ठ नेता की जगह भर सके। यही वजह है कि कुछ क्षेत्रों में बदलाव की संभावनाओं पर फिलहाल धीमा रुख अपनाए जाने की चर्चा है। पार्टी के लिए सत्ता में बने रहने के साथ संगठन का विस्तार और नई पीढ़ी को तैयार करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए पुराने प्रभावशाली नेताओं को अचानक कमजोर करना जोखिम भरा हो सकता है।
बाहर से आए नेताओं ने भी बिगाड़े समीकरण
भाजपा में कांग्रेस सहित दूसरे दलों से आए नेताओं को लगातार राजनीतिक जगह मिलने से पुराने नेताओं और उनके समर्थकों में असंतोष की स्थिति बनने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है। संगठन लंबे समय से वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और नेताओं को निगम-मंडल सहित अन्य जिम्मेदारियों के जरिए संतुलित करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन कई जगह बाहरी नेताओं की मौजूदगी ने यह समीकरण भी कठिन बना दिया। विंध्य, बुंदेलखंड और महाकौशल के कुछ वरिष्ठ नेताओं को लेकर भी पार्टी के भीतर सक्रियता बढऩे की चर्चा है। कुछ नाराज नेताओं को फिर से मुख्यधारा में लाने और कुछ को संगठनात्मक जिम्मेदारी देने पर विचार हो सकता है। रघुनंदन शर्मा, अजय विश्नोई और अजय प्रताप सिंह जैसे नाम इसी संदर्भ में चर्चा में बताए जा रहे हैं।
ओरछा के बाद तय होगी अगली चाल
प्रदेश भाजपा के सामने अब दोहरी चुनौती है—वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव को बनाए रखते हुए नई पीढ़ी को आगे बढ़ाना और पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी को भी नियंत्रित करना। ऐसे में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद होने वाला मंथन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के लिए फिलहाल संकेत यही हैं कि वरिष्ठ नेताओं के विकल्प तैयार किए बिना उन्हें किनारे करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। इसलिए संगठन की रणनीति में अचानक बदलाव के बजाय धीरे-धीरे नेतृत्व परिवर्तन और प्रभावशाली नेताओं को साथ लेकर चलने की नीति पर जोर दिए जाने की संभावना है।
