पहले थाली में कई विकल्प, अब खिचड़ी पर जोर

  • चार महीने बाद आंगनबाडिय़ों में राशन लौटा

    भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश की आंगनबाडिय़ों में करीब चार महीने के इंतजार के बाद टेक होम राशन की व्यवस्था तो बहाल हो गई, लेकिन नई व्यवस्था ने पोषण आहार की विविधता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्व-सहायता समूहों के जरिए फिलहाल बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं को मुख्य रूप से खिचड़ी का वितरण किया जा रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग ने 4 अगस्त से नई व्यवस्था के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों में टेक होम राशन बांटना शुरू किया है। एक सप्ताह दलिया मिक्स्ड खिचड़ी और अगले सप्ताह चावल की खिचड़ी देने की व्यवस्था है। बच्चों को पांच दिनों के लिए 725 ग्राम और गर्भवती व धात्री महिलाओं को 850 ग्राम खिचड़ी का पैकेट दिया जा रहा है। मंगलवार को खीर-पूरी भी दिए जाने की व्यवस्था है।
    नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव राशन की विविधता को लेकर है। पहले आंगनबाड़ी केंद्रों पर अलग-अलग दिनों में दलिया, पूरी-सब्जी, चना फ्राई, हलवा, पुलाव, खिचड़ी, उपमा, दूध, पोहा, लड्डू, मठरी, नमकीन, मुरमुरे, बिस्किट, भुना चना और गुड़ जैसी चीजें दिए जाने की व्यवस्था थी। अब स्थानीय समूहों को अस्थायी तौर पर जिम्मेदारी मिलने के बाद खिचड़ी वितरण को प्राथमिकता दी जा रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या नई व्यवस्था बच्चों को पर्याप्त पोषण देने के साथ भोजन में जरूरी विविधता भी उपलब्ध करा पाएगी? प्रदेश में करीब 97 हजार 135 आंगनबाड़ी केंद्र हैं और विभाग के आंकड़ों के अनुसार करीब 66 लाख बच्चों को इन केंद्रों की पोषण व्यवस्था से जोड़ा गया है। इनमें लगभग 10 लाख बच्चे कुपोषित श्रेणी में बताए गए हैं। ऐसे में पूरक पोषण आहार की गुणवत्ता और विविधता सीधे तौर पर महत्वपूर्ण हो जाती है।
    चार महीने बंद रहा राशन
    पूरक पोषण आहार की व्यवस्था में बदलाव के कारण प्रदेश में करीब चार महीने तक आंगनबाड़ी केंद्रों पर टेक होम राशन वितरण प्रभावित रहा। 14 जुलाई की कैबिनेट बैठक में राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से यह जिम्मेदारी वापस लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंपने का निर्णय लिया गया। इसके बाद पहले से पूरक पोषण आहार तैयार करने वाले सात प्लांट बंद हो गए। सरकार ने तत्काल व्यवस्था के लिए स्थानीय महिला स्व-सहायता समूहों को जिम्मेदारी दी। यह व्यवस्था फिलहाल दो-तीन महीने के लिए अस्थायी बताई जा रही है।
    1200 करोड़ के बजट के बीच अस्थायी व्यवस्था
    मध्यप्रदेश में पूरक पोषण आहार का सालाना बजट करीब 1200 करोड़ रुपए बताया जाता है। ऐसे में इतनी बड़ी राशि वाली योजना का संचालन फिलहाल अस्थायी व्यवस्था के जरिए किया जा रहा है। विभाग अब आगे निजी कंपनियों के जरिए पूरक पोषण आहार तैयार कराने की तैयारी में है। इसके लिए टेंडर प्रक्रिया पर काम चल रहा है। यानी मौजूदा खिचड़ी व्यवस्था लंबे समय की नीति है या सिर्फ संक्रमणकालीन इंतजाम, यह कुछ महीनों में स्पष्ट होगा।
    घाटे में चल रहे थे सात प्लांट
    व्यवस्था बदलने के पीछे एक बड़ा कारण पुराने प्लांटों का आर्थिक संकट भी रहा। मंडला, सागर, नर्मदापुरम, देवास, धार, रीवा और शिवपुरी में स्व-सहायता समूहों के माध्यम से पूरक पोषण आहार तैयार किया जाता था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन प्लांटों को चार वर्षों में 300 करोड़ रुपए से अधिक का घाटा हुआ। सरकार की ओर से मिलने वाली राशि और उत्पादन लागत के बीच अंतर को इसका प्रमुख कारण बताया गया। इसी आर्थिक दबाव के बीच सरकार ने पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग को देने का फैसला किया।
    व्यवस्था कई बार बदली, सवाल अब भी वही
    मध्यप्रदेश में टेक होम राशन की व्यवस्था पिछले वर्षों में कई बार बदली है। 2018 से पहले यह काम एमपी एग्रो के जरिए निजी ठेकेदारों से कराया जाता था। 2017 में हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के निर्देश के बाद बड़े निजी ठेकेदारों और औद्योगिक घरानों के जरिए राशन सप्लाई पर रोक की दिशा में व्यवस्था बदली और 2018 में काम स्व-सहायता समूहों को दिया गया। 2020 में व्यवस्था फिर बदली और काम एमपी एग्रो को मिला। 2022 में इसे दोबारा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के हवाले कर दिया गया। अब 2026 में जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग के पास है। बार-बार बदलती व्यवस्था के बीच असली परीक्षा अब इस बात की है कि सरकार कुपोषण से जूझ रहे बच्चों तक सिर्फ राशन पहुंचाती है या ऐसा संतुलित और विविध पूरक आहार भी सुनिश्चित करती है, जो योजना के मूल उद्देश्य को पूरा कर सके।

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