
बिच्छू डॉट कॉम। चूल्हे-चौके से लेकर परिवार की धडक़न संभालने वाली देश की करीब 21 करोड़ गृहिणियों के ‘मूक’ योगदान को आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने राष्ट्र निर्माता का सर्वोच्च गौरव दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मात्र एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि हर उस मां, पत्नी और बहन के नि:स्वार्थ श्रम का सम्मान है, जो बिना किसी वेतन या छुट्टी के राष्ट्र की नींव मजबूत करती हैं। घर की चारदीवारी में छिपे उनके त्याग और ममतामई देखभाल को अब कुशल श्रम से भी ऊंचा स्थान मिला है, जिसने आधी आबादी के आत्मसम्मान और आर्थिक अधिकारों को एक नई ऐतिहासिक पहचान दी है। दरअसल, देशभर में सडक़ हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों के परिवारों को मिलने वाले मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा-घर संभालने वाली महिलाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा मिलना चाहिए। गृहिणियों के काम की तुलना किसी कुशल मजदूर की दिहाड़ी से करके उनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता। केस की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश संजय करोल और एन कोटिस्वर सिंह की बेंच ने एक नया सिद्धांत तय करते हुए कहा-किसी हादसे में गृहिणियों की मौत होने पर, उनके द्वारा की जाने वाली देखभाल और घरेलू काम की कीमत कम से कम 30000 रुपए प्रति महीना (3.6 लाख रुपए सालाना) मानी जाएगी।
