- सडक़ें बनेंगी सरकार की कमाई का नया जरिया, प्रदेश की 12 नई सडक़ें टोल नेटवर्क में शामिल करने की तैयारी
- गौरव चौहान
प्रदेश में सडक़ निर्माण की नई रणनीति अब सिर्फ कनेक्टिविटी बढ़ाने तक सीमित नहीं रहने वाली है। सरकार सडक़ों को राजस्व जुटाने के बड़े माध्यम के रूप में विकसित करने की तैयारी में है। इसी रणनीति के तहत करीब एक दर्जन नई सडक़ों को टोल नेटवर्क में शामिल करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। सरकार की नजर अगले 10 से 15 साल में टोल से होने वाली सालाना आय को मौजूदा करीब 400 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2 से 3 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने पर है। फिलहाल एमपीआरडीसी की अलग-अलग योजनाओं के तहत प्रदेश में 93 सडक़ों पर 139 टोल प्लाजा संचालित हैं। अब नई सडक़ों को भी टोल के दायरे में लाने की तैयारी है। यानी आने वाले वर्षों में प्रदेश में सडक़ से सफर करने वाले वाहन चालकों के लिए टोल भुगतान एक और नियमित खर्च बन सकता है।
सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल टोल से होने वाली कमाई का अंतर है। अधिकारियों के मुताबिक एनएचएआई की सडक़ों से सालाना करीब 4 हजार करोड़ रुपये टोल के रूप में मिलते हैं, जबकि पीडब्ल्यूडी और एमपीआरडीसी की टोल आय करीब 400 करोड़ रुपये है। इसी अंतर को देखते हुए राज्य सरकार सडक़ परियोजनाओं को इस तरह तैयार करना चाहती है कि निर्माण के साथ भविष्य की आय का मॉडल भी पहले से तय हो। विभाग का लक्ष्य टोल आय को कई गुना बढ़ाकर सडक़ क्षेत्र में निवेश और राज्य के राजस्व में अपना योगदान बढ़ाना है।
निजी कंपनियों से टोल छीनकर सरकार की कमाई
नई रणनीति में हाइब्रिड एन्युटी मॉडल यानी एचएएम को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बीओटी मॉडल में निजी कंपनी सडक़ निर्माण में निवेश करती है और निर्धारित अवधि तक टोल वसूलकर अपनी लागत और मुनाफा निकालती है। इसके उलट एचएएम में निर्माण लागत का 40 प्रतिशत सरकार और 60 प्रतिशत निजी कंपनी लगाती है। इस मॉडल का फायदा सरकार को यह दिख रहा है कि सडक़ बनने के बाद टोल की कमाई सरकारी तंत्र के माध्यम से हासिल की जा सकती है। यानी सडक़ निर्माण में निजी निवेश रहेगा, लेकिन लंबे समय की टोल आय पर सरकार का नियंत्रण होगा।
कमाई सरकार की, कीमत वाहन चालकों की
सरकार के लिए यह मॉडल राजस्व बढ़ाने का जरिया हो सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू वाहन चालकों और माल परिवहन से जुड़ा है। नई सडक़ों पर टोल लागू होने के बाद इनका इस्तेमाल करने वाले लोगों को अतिरिक्त शुल्क देना होगा। खासकर मालवाहक वाहनों के लिए टोल सीधे परिवहन लागत को प्रभावित कर सकता है। इसका असर आगे चलकर माल ढुलाई और दूसरे खर्चों के जरिए आम उपभोक्ता तक भी पहुंच सकता है। इसलिए नई टोल सडक़ों का मुद्दा सिर्फ सरकारी आय बढ़ाने की योजना नहीं है। असली सवाल यह होगा कि जिन सडक़ों के निर्माण और रखरखाव के लिए वाहन चालक टोल देंगे, उन पर शुल्क कितना होगा और यात्रियों को उसके बदले कितनी बेहतर सुविधा मिलेगी। यानी सरकार के लिए लक्ष्य 400 करोड़ से 3000 करोड़ की कमाई है, लेकिन वाहन चालकों के लिए सवाल यह है कि इस लक्ष्य की कीमत उनकी जेब से कितनी वसूली जाएगी।
