आईएएस-आईपीएस का रुतबा बना ठगी का हथियार

  • नेमप्लेट, फर्जी आईडी और सोशल मीडिया प्रोफाइल से बनाया अफसरी का आभामंडल

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। अफसर बनने के लिए परीक्षा पास करना जरूरी है, लेकिन ठगी की दुनिया में कुछ लोगों ने इसका आसान रास्ता खोज लिया—अफसर होने का सिर्फ दिखावा करो। प्रदेश में सामने आए पांच मामलों ने जालसाजी के ऐसे पैटर्न को उजागर किया है, जिसमें आईएएस-आईपीएस की पहचान महज रुतबा दिखाने का जरिया नहीं, बल्कि लोगों से पैसा और सुविधाएं हासिल करने का हथियार बन गई। इन मामलों में आरोपियों ने सरकारी पद का भरोसा पैदा करने के लिए पूरा तामझाम खड़ा किया। किसी ने फर्जी पहचान पत्र और ज्वाइनिंग लेटर तैयार किए तो किसी ने सरकारी नेमप्लेट लगाई। किसी ने लग्जरी कार और ड्राइवर का इंतजाम किया तो किसी ने सोशल मीडिया पर खुद को अधिकारी बताकर प्रोफाइल बनाई। यानी पहले अफसर की छवि तैयार की गई और फिर उसी छवि के दम पर लोगों को प्रभावित किया गया। सबसे अहम बात यह है कि इन मामलों में ठगी का तरीका अलग-अलग जरूर था, लेकिन आधार एक ही रहा सरकारी पद के नाम से पैदा होने वाला भरोसा।
तृप्ति सिंह राजपूत पर खुद को आईएएस अधिकारी और मप्र पर्यटन विकास निगम की एडिशनल डायरेक्टर बताकर लोगों से नौकरी और दूसरे लाभ दिलाने के नाम पर लाखों रुपए लेने के आरोप हैं। भारत सरकार की नेमप्लेट लगी इनोवा और कथित सरकारी दस्तावेजों के जरिए उसने अपने आसपास ऐसा माहौल बनाया, जिससे उसके अधिकारी होने पर शक करना आसान नहीं था। ग्वालियर के विकास गौतम का मामला दिखाता है कि डिजिटल पहचान किस तरह फर्जी अफसरी का आधार बन सकती है। उसने खुद को आईएएस बताकर सोशल मीडिया के जरिए संपर्क बनाया। एक महिला डॉक्टर से दोस्ती कर इलाज के नाम पर पैसे लेने का आरोप सामने आया। जांच आगे बढ़ी तो उसकी असली पहचान सामने आ गई। भोपाल में ऋषि कुमार यादव ने खुद को 2016 बैच का आईपीएस और आयकर अधिकारी बताया। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों को सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा दिया गया। यहां तक कि फर्जी आईडी और ज्वाइनिंग लेटर भी तैयार किए गए। हालांकि दस्तावेजों में हुई स्पेलिंग की गलतियों ने उसकी बनाई पूरी कहानी पर सवाल खड़े कर दिए।
किराये के मकान से ‘कलेक्टर ऑफिस’
इंदौर का मामला तो फर्जी अफसरी की पूरी पटकथा सामने रख देता है। हिमांशु पांचाल ने किराये के मकान को ही कलेक्टर कार्यालय जैसा रूप दे दिया। बाहर आईएएस राज सोनी और जिला कलेक्टर की नेमप्लेट, किराये की कार और ड्राइवर—हर चीज ऐसी तैयार की गई, जिससे आने वाला व्यक्ति उसे वास्तविक अधिकारी समझे। उज्जैन में अतुल कुमार ने खुद को नागरिक उड्डयन मंत्रालय का संयुक्त सचिव बताकर वीआईपी भस्म आरती सुविधा लेने की कोशिश की। सत्यापन में जब पद और पहचान की पुष्टि नहीं हुई तो मामला खुल गया।
सवाल सिर्फ पांच फर्जी अफसरों का नहीं
इन मामलों की सबसे बड़ी कहानी यह नहीं है कि पांच लोगों ने फर्जी अफसर बनने की कोशिश की। बड़ा सवाल यह है कि एक नेमप्लेट, सरकारी मुहर, कार या सोशल मीडिया प्रोफाइल देखकर लोग किसी को अधिकारी क्यों मान लेते हैं? जालसाज जानते हैं कि सरकारी अफसर का नाम सुनते ही आम व्यक्ति के मन में प्रभाव पैदा होता है। इसी मनोवैज्ञानिक भरोसे को ठगी के मॉडल में बदला जा रहा है। पहचान नकली होती है, लेकिन उससे पैदा होने वाला डर और भरोसा असली। यही वजह है कि फर्जी आईएएस-आईपीएस के मामलों को सिर्फ व्यक्तिगत ठगी मानने के बजाय सरकारी पहचान और पद के दुरुपयोग के नजरिए से देखना जरूरी हो गया है। अब जालसाज सिर्फ पैसा नहीं मांग रहे, वे पहले अफसरी का भरोसा बेच रहे हैं और फिर उसी भरोसे की कीमत वसूल रहे हैं।

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