मोहब्बत लुटाने वाले शायर से ये कैसी मोहब्बत? ऐसे तो बशीर साहब को विदा ना होना था…

  • शिफाली पांडे

बशीर मंजिल इस दुनिया से रुखसत होने तक बशीर साहब का भोपाल में पहला और आखिरी पता रहा। ये और बात कि इस पते के होते भोपाल में बीते पंद्रह बरस भी लापता ही रहे बशीर साहब। उस आखिरी वक्त में भी शहर सलाम करने नहीं आया कि जिसके बाद वो सिर्फ किस्सों में रह जाने वाले थे। बशीर साहब के बेटे तैय्यब बद्र हैरानी से बशीर मंजिल में अंदर बाहर होते रहे। चंद पत्रकार कुछ जानने वाले और चुनिंदा शायर भी इंतजार में रहे कि जब गजल की दुनिया का बेताज बादशाह आखिरी सफर पर निकलेगा तो उनके चाहने वालों का सैलाब आएगा।
वफा कम है तेरे शहर वालों में: बशीर साहब के बेटे तैय्यब कभी अब्बा को जी भर कर देखते हैं, कभी बाहर आकर उस गली को जो अमूमन बड़ी-बड़ी गाडिय़ों से घिर जाती तो पता करना मुश्किल नहीं होता था कि मुहाने पर बशीर साहब का घर है। तैय्यब ने सवाल किसी से नहीं किया लेकिन शिकवा आंखों में तो उतर आता ही है। ये कैसी दुनिया खड़ी हो रही है सामने? मोहब्बत लुटाने वाले शायर से ये कैसी मोहब्बत है? सोशल मीडिया हर दूसरी पोस्ट में बशीर बद्र और हकीकत में आखिरी विदा में ऊंगलियों पर खत्म होते लोग। बशीर साहब का अपना शेर उनके इंतकाल के बाद मौजूं हो गया, सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख्यालों में इक ज़रा वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में।
कतार में पड़ी खाली कुर्सियां, और लंबा होता इंतजार: बशीर मंजिल के बाहर की गली में बशीर साहब के इंतेकाल की खबर आते ही शामियाना लगा गया दिया गया। कतार में कुर्सियां लगा दी गईं। जिनके एक शेर पर पूरा मुशायरा लुट जाता हो, जिनकी मोहब्बत में लोग सात समन्दर पार से खिंचे चले आते हों मिलने, क्या वजह हुई कि उस शख्स को आखिरी विदा देने लोग सांझ ढलते भी नहीं पहुंच पाए? मशहूर शायर मंजर भोपाली कहते हैं,  ये दुनिया का दस्तूर है इसे मंज़ूर कर लेना चाहिए। फिर उन लोगों को तो जरुर ही जिन्होंने उरूज देखा हो।
उस शायर को भुला देना क्या इतना आसान है?: मशहूर शायर मंजर भोपाली ने आगे कहा,  बशीर साहब क्यों डिमेशिया में चले गए। जब उतार आता है जिंदगी का तो कोई ये बर्दाश्त नहीं कर पाता। शायद मैं भी नहीं कर पाऊंगा। अपने जज्बात की बयानी के लिए हम जिनके शेरों के मोहताज हैं, उस शायर को भुला देना क्या इतना आसान है? नहीं बशीर साहब को भुलाया भी नहीं जा सकता। आज के बाद आगे चार सौ साल तक के शायर हैं वो। बशीर मंजिल के आगे पसरे सन्नाटे से इसे मत आंकिए।
एक थैला सूटकेस लिए आए, और वापिसी भी चंद कंधों पर: बशीर साहब ने जब मेरठ से निकल कर भोपाल बस जाने का फैसला किया था, तब उनके हाथ में एक सूटकेस, एक थैला था केवल। लेकिन अपनी शायरी से उन्होंने अपनी दुनिया खड़ी कर ली थी। जो बेशक उनके याददाश्त रहते हुजूम की तरह उनके साथ रही। मौके-मौके पर सितारा हैसियत से बुलाए जाते रहे बशीर साहब जब तक उम्र और सेहत ने साथ दिया। इधर डिमेंशिया ने उनके जहन को बीमार किया और उनके चाहने वालों की याददाश्त से भी वे उतरने लगे। जब बशीर मंजिल से उनका जनाजा निकला, तो कंधा बदलने वाले परिवार के सदस्यों के अलावा चुनिदां शायर और गिनती के लोग ही थे। अंजूम बाराबांकी को उन्होंने पिता की तरह मोहब्बत दी थी। वे कहते हैं, इस शहर की खुशकिस्मती है कि जिस शायर की शायरी पर पीएचडी की गई हो, जिसके शेर उसके अपने कोर्स में पढ़ाए गए हों उसने बसने के लिए भोपाल को चुना था। बशीर साहब के ही अल्फाज कैसे उनकी आखिरी विदा पर मौजू हो गए थे। उन्होंने कहा था सौ खुलूस बातों में सब करम ख्यालों में इक जरा वफा कम है तेरे शहर वालों मे। पदम श्री साहित्य अकादमी संगीत नाटक अकादमी सारे ईनाम ईकराम ओहदे,और इतनी मकबूल शख्सियत। आज भी कितने सियासतदां अपने भाषण में असर लाने उनके शेर का सहारा लेते हैं। ये और बात कि बशीर साहब से वो भी सिर्फ शेरों वाबस्ता रहे।
– (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Related Articles