यूपीएससी से आने वाले पैनल से तय होगा नए पुलिस प्रमुख का नाम

 पुलिस
  • डीजीपी चयन में दो दिन का पेच खत्म, मकवाणा के कार्यकाल में विस्तार का प्रस्ताव खारिज
  •  वरुण कपूर की पात्रता पर टला संकट
    भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम।  मध्यप्रदेश में नए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को लेकर चल रही प्रक्रिया में दो दिन के संभावित सेवा विस्तार ने नया मोड़ ला दिया। मौजूदा डीजीपी कैलाश मकवाणा के कार्यकाल की गणना को लेकर पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू) की ओर से उठाए गए सवाल पर गृह विभाग ने सहमति नहीं दी। प्रस्ताव खारिज होने के बाद डीजी जेल डॉ. वरुण कपूर की पात्रता को लेकर उठ रहा तकनीकी सवाल फिलहाल खत्म हो गया है। अब नए डीजीपी के चयन में वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड और यूपीएससी की निर्धारित प्रक्रिया की भूमिका अहम होगी।
    मामले में विवाद इस बात पर था कि मकवाणा का दो साल का कार्यकाल किस तारीख से गिना जाए। उन्होंने 2 दिसंबर 2024 को डीजीपी का पदभार संभाला था, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति की निर्धारित तारीख 30 नवंबर 2026 है। पीएचक्यू की प्रशासन शाखा ने पदभार ग्रहण करने की तारीख के आधार पर कार्यकाल की गणना का प्रस्ताव रखा था। यदि इसे मंजूरी मिलती, तो डीजीपी चयन की समय-सीमा पर असर पड़ सकता था और 31 मई 2027 को सेवानिवृत्त होने वाले डॉ. वरुण कपूर की छह महीने की शेष सेवा संबंधी पात्रता पर सवाल खड़ा हो सकता था।
    नियुक्ति आदेश की तारीख बनी विवाद का आधार
    पीएचक्यू की ओर से रखे गए तर्क के मुताबिक, मकवाणा ने 2 दिसंबर 2024 को डीजीपी का पदभार संभाला था, इसलिए उनके दो साल के कार्यकाल की गणना इसी तारीख से की जानी चाहिए। इसके उलट गृह विभाग ने नियुक्ति आदेश की प्रभावी तारीख 1 दिसंबर 2024 को आधार माना। विभाग का कहना था कि कार्यकाल की गणना पदभार ग्रहण करने की तारीख के बजाय नियुक्ति आदेश की प्रभावी तारीख से की जाएगी। इसी तकनीकी अंतर के कारण मामला प्रशासनिक स्तर पर चर्चा में आया। प्रस्ताव को मंजूरी मिलती तो डीजीपी चयन की प्रक्रिया और संभावित नियुक्ति की तारीख के बीच तालमेल का सवाल उठता। यूपीएससी के निर्धारित मानदंडों के तहत डीजीपी पद के लिए पैनल तैयार करते समय संबंधित अधिकारियों की शेष सेवा अवधि भी महत्वपूर्ण होती है।
    वरुण कपूर की पात्रता पर क्यों उठ रहा था सवाल?
    डॉ. वरुण कपूर वर्तमान में डीजी जेल हैं और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों में शामिल हैं। उनकी सेवानिवृत्ति 31 मई 2027 को निर्धारित है। विवादित प्रस्ताव के तहत यदि नए डीजीपी की नियुक्ति 3 दिसंबर 2026 को होती, तो कपूर के पास सेवानिवृत्ति तक पांच महीने 28 दिन की सेवा बचती। ऐसे में डीजीपी नियुक्ति के लिए छह महीने की न्यूनतम शेष सेवा की शर्त के संदर्भ में उनकी पात्रता पर सवाल उठ सकता था। हालांकि, गृह विभाग ने पीएचक्यू के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इससे मकवाणा के कार्यकाल को दो दिन बढ़ाने की संभावना पर विराम लग गया। फिलहाल वरुण कपूर की पात्रता को लेकर इस प्रस्ताव से पैदा हुई तकनीकी अड़चन सामने नहीं है। अंतिम चयन निर्धारित नियमों और यूपीएससी की प्रक्रिया के अनुरूप ही होगा।
    यूपीएससी के पैनल पर टिकी नजरें
    नए डीजीपी के चयन के लिए राज्य सरकार ने 12 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेजे हैं। इनमें डीजी और स्पेशल डीजी रैंक के अधिकारी शामिल हैं। सूची में डॉ. वरुण कपूर, उपेंद्र जैन, प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव, पंकज श्रीवास्तव, आदर्श कटियार, जी. अखेतो सेमा, अनिल कुमार, रवि गुप्ता, आनंद कुमार सिंह, मनमीत सिंह नारंग, राजाबाबू सिंह और डीपी गुप्ता के नाम शामिल बताए गए हैं। प्रस्तावित प्रक्रिया के अनुसार, यूपीएससी अधिकारियों की वरिष्ठता, पात्रता और सेवा रिकॉर्ड का आकलन कर तीन से चार अधिकारियों का पैनल तैयार करेगा। इसके बाद पैनल राज्य सरकार को भेजा जाएगा और सरकार उसमें से नए डीजीपी का चयन करेगी। नवंबर के पहले सप्ताह में इस प्रक्रिया को लेकर बैठक होने की संभावना जताई गई है।
    चयन में अब नियमों की भूमिका अहम
    डीजीपी चयन की प्रक्रिया में दो दिन के सेवा विस्तार का विवाद भले ही फिलहाल समाप्त हो गया हो, लेकिन अंतिम निर्णय के लिए यूपीएससी की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। वरिष्ठता के साथ पात्रता और सेवा रिकॉर्ड का परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद ही स्पष्ट होगा कि राज्य का अगला पुलिस प्रमुख कौन होगा। इस पूरे घटनाक्रम ने यह जरूर दिखाया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति में सेवा अवधि की गणना जैसी तकनीकी बातें भी चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। अब निगाहें यूपीएससी से आने वाले पैनल और उसके बाद राज्य सरकार के फैसले पर हैं।

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