वसूली के बाद प्रमोशन की कतार में घोटाले के आरोपी

घोटाले
  • फर्जी मेडिकल बिल घोटाले में कार्रवाई का आधार सिर्फ राशि की वसूली तक सिमटा

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू) के 2.87 करोड़ रुपये के फर्जी मेडिकल बिल घोटाले में कार्रवाई का आधार सिर्फ राशि की वसूली तक सिमटता नजर आ रहा है। घोटाले में शामिल पुलिसकर्मियों से रकम वसूलने के बाद अब उन्हें फिर पदोन्नति देने की तैयारी है। 13 अक्टूबर को जारी प्रस्तावित प्रमोशन सूची में ऐसे 18 पुलिसकर्मियों के नाम शामिल होने का दावा किया गया है, जिनसे इस मामले में रिकवरी की गई थी। इनमें कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिनकी पदोन्नति को लेकर पहले विवाद हो चुका है। मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इससे पहले 13 जुलाई को जारी सूची में घोटाले से जुड़े 16 पुलिसकर्मियों को एएसआई से एसआई पद पर पदोन्नति देने का आदेश जारी हुआ था। शिकायत के बाद मामला अदालत पहुंचा। इसके बाद पीएचक्यू ने अदालत में अपने जवाब में बताया कि 13 पुलिसकर्मियों की डीपीसी निरस्त कर दी गई है। वहीं, पूरी राशि जमा करने वाले तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं किए जाने की बात कही गई। अब लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों की नई प्रस्तावित पदोन्नति सूची में फिर इसी मामले से जुड़े नाम सामने आने से विभागीय कार्रवाई पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
रिकवरी हुई, लेकिन विभागीय कार्रवाई का सवाल बरकरार
फर्जी मेडिकल बिल घोटाले में कुल 48 पुलिसकर्मियों से राशि की वसूली किए जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें से तीन के खिलाफ पीएचक्यू ने एफआईआर दर्ज कराई थी और उनके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण चल रहा है। बाकी कर्मचारियों के मामले में राशि की वसूली के बाद पदोन्नति की प्रक्रिया में शामिल किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि घोटाले में नाम आने और रिकवरी की कार्रवाई होने के बावजूद संबंधित कर्मचारियों को महत्वपूर्ण शाखाओं में जिम्मेदारी दी गई है।
डीपीसी निरस्त, खाली पदों पर नए नाम नहीं
घोटाले से जुड़े पुलिसकर्मियों की पदोन्नति को लेकर शिकायत के बाद 2 सितंबर को जारी आदेश में 13 पुलिसकर्मियों की डीपीसी निरस्त की गई थी। हालांकि, शिकायतकर्ता के मुताबिक इसके बाद रिक्त पदों पर नए नाम शामिल नहीं किए गए। अब प्रस्तावित सूची में फिर घोटाले से जुड़े कर्मचारियों के नाम सामने आने से चयन प्रक्रिया और पात्रता के मानकों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। 13 अक्टूबर की प्रस्तावित सूची में पीएचक्यू की विभिन्न शाखाओं में पदस्थ दुर्गेश रायकवार, के. मिंज, किरण चौधरी, आशीष अग्निहोत्री, लीलाधर तिवारी, नरेश शर्मा, पूनम बघेल, सरिता तलवाने, तृषा ठाकुर, प्रताप सिंह बामनिया, अंतिमा जैन, अर्पणा द्विवेदी, विपिन कुमार रौतेल, गौरव आरोनकर, संदीप सूर्यवंशी, भारती तिवारी और राकेश त्रिपाठी सहित नाम शामिल बताए गए हैं। उपलब्ध विवरण में 18 कर्मचारियों का दावा है, जबकि यहां 17 नाम ही स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। सूची के आधार पर पूरी संख्या की पुष्टि जरूरी है। इनमें एक कर्मचारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भी बताया गया है।
आपराधिक कार्रवाई नहीं हुई
इस मामले में पीएचक्यू की कार्मिक शाखा के एआईजी अमित सक्सेना का कहना है कि डीपीसी के लिए नियमानुसार कार्रवाई की गई है। उनके मुताबिक पुलिसकर्मियों से राशि की वसूली हुए एक साल हो चुका है और इन सभी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं हुई है, इसलिए उन्हें डीपीसी में शामिल किया गया है। पीएचक्यू के इस तर्क के बीच मुख्य सवाल यह है कि प्रस्तावित सूची में शामिल होने की पात्रता तय करते समय घोटाले में भूमिका, वसूली और विभागीय कार्रवाई की स्थिति को किस तरह देखा गया है।
पहले भी विवादों में आई थी पदोन्नति सूची
30 सितंबर को उत्कृष्ट पुलिस सेवा के लिए जारी डीजीपी प्रशस्ति पत्र एवं डिस्क सम्मान की सूची में भी मेडिकल बिल घोटाले से जुड़े दो पुलिसकर्मियों गौरव आरोनकर और आरती चतुर्वेदी के नाम शामिल थे। गौरव आरोनकर से 10.99 लाख रुपये और आरती चतुर्वेदी से 85 हजार रुपये की वसूली की गई थी। इसके बाद अब प्रस्तावित पदोन्नति सूची में गौरव आरोनकर का नाम दोबारा सामने आया है। गौरव आरोनकर लंबे समय से पीएचक्यू की प्रशासन शाखा में पदस्थ हैं। शिकायतकर्ता ने प्रशासन और लेखा शाखा में घोटाले से जुड़े कर्मचारियों की तैनाती पर भी सवाल उठाए हैं। उसका कहना है कि प्रशासन शाखा में ही डीपीसी और पुरस्कारों से संबंधित सूचियां तैयार करने जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई जाती हैं।

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