
- किसानों के नाम पर 7.80 करोड़ का पॉलीहाउस घोटाला
गौरव चौहान/भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। किसानों को आधुनिक खेती से जोडऩे के लिए शुरू की गई राष्ट्रीय बागवानी मिशन की योजना खरगोन में कागजी निर्माण और बैंकिंग अनियमितताओं की भेंट चढ़ गई। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की जांच में सामने आया है कि 33 किसानों के नाम पर 7 करोड़ 80 लाख 85 हजार रुपए के पॉलीहाउस ऋण स्वीकृत कराए गए, लेकिन कई मामलों में खेत पर पॉलीहाउस बना ही नहीं और पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया।
जांच के बाद ईओडब्ल्यू ने बैंक ऑफ बड़ौदा की खरगोन शाखा के तत्कालीन अधिकारियों, निजी कंपनियों और उनके संचालकों-साझेदारों समेत कई लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। आरोप है कि किसानों से जमीन के दस्तावेज लेकर उनके नाम पर ऋण स्वीकृत कराया गया और ऋण की रकम निजी कंपनियों तक पहुंचाई गई। इसके बाद निर्माण पूरा होने का दावा करने के लिए कूटरचित दस्तावेज और पूर्णता प्रमाण पत्र तैयार किए गए।
33 किसानों के नाम, करोड़ों का खेल
ईओडब्ल्यू के मुताबिक राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 33 किसानों के नाम पर बैंक ऑफ बड़ौदा से 33 ऋण प्रकरण स्वीकृत कराए गए। इनकी कुल राशि 7.80 करोड़ से ज्यादा थी। मामला तब सामने आया जब ऋण के बदले किए जाने वाले पॉलीहाउस निर्माण और उससे जुड़े दस्तावेजों की जांच की गई। जांच में कई प्रकरणों में निर्माण और भुगतान के बीच गंभीर विसंगतियां मिलीं।
33 में 30 पॉलीहाउस पर सवाल
जांच एजेंसी के अनुसार एटीआई एग्रीकल्चर सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को पांच पॉलीहाउस बनाने थे, लेकिन दो का निर्माण नहीं किया गया। इसके बावजूद पूर्णता प्रमाण पत्र के आधार पर भुगतान हासिल कर लिया गया। किसान एग्रो को 20 पॉलीहाउस बनाने का काम मिला था। आरोप है कि इनमें निर्माण किए बिना ही सभी 20 के लिए कूटरचित दस्तावेज तैयार कर बैंकिंग चैनल के जरिए भुगतान ले लिया गया। सिरां टेक्नो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को आठ पॉलीहाउस बनाने थे और यहां भी बिना निर्माण किए भुगतान लेने की बात जांच में सामने आई है।
लोन से पहले ही बन गए पूर्णता प्रमाण पत्र
घोटाले की जांच में दस्तावेजों की टाइमलाइन ने सबसे गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ईओडब्ल्यू को कई ऐसे पूर्णता प्रमाण पत्र मिले, जिनकी तारीख ऋण स्वीकृति और भुगतान से पहले की थी। 16 मामलों में पूर्णता प्रमाण पत्र ऋण स्वीकृत होने से पहले के पाए गए। तीन मामलों में ऋण राशि जारी होने और पूर्णता प्रमाण पत्र की तारीख एक ही दिन की थी, जबकि 12 प्रकरणों में भुगतान से पहले के प्रमाण पत्र मिले। इससे जांच एजेंसी को दस्तावेज तैयार करने और ऋण भुगतान की प्रक्रिया में मिलीभगत की आशंका मिली है।
बैंक को नुकसान, किसानों के दस्तावेज बने आधार
जांच में आरोप है कि किसानों को योजना का लाभ दिलाने का प्रलोभन देकर उनकी कृषि भूमि से संबंधित दस्तावेज लिए गए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उनके नाम पर ऋण प्रकरण तैयार किए गए। ऋण स्वीकृत होने के बाद रकम कंपनियों को भुगतान की गई। ईओडब्ल्यू का आरोप है कि आरोपियों ने आपस में मिलीभगत कर फर्जी दस्तावेज और कूटरचित पूर्णता प्रमाण पत्र तैयार किए और उनका इस्तेमाल बैंक तथा किसानों के साथ धोखाधड़ी के लिए किया।
एक जमीन, दोबारा लोन और 1.90 करोड़ का मामला
जांच में एक अन्य बैंकिंग अनियमितता भी सामने आई। आरोपी नारायण सिंह ने अपनी कृषि भूमि गिरवी रखकर पॉलीहाउस ऋण लिया था। आरोप है कि बैंक की अनुमति और एनओसी के बिना इसी भूमि का दोबारा बंटवारा कराया गया और फिर उसी संपत्ति को आधार बनाकर 1.90 करोड़ रुपए का कैश क्रेडिट ऋण स्वीकृत कराया गया। ईओडब्ल्यू के अनुसार इस मामले में भी बैंक अधिकारियों और अन्य आरोपियों की भूमिका की जांच की जा रही है।
कुल नुकसान 9.70 करोड़ से ज्यादा
ईओडब्ल्यू के अनुसार पॉलीहाउस ऋण में 7.80 करोड़ रूपए से अधिक की कथित आर्थिक क्षति और भूमि के आधार पर दोबारा लिए गए 1.90 करोड़ रूपए के ऋण को मिलाकर बैंक ऑफ बड़ौदा को कुल 9 करोड़ 70 लाख 85 हजार रुपए की आर्थिक क्षति का आकलन किया गया है। मामले में ईओडब्ल्यू अब आरोपियों की भूमिका, ऋण की रकम के प्रवाह और किसानों के दस्तावेजों के इस्तेमाल समेत अन्य पहलुओं की जांच कर रही है। जांच आगे बढऩे पर इस नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों और लेन-देन के बारे में और जानकारी सामने आने की संभावना है।
