- 96.40 लाख परिवारों ने मांगा जॉबकार्ड, 90.60 लाख को जारी
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
गांवों में रोजगार की गारंटी देने वाली मनरेगा यानी अब वीबीजी-रामजी योजना में चुनौती सिर्फ रोजगार उपलब्ध कराने की नहीं है, बल्कि जॉबकार्ड जारी होने से लेकर उसके एक्टिव रहने और मजदूरी के समय पर भुगतान तक पूरी व्यवस्था में अंतर दिखाई दे रहा है। प्रदेश के आंकड़ों में आवेदन, जारी जॉबकार्ड और एक्टिव जॉबकार्ड के बीच बड़ा गैप है। इसके साथ ही मजदूरी भुगतान में देरी का आंकड़ा भी सामने आया है। प्रदेश में 96 लाख 40 हजार 997 परिवारों ने जॉबकार्ड के लिए आवेदन किया। इनमें से 90 लाख 60 हजार 826 जॉबकार्ड जारी किए गए, लेकिन एक्टिव जॉबकार्ड की संख्या केवल 58 लाख 12 हजार 716 है। वहीं 5 लाख 80 हजार 171 परिवारों को अब तक जॉबकार्ड नहीं मिला है। योजना के आंकड़ों को अलग-अलग स्तर पर देखने से स्थिति और स्पष्ट होती है। आवेदन करने वाले परिवारों की संख्या 96.40 लाख है। इनमें से 90.60 लाख को जॉबकार्ड जारी किया गया, लेकिन एक्टिव जॉबकार्ड 58.12 लाख ही रह गए। इस अंतर का मतलब यह है कि जॉबकार्ड जारी होना और उसका सक्रिय रूप से उपयोग होना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। ऐसे में सिर्फ जारी कार्ड की संख्या को रोजगार की उपलब्धता का आधार नहीं माना जा सकता। योजना के वास्तविक असर को समझने के लिए एक्टिव कार्ड, काम की मांग, उपलब्ध कराए गए रोजगार और भुगतान—इन सभी आंकड़ों को साथ देखना जरूरी है।
1.79 करोड़ वर्कर पंजीकृत, 89.79 लाख एक्टिव
प्रदेश में कुल 1 करोड़ 79 लाख 62 हजार 876 वर्कर पंजीकृत हैं। इनमें 79 लाख 41 हजार 997 महिलाएं हैं। सामाजिक वर्ग के आधार पर 27 लाख 18 हजार 634 एससी, 54 लाख 63 हजार 391 एसटी और 97 लाख 80 हजार 851 अन्य वर्ग के वर्कर पंजीकृत हैं। एक्टिव वर्करों की संख्या 89 लाख 79 हजार 603 है। इनमें 40 लाख 38 हजार 459 महिलाएं शामिल हैं। एक्टिव वर्करों में 12 लाख 46 हजार 286 एससी, 30 लाख 44 हजार 613 एसटी और 46 लाख 88 हजार 704 अन्य वर्ग के मजदूर दर्ज हैं।
जॉबकार्ड क्यों अटके, इसकी पड़ताल जरूरी
विभागीय स्तर पर जॉबकार्ड जारी नहीं होने के पीछे दस्तावेजों की कमी, सत्यापन और प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। लेकिन 5.80 लाख परिवारों के कार्ड लंबित होने और जारी तथा एक्टिव कार्ड के बीच इतने बड़े अंतर के कारण योजना की प्रक्रिया की विस्तृत समीक्षा की जरूरत सामने आती है। योजना में मांग के आधार पर रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। काम नहीं मिलने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ते का भी प्रावधान है। ऐसे में जिस परिवार ने काम की मांग की, उसका जॉबकार्ड बना या नहीं, कार्ड एक्टिव है या नहीं, काम मिला या नहीं और मजदूरी समय पर पहुंची या नहीं—हर चरण की निगरानी जरूरी है। रोजगार मिलने के बाद मजदूरी का भुगतान समय पर होना भी योजना की सफलता का अहम हिस्सा है। 2026-27 में अब तक 6 लाख 95 हजार 767 पेमेंट ट्रांजैक्शन हुए हैं। इनके जरिए कुल 143.56 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया।
दस्तावेज और सत्यापन में अटके कार्ड
आवेदन करने के बावजूद जॉबकार्ड जारी नहीं होने के पीछे विभागीय स्तर पर दस्तावेजों की कमी, सत्यापन और प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। हालांकि, इतने बड़े अंतर के कारण योजना के जमीनी क्रियान्वयन और सरकारी रिकॉर्ड के बीच स्थिति की विस्तृत पड़ताल की जरूरत भी सामने आ रही है। योजना में मांग के आधार पर रोजगार देने की व्यवस्था है। काम उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ते का भी प्रावधान है। ऐसे में जॉबकार्ड से लेकर एक्टिव कार्ड और फिर रोजगार व समय पर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सिर्फ कार्ड नहीं, रोजगार तक पहुंच मायने रखती है
मनरेगा जैसी मांग आधारित रोजगार योजना में सरकारी आंकड़ों का मूल्यांकन केवल जॉबकार्ड जारी करने तक सीमित नहीं रह सकता। आवेदन से लेकर एक्टिव कार्ड और फिर रोजगार व भुगतान तक के आंकड़े ही बताएंगे कि योजना का लाभ जरूरतमंद परिवारों तक किस हद तक पहुंच रहा है। यानी सवाल अब यह नहीं है कि कितने जॉबकार्ड जारी हुए, बल्कि यह है कि जारी कार्डों में कितने वास्तव में सक्रिय हैं और कितने परिवारों को मांग के मुताबिक समय पर रोजगार और मजदूरी मिल रही है।
