- 48 नेताओं को नियुक्ति के महीनों बाद भी मंत्री दर्जे का आदेश नहीं
- अफसरों पर प्रभाव और कार्यकर्ताओं के काम कराने की शक्ति को लेकर उठ रहे सवाल
- गौरव चौहान

मध्यप्रदेश में निगम, मंडल, प्राधिकरण, बोर्ड और आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियों के बाद अब मंत्री दर्जे को लेकर नया विवाद सामने आ रहा है। सत्ता और संगठन ने लंबे इंतजार के बाद करीब 48 नेताओं को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी तो सौंप दी, लेकिन इनके साथ कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री का दर्जा देने के आदेश अब तक जारी नहीं हुए हैं। इससे कुछ पदाधिकारी असहज बताए जा रहे हैं।
भाजपा नेताओं को निगम-मंडल में नियुक्ति के लिए करीब ढाई से तीन साल तक इंतजार करना पड़ा। मार्च से जुलाई के बीच सत्ता और संगठन के स्तर पर चर्चा और सहमति के बाद अलग-अलग संस्थाओं में नियुक्तियां की गईं। अब पद मिलने के बाद अगला इंतजार मंत्री दर्जे का है। राजनीतिक हलकों में इसे लेकर सवाल उठ रहा है कि जब पद दिया गया है तो उससे जुड़ी प्रशासनिक ताकत क्यों नहीं दी जा रही। सरकार ने हाल के महीनों में विभिन्न निगम, मंडल, विकास प्राधिकरण, बोर्ड और आयोगों में 34 नेताओं को अध्यक्ष और 14 को उपाध्यक्ष बनाया है। इनमें कई वरिष्ठ और लंबे समय से संगठन में सक्रिय नेता शामिल हैं। राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया का कार्यकाल भी कुछ ही महीनों में समाप्त होने वाला है।
मंत्री दर्जा नहीं मिलने से पड़ रहा फर्क
राजनीतिक नियुक्तियों के साथ मंत्री दर्जा मिलने का अपना अलग महत्व माना जाता है। अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री और उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा मिलने पर प्रोटोकॉल के साथ प्रशासनिक स्तर पर भी पद की हैसियत बढ़ती है। पदाधिकारियों का मानना है कि इससे अधिकारियों से समन्वय, कार्यकर्ताओं की समस्याओं के समाधान और विभागीय स्तर पर पत्राचार में प्रभाव बढ़ता है। एक बड़े बोर्ड के अध्यक्ष ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मंत्री दर्जे के बिना पद तो है, लेकिन अधिकारियों से काम कराने में पहले जैसी प्रभावशीलता नहीं रहती। कार्यकर्ता भी अपने काम लेकर आते हैं और कई बार उन्हें संबंधित विभागों तक पहुंचाने में अपेक्षित तवज्जो नहीं मिलती।
नाराजगी का असर कामकाज पर भी
सूत्रों के मुताबिक कुछ अध्यक्ष और उपाध्यक्ष मंत्री दर्जा नहीं मिलने से नाराज हैं। उनका तर्क है कि लंबे समय तक संगठन में काम करने के बाद जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद थी कि सरकार में भी प्रभावी भूमिका मिलेगी। अब केवल पद मिलने से उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हुई हैं। माना जा रहा है कि इसका असर कुछ पदाधिकारियों की सक्रियता पर भी पड़ रहा है। राजनीतिक नियुक्तियों के पुराने पैटर्न को देखें तो आमतौर पर निगम-मंडल के अध्यक्ष और उपाध्यक्षों की नियुक्ति के बाद अलग आदेश जारी कर उन्हें मंत्री दर्जा दिया जाता रहा है। इस बार नियुक्तियां होने के बावजूद दर्जे का फैसला लंबित रहने से भाजपा के भीतर चर्चा तेज है। सवाल अब यही है कि सरकार इन पदों को सिर्फ राजनीतिक जिम्मेदारी तक सीमित रखेगी या इन्हें मंत्री दर्जे के जरिए प्रशासनिक प्रभाव भी देगी।
