
- 6 साल में 1000+ एफआईआर
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में डकैत गिरोहों का दौर भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन डकैतों से निपटने के लिए बनाया गया मध्य प्रदेश डकैती एवं व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981 अब भी ग्वालियर-चंबल अंचल में इस्तेमाल हो रहा है। इसी विरोधाभास पर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने सरकार से सवाल किया है कि जब प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो इस विशेष कानून को खत्म क्यों न कर दिया जाए। पूर्व गृह मंत्री डॉ. गोविंद सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया। याचिका में दावा किया गया है कि 2020 से 2026 के बीच ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना और श्योपुर में इस कानून के तहत 1000 से अधिक एफआईआर दर्ज की गईं।
याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2020 से 2026 के बीच विधानसभा में तत्कालीन गृह मंत्री अलग-अलग मौकों पर यह जानकारी दे चुके हैं कि प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है। इसके बावजूद उसी अवधि में छह जिलों में इस विशेष कानून के तहत बड़ी संख्या में मामले दर्ज होने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शर्मा ने तर्क दिया कि 1981 में जिस विशेष परिस्थिति से निपटने के लिए कानून बनाया गया था, वह अब मौजूद नहीं है। ऐसे में कानून का लगातार इस्तेमाल नागरिकों के समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़े सवाल खड़े करता है।
सामान्य विवाद में भी कठोर कानून लगाने का आरोप: याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई मामलों में जमीन-जायदाद के विवाद, आपसी रंजिश और सामान्य मारपीट जैसी घटनाओं में भी डकैती एक्ट की कठोर धाराएं जोड़ दी जाती हैं। खासतौर पर ग्रामीणों, किसानों और युवाओं के खिलाफ इस कानून के इस्तेमाल को लेकर आपत्ति जताई गई है।
डकैतों के लिए बना कानून, अब विवादों में इस्तेमाल?
1981 में यह कानून उस समय बनाया गया था, जब ग्वालियर-चंबल के बीहड़ों के अलावा सतना और पन्ना के जंगलों में भी डकैत गिरोह सक्रिय थे। अपहरण, डकैती और सामूहिक हत्याओं जैसी गंभीर घटनाओं से निपटने के लिए सामान्य कानूनों से अलग कड़े प्रावधान किए गए थे। अब हाई कोर्ट में मूल सवाल यही है कि जब डकैत गिरोहों का वह दौर समाप्त हो चुका है, तो उस दौर के लिए बनाया गया विशेष कानून आज भी क्यों लागू रहे और उसका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जाए।
धारा 11 और 13 बनीं विवाद का केंद्र
याचिकाकर्ता ने अधिनियम की धारा 11 और 13 के प्रावधानों को भी चुनौती दी है। धारा 11 के तहत गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े विशेष प्रावधान हैं तथा ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत उपलब्ध नहीं होने की बात याचिका में उठाई गई है। वहीं धारा 13 दोषसिद्धि पर न्यूनतम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान करती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सामान्य प्रकृति के विवादों में इन प्रावधानों का इस्तेमाल होने पर आरोपी के लिए कानूनी राहत हासिल करना मुश्किल हो जाता है।
