- राष्ट्रपति की मंजूरी से लेकर नियम बनने तक पूरी करनी होंगी कई प्रक्रियाएं

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) कानून विधानसभा से पारित होने के बावजूद तत्काल लागू नहीं होगा। सरकार को इसे लागू करने से पहले कई संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इनमें सबसे महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके बाद नियम (रूल्स) तैयार करना है। विधानसभा के मॉनसून सत्र में पारित 14 विधेयकों में यूसीसी विधेयक सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधेयक फिलहाल राज्यपाल के अनुमोदन की प्रक्रिया में है। राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही राज्य सरकार कानून को लागू करने के लिए विस्तृत नियमावली तैयार करेगी। नियमों के राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद ही यूसीसी प्रदेश में प्रभावी होगा।
यूसीसी लागू होने से पहले इसे तीन प्रमुख चरण से होकर गुजरना पड़ेगा। विधानसभा से पारित विधेयक का कानूनी परीक्षण कर राज्यपाल अनुमोदन देंगे। उसके बाद संविधान के प्रावधानों के तहत विधेयक को राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाएगा। फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार यूसीसी के नियम तैयार करेगी। नियमों के राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद ही कानून लागू होगा। विधि एवं विधायी कार्य विभाग पहले से ही यूसीसी के नियमों के प्रारूप पर काम कर रहा है। विभाग अन्य राज्यों के कानूनी ढांचे और प्रक्रियाओं का भी अध्ययन कर रहा है, ताकि राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही नियमों को अंतिम रूप देकर जल्द लागू किया जा सके। हालांकि, राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने से पहले नियमों में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया जाएगा।
मध्य प्रदेश का यूसीसी विधेयक-2026
समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 का उद्देश्य राज्य के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, गोद लेने और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत मामलों में समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है। इसका उद्देश्य विभिन्न धर्मों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर समान नागरिक कानून लागू कर कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करना है। हालांकि, राज्य की लगभग 21 प्रतिशत आदिवासी आबादी को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
यूसीसी के प्रमुख प्रावधान
मप्र के समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 में सभी समुदायों में बहुविवाह (पॉलिगैमी) पर प्रतिबंध लगाया गया है। तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक है। सभी विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीयन किया गया है। लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। बेटे और बेटी को उत्तराधिकार में समान अधिकार दिया गया है। विवाह की न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष की गई है। तलाक, भरण-पोषण और पारिवारिक विवादों के लिए समान कानूनी प्रावधान है। पहचान छिपाकर विवाह करना, लिव-इन संबंध का पंजीयन न कराना तथा पहले से विवाहित होने के बावजूद लिव-इन में रहने जैसे मामलों में जुर्माना और सजा का प्रावधान है।
केवल उत्तराखंड में लागू है यूसीसी
भाजपा शासित राज्यों में अब तक उत्तराखंड ही ऐसा राज्य है, जहां यूसीसी को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद लागू किया जा चुका है। वहीं गुजरात और असम में पारित यूसीसी विधेयक अभी राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रतीक्षा में हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश में यूसीसी लागू करने के लिए व्यापक प्रशासनिक और कानूनी तैयारी की आवश्यकता होगी, क्योंकि यह व्यक्तिगत नागरिक कानूनों से जुड़ा विषय होने के साथ-साथ कुछ मामलों में दंडात्मक प्रावधान भी शामिल करता है।
