बाघों का बढ़ता खौफ, छह माह में 43 लोगों की मौत

  • शहडोल में 13, सिवनी में 10 की गई जान

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या को भले ही वन्यजीव संरक्षण की बड़ी सफलता माना जा रहा हो, लेकिन इसके साथ ही प्रदेश में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष का एक नया और खतरनाक दौर शुरू हो चुका है। 2026 में 14 जून तक के वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में जंगली जानवरों के हमलों में 43 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इनमें से आधे से अधिक यानी 22 मौतें अकेले बाघों के हमलों के कारण हुई हैं, जिसके चलते बाघ अब ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ा काल साबित हो रहे हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में सिवनी और शहडोल संभाग शामिल हैं, जहां बाघ, हाथी और भालू जैसे हिंसक वन्यजीवों की मानवीय बस्तियों में आवाजाही और संपर्क बेहद बढ़ गया है। वन विभाग के रिकॉर्ड यह स्पष्ट करते हैं कि ये दुखद घटनाएं गहरे जंगलों के भीतर कम और जंगलों से लगे गांवों, खेतों, तथा महुआ और तेंदूपत्ता संग्रह वाले क्षेत्रों में अधिक हुई हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह पहली बार देखने में आया है जब महुआ और तेंदूपत्ता बीनने के दौरान इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बाघ ने अपना शिकार बनाया है।
बालाघाट-सीधी में भी खौफ
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक 13 मौतें शहडोल संभाग (जिसमें बांधवगढ़, अनूपपुर और दक्षिण शहडोल का इलाका आता है) में दर्ज की गईं, जबकि सिवनी क्षेत्र (पेंच टाइगर रिजर्व, दक्षिण सिवनी और बरघाट) में 10 लोगों की जान गई। इसके अलावा बालाघाट में चार, सीधी में तीन तथा पन्ना और छिंदवाड़ा जिलों में दो-दो मौतें दर्ज की गई हैं।
गर्मी में सबसे ज्यादा हुए हमले
समय के हिसाब से देखा जाए तो जनवरी से जून के बीच सबसे अधिक हादसे मार्च, अप्रैल और मई के महीनों में सामने आए। यही वह समय होता है जब स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी महुआ चुनने, तेंदूपत्ता तोडऩे, जलाऊ लकड़ी और मवेशियों के लिए चारा जुटाने बड़ी संख्या में जंगलों का रुख करते हैं।

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