
- राष्ट्रीय रूर्बन मिशन में मध्यप्रदेश पिछड़ा, 23वें स्थान पर पहुंचा प्रदेश
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
गांवों को शहर जैसी सुविधाएं देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से शुरू किए गए श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय रूर्बन मिशन के क्रियान्वयन में मध्यप्रदेश की स्थिति संतोषजनक नहीं रही है। केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना में प्रदेश 23वें स्थान पर है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में योजना के धीमे क्रियान्वयन और बजट के कम उपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में विकास, रोजगार और पलायन रोकने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय रूर्बन मिशन के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के कई चिन्हित क्लस्टरों में तय लक्ष्यों के अनुसार काम नहीं हो पाया। अफसरों की निगरानी और रुचि की कमी के कारण योजना का अपेक्षित लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंच सका।
केंद्र सरकार ने गांवों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने, बुनियादी सुविधाएं विकसित करने और ग्रामीणों को शहरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय रूर्बन मिशन शुरू किया था। मध्यप्रदेश में इस मिशन के तहत 167 ग्राम पंचायतों का चयन किया गया है। इन्हें 19 विकास क्लस्टरों में विभाजित किया गया। मैदानी क्षेत्रों में 25 हजार से 50 हजार आबादी वाले गांवों को शामिल किया गया। जनजातीय और पहाड़ी क्षेत्रों में 5 हजार से 10 हजार आबादी वाले गांवों को चयनित किया गया। इन क्लस्टरों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, कृषि प्रसंस्करण इकाइयां विकसित करने, सडक़, स्वच्छता, कौशल विकास और डिजिटल सुविधाओं को मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया था।
तीन साल में खर्च करनी थी राशि, लेकिन नहीं हो पाया पूरा उपयोग
मिशन के तहत प्रत्येक क्लस्टर के लिए तीन साल की अवधि में राशि खर्च करने का प्रावधान था। मैदानी क्षेत्रों के क्लस्टर के लिए 30 करोड़ रुपये और जनजातीय क्षेत्रों के क्लस्टर के लिए 15 करोड़ रुपये मिले थे। इसमें 60 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राशि राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन प्रदेश के अधिकांश क्लस्टरों में स्वीकृत राशि का पूरा उपयोग नहीं किया जा सका। इसके कारण विकास कार्यों की गति प्रभावित हुई।
कई क्लस्टरों में आधे से भी कम खर्च
कैग की रिपोर्ट के अनुसार दूसरे चरण में चयनित कई क्लस्टरों में बजट खर्च की स्थिति बेहद कमजोर रही। ग्वालियर के छिमक क्लस्टर को मिले 30 करोड़ में से केवल 12.32 करोड़ रुपये (41.07 प्रतिशत) खर्च हुए। धार के गुनावद क्लस्टर में 15 करोड़ में से 5.24 करोड़ रुपये (34.94 प्रतिशत) खर्च हुए। झाबुआ के मोहनकोट क्लस्टर में 15 करोड़ में से 4.40 करोड़ रुपये (29.33 प्रतिशत) खर्च किए गए। बैतूल के देशावाड़ी क्लस्टर में 15 करोड़ में से सिर्फ 3.57 करोड़ रुपये खर्च हो सके। रीवा के गौरी क्लस्टर में 30 करोड़ में से 6.74 करोड़ रुपये (22.47 प्रतिशत) ही उपयोग हुए। ग्वालियर के मोहना क्लस्टर में स्वीकृत 30 करोड़ रुपये में से कोई राशि खर्च नहीं हो सकी। तीसरे चरण में भी कई क्लस्टरों में आवंटित राशि का पूरा उपयोग नहीं किया गया।
3462 कार्यों में से केवल 2078 के बने प्रोजेक्ट रिपोर्ट
कैग ने वर्ष 2016 से 2024 के बीच प्रदेश में मिशन की प्रगति का मूल्यांकन किया। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रदेश में 19 समेकित क्लस्टर कार्य योजनाएं तैयार की गई थीं। इन योजनाओं में शामिल 3462 कार्यों में से केवल 2078 कार्यों के लिए परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार किए गए। कैग ने पाया कि तीनों चरणों में चयनित क्लस्टरों को दिए गए क्रिटिकल गैप फंड (सीजीएफ) का उपयोग केवल 2.40 प्रतिशत से 52.93 प्रतिशत तक ही हो सका। इसका मतलब है कि विकास कार्यों के लिए उपलब्ध कराई गई बड़ी राशि खर्च नहीं हो पाई और कई परियोजनाएं अधूरी रह गईं।
रोजगार और पलायन रोकने का लक्ष्य प्रभावित
राष्ट्रीय रूर्बन मिशन का उद्देश्य गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाना और ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन रोकना था। इसके लिए कृषि आधारित उद्योग, कौशल विकास, डिजिटल कनेक्टिविटी और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया गया था। लेकिन बजट के कम उपयोग और योजनाओं के धीमे क्रियान्वयन के कारण इन उद्देश्यों को पूरा करने में बाधा आई है।
कैग की रिपोर्ट ने उठाए प्रशासनिक सवाल
कैग की रिपोर्ट ने योजना के क्रियान्वयन में विभागीय समन्वय, निगरानी व्यवस्था और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, योजनाओं के लिए राशि उपलब्ध होने के बावजूद उसका प्रभावी उपयोग नहीं हो पाया। राष्ट्रीय रूर्बन मिशन में प्रदेश की कमजोर रैंकिंग अब सरकार और प्रशासन के लिए चुनौती बन गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं पहुंचाने के लिए अब बेहतर मॉनिटरिंग और समयबद्ध क्रियान्वयन की जरूरत बताई जा रही है।
