- ‘अपनों’ के निशाने पर दिग्गी राजा
- गौरव चौहान

मध्यप्रदेश कांग्रेस में लंबे समय से अंदरखाने चल रहा शक्ति संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के बीच उभरे मतभेद अब दिल्ली तक पहुंच चुके हैं। लगातार हो रही सार्वजनिक बयानबाजी, नेताओं के एक-दूसरे पर हमले और दिल्ली भेजी गई शिकायतों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। सूत्रों के मुताबिक, शीर्ष नेतृत्व ने पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट तलब की है और संगठन में जल्द बड़े बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा। राज्यसभा चुनाव के बाद शुरू हुआ असंतोष अब खुले गुटीय संघर्ष का रूप ले चुका है। स्थिति यह है कि पार्टी के विधायक, पूर्व मंत्री और संगठन पदाधिकारी अलग-अलग बयान देकर नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। इससे कांग्रेस की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
पिछले एक सप्ताह में कांग्रेस के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से दिग्विजय सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला। विधायक आरिफ मसूद और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने उन पर तीखी टिप्पणी की, जबकि विधायक प्रवीण पाठक ने सवाल उठाया कि कार्यकर्ता आखिर किसकी बात माने—दिग्विजय सिंह की या जीतू पटवारी की। प्रदेश महामंत्री निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी ने भी सोशल मीडिया पर वरिष्ठ नेताओं को प्रदेशाध्यक्ष के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की नसीहत दी। बढ़ते विवाद के बीच नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने पहले जीतू पटवारी और फिर दिग्विजय सिंह से अलग-अलग मुलाकात की। भोपाल स्थित दिग्विजय सिंह के आवास पर हुई बंद कमरे की बैठक को संगठन में डैमेज कंट्रोल की कोशिश माना जा रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि दिल्ली नेतृत्व के निर्देश पर सिंघार दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने में जुटे हैं।
अंदरूनी लड़ाई बढ़ी
मप्र में दो दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर कांग्रेस 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में संगठन को मजबूत करने में जुटी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी लगातार संगठनात्मक बैठकों और आंदोलनों के जरिए कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर पार्टी के भीतर दिग्गज नेताओं से लेकर छात्र संगठनों तक सामने आ रहे विवाद कांग्रेस की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। हाल के दिनों में उज्जैन भूमि आवंटन विवाद पर नेताओं के अलग-अलग बयान, यूथ कांग्रेस की बैठक में धक्का-मुक्की और एनएसयूआई में अनुशासनहीनता जैसे घटनाक्रमों ने संगठन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस इन अंदरूनी मतभेदों को खत्म कर 2028 और 2029 के चुनाव से पहले खुद को मजबूत कर पाएगी?
संगठन में बदलाव के संकेत
दिल्ली में पहुंची शिकायतों और लगातार बढ़ते विवाद से पार्टी हाईकमान नाराज बताया जा रहा है। संगठन में बड़े बदलाव की चर्चा तेज है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रभारी हरीश चौधरी की जिम्मेदारी बदली जा सकती है। हालांकि, इस पर अभी कोई आधिकारिक संकेत नहीं मिला है। पूरे घटनाक्रम के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की खामोशी भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि मौजूदा हालात में उनका रुख संगठन की दिशा तय करने में अहम हो सकता है।
राहुल गांधी से हस्तक्षेप की मांग
पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव ने भी सोशल मीडिया के जरिए राहुल गांधी से हस्तक्षेप की अपील की है। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर बढ़ता टकराव कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर कर रहा है और संगठनात्मक एकता बनाए रखने के लिए केंद्रीय नेतृत्व को तत्काल पहल करनी चाहिए। कांग्रेस में यह विवाद अब केवल नेताओं की बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। मामला संगठनात्मक नेतृत्व, गुटीय संतुलन और आगामी चुनावी रणनीति से जुड़ गया है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो इसका असर पार्टी की राजनीतिक सक्रियता और संगठनात्मक मजबूती पर पड़ सकता है।
चुनाव से पहले बड़ी चुनौती
लगातार सामने आ रहे इन घटनाक्रमों ने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और अनुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर पार्टी प्रदेश सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है, वहीं दूसरी ओर नेताओं और छात्र संगठनों के भीतर बढ़ती खींचतान संगठन की एकजुटता पर असर डालती दिख रही है। ऐसे में 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को एकजुट और अनुशासित बनाए रखने की होगी।
