
- प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा के बाद अब मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें तेज
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। भारतीय जनता पार्टी की नई प्रदेश कार्यसमिति घोषित होने के बाद अब राजनीतिक हलकों में अगली सबसे बड़ी चर्चा संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर शुरू हो गई है। 23 जून को घोषित 106 सदस्यीय प्रदेश कार्यसमिति में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव समेत 18 मंत्रियों को शामिल किया गया है, लेकिन चार कैबिनेट मंत्रियों और अधिकांश राज्यमंत्रियों को जगह नहीं मिलने से सियासी अटकलों का दौर तेज हो गया है। पार्टी के भीतर इसे केवल संगठनात्मक संतुलन का मामला बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे संभावित कैबिनेट विस्तार से जोडकऱ भी देखा जा रहा है। हालांकि भाजपा के वरिष्ठ नेता इस तरह की अटकलों को फिलहाल उचित नहीं मानते और इसे संगठनात्मक समीकरणों का हिस्सा बता रहे हैं।
भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति में प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच बेहतर समन्वय की झलक दिखाई देती है। कार्यसमिति में 106 सदस्य बनाए गए हैं, जबकि 40 नेताओं को स्थायी आमंत्रित सदस्य का दर्जा दिया गया है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के कार्यकाल में गठित कार्यसमिति में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित कई वरिष्ठ नेताओं को स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया था। इस बार सूची का स्वरूप बदला हुआ नजर आया और संगठन ने नए संतुलन के साथ टीम तैयार की।
चार कैबिनेट मंत्री सूची से बाहर
सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि चार कैबिनेट मंत्रियों को प्रदेश कार्यसमिति में स्थान नहीं मिला। इनमें राकेश शुक्ला (नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री), प्रद्युम्न सिंह तोमर (ऊर्जा मंत्री), करण सिंह वर्मा (राजस्व मंत्री)और नागर सिंह चौहान (अनुसूचित जनजाति कार्य विभाग) शामिल हैं। इन चारों नेताओं का अलग-अलग राजनीतिक आधार और संगठनात्मक पृष्ठभूमि रही है। इनमें संघ से जुड़े नेता भी हैं, सिंधिया समर्थक भी और लंबे संगठनात्मक अनुभव वाले वरिष्ठ मंत्री भी शामिल हैं। ऐसे में इनके नाम सूची से बाहर रहने पर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। मौजूदा मंत्रिमंडल में 10 राज्यमंत्री हैं। इनमें स्वतंत्र प्रभार वाले कृष्णा गौर, धर्मेंद्र सिंह लोधी, गौतम टेटवाल, नारायण सिंह पंवार और अन्य मंत्री शामिल हैं। हालांकि प्रदेश कार्यसमिति में केवल कृष्णा गौर को ही स्थान मिला है। बाकी राज्यमंत्रियों को संगठन की नई टीम में जगह नहीं दी गई, जिससे यह संकेत भी मिल रहा है कि संगठन ने सीमित प्रतिनिधित्व की रणनीति अपनाई है।
अलग-अलग वजहों से चर्चा में चारों मंत्री
जिन चारों मंत्रियों को प्रदेश कार्यसमिति में जगह नहीं मिली है, वे अलग-अलग कारणों से चर्चा में रहे हैं। भिंड जिले के मेहगांव से विधायक राकेश शुक्ला पहली बार कैबिनेट मंत्री बने हैं। वे संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। वर्ष 2013 में टिकट कटने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव भी लड़ा था। 2023 में दोबारा विधायक बनने के बाद उन्हें मंत्रिमंडल में जगह मिली, लेकिन कार्यसमिति में स्थान नहीं मिला। पूर्व कांग्रेस नेता प्रद्युम्न सिंह तोमर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में आए थे। कमलनाथ सरकार और बाद में शिवराज सरकार के साथ वर्तमान मोहन सरकार में भी मंत्री हैं। सिंधिया खेमे के महत्वपूर्ण नेता माने जाने वाले तोमर का कार्यसमिति से बाहर रहना चर्चा का विषय बना हुआ है, जबकि इसी खेमे के मंत्री तुलसीराम सिलावट को कार्यसमिति में स्थान मिला है। आलीराजपुर से लगातार चौथी बार विधायक चुने गए नागर सिंह चौहान पहली बार कैबिनेट मंत्री बने। पिछले वर्ष वन विभाग उनके पास से लेकर रामनिवास रावत को दिए जाने के बाद वे सुर्खियों में आए थे। उस समय उन्होंने नाराजगी भी जताई थी। अब कार्यसमिति में भी उन्हें जगह नहीं मिली। सीहोर जिले की इछावर सीट से आठवीं बार विधायक बने करण सिंह वर्मा लगातार दूसरी बार राजस्व मंत्री हैं। लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद उनका नाम भी कार्यसमिति में शामिल नहीं किया गया।
अब कैबिनेट विस्तार की संभावना
प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा के बाद अब भाजपा में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन मंत्रियों को संगठन में जगह नहीं मिली है, उनके भविष्य को लेकर अटकलें स्वाभाविक हैं। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि कार्यसमिति में शामिल या बाहर रहने का सीधा संबंध मंत्रिमंडल से जोडकऱ नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार संगठन में क्षेत्रीय, सामाजिक, जातीय और राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखकर नाम तय किए जाते हैं। इसलिए किसी मंत्री का कार्यसमिति में शामिल नहीं होना यह संकेत नहीं माना जा सकता कि उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया जाएगा। फिलहाल भाजपा की नई कार्यसमिति बनने के बाद अब सबकी नजर संभावित कैबिनेट विस्तार पर टिकी है। यदि निकट भविष्य में मंत्रिमंडल में फेरबदल होता है तो कार्यसमिति से बाहर रहे मंत्रियों को लेकर चल रही चर्चाओं को और बल मिल सकता है।
