- 2,800 करोड़ रुपए के नुकसान की आशंका

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र की अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की लगातार बढ़ती कीमतों से आम जनता पहले ही परेशान है, लेकिन अब केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में की गई कटौती ने राज्य सरकारों की चिंता भी बढ़ा दी है। इसी क्रम में मध्यप्रदेश सरकार को चालू वित्तीय वर्ष में करीब 2,800 करोड़ रुपए के राजस्व नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है।
दरअसल, अमेरिका-इजरायल-ईरान तनाव और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। इसका सीधा असर भारत में ईंधन कीमतों पर पड़ा। बढ़ती महंगाई और तेल कंपनियों पर दबाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने करीब एक महीने पहले पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली केंद्रीय आबकारी शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। केंद्र सरकार का उद्देश्य उपभोक्ताओं को राहत देना और तेल कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव को कम करना था, लेकिन इस फैसले का असर राज्यों की आय पर भी पड़ा है।
केंद्रीय करों में मप्र को मिलती है सात प्रतिशत हिस्सेदारी
जानकारों के मुताबिक पेट्रोल और डीजल से केंद्र सरकार को सालाना लगभग एक लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। वित्तीय व्यवस्था के अनुसार इस कर का एक हिस्सा राज्यों को भी दिया जाता है। केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स वितरण की व्यवस्था के तहत कुल संग्रह का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को मिलता है। मध्यप्रदेश को केंद्रीय करों में करीब सात प्रतिशत हिस्सेदारी प्राप्त होती है। ऐसे में एक्साइज ड्यूटी में कटौती का सीधा असर राज्य के हिस्से पर पड़ा है और अनुमान है कि प्रदेश को करीब 2,800 करोड़ रुपये कम प्राप्त होंगे। हालांकि राज्य सरकार को उम्मीद है कि पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती खुदरा कीमतों से वैट के जरिए होने वाली आय में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है। पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल और डीजल के दामों में लगभग चार रुपये प्रति लीटर तक की वृद्धि दर्ज की गई है। चूंकि वैट कीमत के अनुपात में लगाया जाता है, इसलिए ईंधन महंगा होने पर राज्य सरकार की आय स्वत: बढ़ जाती है।
मप्र में सबसे अधिक वैट और उपकर
मप्र उन राज्यों में शामिल है जहां पेट्रोल और डीजल पर सबसे अधिक वैट और उपकर वसूला जा रहा है। वर्तमान में प्रदेश सरकार पेट्रोल पर 29 प्रतिशत वैट, 2.50 रुपये प्रति लीटर अतिरिक्त वैट और एक प्रतिशत उपकर वसूल रही है। वहीं डीजल पर 19 प्रतिशत वैट, 1.50 रुपये प्रति लीटर अतिरिक्त वैट और एक प्रतिशत उपकर लिया जा रहा है। यही वजह है कि प्रदेश में ईंधन की कीमतें कई अन्य राज्यों की तुलना में अधिक बनी हुई हैं। ईंधन पर अधिक करों को लेकर अब राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। कांग्रेस समेत विपक्षी दल लगातार राज्य सरकार पर वैट कम करने का दबाव बना रहे हैं। वहीं पेट्रोल-डीजल डीलर्स एसोसिएशन का भी कहना है कि अधिक कीमतों के कारण प्रदेश में ईंधन की बिक्री प्रभावित हो रही है। पड़ोसी राज्यों की तुलना में महंगा पेट्रोल-डीजल होने से परिवहन व्यवसायी और वाहन चालक सीमावर्ती जिलों में दूसरे राज्यों से ईंधन खरीदने लगे हैं, जिससे प्रदेश के व्यापार पर भी असर पड़ रहा है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने फिलहाल वैट में किसी प्रकार की कटौती के संकेत नहीं दिए हैं। सरकार की चिंता यह भी है कि यदि वैट कम किया गया तो पहले से दबाव में चल रही आर्थिक स्थिति और अधिक प्रभावित हो सकती है। ऐसे में आने वाले समय में प्रदेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आम जनता को राहत देने और राजस्व संतुलन बनाए रखने की होगी।
