अब छोटे-छोटे विवादों के लिए नहीं लगाने पड़ेंगे कोर्ट-कचहरी के चक्कर

कोर्ट-कचहरी
  • नगरीय निकायों के विवादों सुलझाएगा ट्रिब्यूनल

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। नगरीय निकाय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सरकार ने एक बड़ी राहत दी है।  कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलावों के तहत, नगर निगमों और नगरपालिकाओं से जुड़े छोटे-मोटे विवादों के निपटारे के लिए विशेष ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। इसका उद्देश्य सिविल कोर्ट का बोझ कम करना और स्थानीय लोगों को त्वरित न्याय दिलाना है। इससे आम जन को कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने के बजाय एक विशेषज्ञ निकाय से जल्दी और निष्पक्ष समाधान मिलने की उम्मीद बढ़ी है। ट्रिब्यूनल के माध्यम से अवैध निर्माण, भवन निर्माण अनुमति, स्थानीय शिकायतें जैसे नागरिक सेवाओं, पानी, सफाई, और छोटे अतिक्रमण से जुड़े मुद्दे, क्षेत्रीय सीमा विवाद सुलझाए जाएंगे।
गौरतलब है कि नगरीय निकाय क्षेत्र में आए दिन प्रशासन और लोगों के बीच विवाद की स्थिति निर्मित होती थी। अब विवादों के निराकरण को लेकर इस बदलाव की वजह है मप्र माध्यस्थम अधिकरण अधिनियम 2025 में किया गया संशोधन। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 17 अप्रैल से इसे लागू भी कर दिया गया है। संशोधन के बाद अधिनियम की परिभाषा बदल गई है तो इसका दायरा भी कई गुना बढ़ा दिया गया है। विवादों के निराकरण की समय सीमा भी तय कर दी गई है। अब इसमें सिर्फ बड़ी सरकारी कंपनियां ही नहीं, बल्कि नगर पालिका व नगर निगम, यहां तक कि ग्राम पंचायतें भी शामिल होंगी। इसका मतलब है कि इन निकायों के निर्माण कार्यों के विवाद भी अब इसी स्पेशल ट्रिब्यूनल में भेजे जाएंगे। नगरीय और ग्राम निकायों से जुड़े छोटे-छोटे विवाद अब न अदालत पहुंचेंगे और न इन विवादों का साया विकास कार्यों पर पड़ेगा। सरकारी विभाग, निगम-मंडलों व आयोग की तरह नगर निगम, पालिकाओं से लेकर ग्राम पंचायतों से जुड़े विवादों का निपटारा भी अब स्पेशल ट्रिब्यूनल में किया जाएगा। निकायों द्वारा कराए जाने वाले निर्माण कार्यों के अलावा सड़क, बांध, पुल के साथ ही विद्युत लाइन, सीवरेज सिस्टम और सामग्री सप्लाई जैसे ठेकों के उल्लंघन के मामलों का निराकरण भी अदालतों की बजाए इस ट्रिब्यूनल में ही किया जा सकेगा।
ट्रिब्यूनल में होगी पारदर्शिता
ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए अब एक सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी बनाई जाएगी। इस कमेटी की अध्यक्षता हाई कोर्ट के जज करेंगे और प्रदेश के मुख्य सचिव इस कमेटी के सदस्य होंगे। पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कमेटी चेयरमैन और सदस्यों के पद के लिए दो-दो नामों के पैनल की सिफारिश करेगी, जिस पर अंतिम फैसला सरकार लगी। अब ट्रिब्यूनल के चेयरमैन और सदस्यों का कार्यकाल 5 साल से घटाकर 3 साल कर दिया गया है। यदि कोई सदस्य काम करने में अक्षम पाया जाता है या अपने पद का गलत इस्तेमाल करता है, तो उसे हटाने के नियम भी अब काफी सख्त कर दिए गए हैं। डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देते हुए अब ट्रिब्यूनल में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी सुनवाई हो सकेगी। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव डेडलाइन में किया गया है। अब ट्रिब्यूनल को नोटिस मिलने के 2 साल के भीतर अपना फैसला सुनाना होगा। अगर बहुत जरूरी हुआ तो स्पेशल केस में ही सिर्फ 6 माह का अतिरिक्त समय मिल सकेगा। इस बदलाव के बाद सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जन सुविधा के विकास कार्य अब निकायों और ठेकेदारों के बीच विवाद की स्थिति में भी बंद नहीं होंगे। ट्रिब्यूनल में सुनवाई के दौरान भी विकास कार्य जारी रहेंगे। इससे ठेकेदारों और सरकार के बीच लंबित पड़े करोड़ों रुपयों के विवादों का निपटारा जल्द हो सकेगा। अगर सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष आपस में समझौता कर लेते हैं, तो ट्रिब्यूनल उस समझौते के आधार पर केस को वहीं बंद कर सकता है। नए कानून में अंतरिम राहत का भी प्रावधान है। सुनवाई के दौरान किसी सामान को खराब होने से बचाने, बैंक गारंटी को कैश कराने या किसी प्रॉपर्टी के निरीक्षण के लिए कोर्ट से तुरंत आदेश लिये जा सकेंगे। यह कानून उन सभी मामलों पर भी लागू होगा जो अभी कोर्ट में लंबित हैं।
विवादों का होगा त्वरित निपटारा
ट्रिब्यूनल में अब तक केवल निर्माण विभागों जैसे पीडब्ल्यूडी, पीएचई, जल संसाधन और निगम-मंडलों जैसे सडक़ विकास प्राधिकरण, आवास संघ एवं हाउसिंग बोर्ड से जुड़े विवादों की ही सुनवाई होती थी। ऐसे में नगर निगम, नगर पालिका, नगर परिषद और ग्राम पंचायतों में छोटे ठेकेदारों और शासन के बीच होने वाले विवाद सीधे कोर्ट जाते थे। कई बार ठेकेदार अदालत से स्टे ले आते थे और विकास कार्य सालों तक अटक जाते थे। अब दो साल की डेडलाइन में न केवल मामला सुलझेगा, बल्कि निर्माण कार्यों पर भी रोक न लगे, इसके लिए इंटरिम ऑर्डर जारी होंगे और किसी अन्य ठेकेदार से काम करवा लिया जाएगा। सरकार को ऐसी भी शिकायतें मिली थीं कि ट्रिब्यूनल में सुनवाई के बाद फैसला आने में पांच साल तक का समय लग जाता है। यही वजह रही कि निपटारे की डेडलाइन भी घटाकर दो साल तय कर दी गई। ट्रिब्यूनल के सदस्यों और चेयरमैन का पांच साल लंबा कार्यकाल भी बाधा बन रहा था, क्योंकि वे एक ही पद और स्थान पर पदस्थ रहते थे। अब उनकी सेवा अवधि को भी घटाया गया है।

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