नर्सिंग के हजारों छात्रों का भविष्य अधर में

नर्सिंग
  • फर्जीवाड़े और कानूनी पेचीदगियों ने बिगाड़ा खेल

गौरव चौहान/भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र्रमें नर्सिंग कॉलेजों के फर्जीवाड़े और कानूनी पेचीदगियों के कारण हजारों छात्रों का भविष्य फिर से अधर में लटक गया है, और शैक्षणिक सत्र 2026 में भी देरी के कारण उनका एक और साल पिछड़ रहा है। हाई कोर्ट के आदेशों और सीबीआई जांच के बीच, सत्र 2021-22 और उसके बाद के छात्रों की परीक्षाएं और परिणाम अटके हुए हैं। हालांकि हाल ही में इंडियन नर्सिंग काउंसिल (आईएनसी) ने स्टेट नर्सिंग काउंसिल को सत्र 2026-27 के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश जारी कर दिए हैं। आईएनसी के अनुसार बीएससी नर्सिंग में प्रवेश के लिए मध्यप्रदेश व अन्य राज्यों को 15 जून 2026 से पहले एंट्रेंस परीक्षा करानी है। प्रवेश की अंतिम तिथि 30 सितंबर है और कक्षाएं 1 अगस्त से शुरू होंगी।
दरअसल, मप्र में बेपटरी नर्सिंग शिक्षा को ट्रैक पर लाने की सरकार की कोशिश सफल नहीं हो पाई है। साल 2023 में फर्जी कालेजों को मान्यता देने की गूंज हाई कोर्ट से लेकर सीबीआई जांच के कारण देशभर में रही। सरकार ने पिछड़ी शैक्षणिक व्यवस्थाएं सुचारू करने और नर्सिंग घोटाले के पुराने दाग मिटाने के लिए मेडिकल यूनिवर्सिटी के अंर्तगत संचालित हो रहे नर्सिंग कालेजों को 11 साल बाद सत्र 2025-26 से एक बार फिर उच्च शिक्षा विभाग के तहत पारंपरिक विश्वविद्यालयों में ले आई। लेकिन यहां भी हालात सुधर नहीं पाए हैं। संबद्धता शुल्क की खींचतान के चलते एक सत्र पिछड़ गया है और कॉलेजों ने विश्वविद्यालयों से संबद्धता नहीं ली और न ही प्रवेशरत छात्रों का एनरोलमेंट हो पाया है। वहीं अब नए सत्र में प्रवेश का समय आ गया है। इन हालातों के चलते हजारों छात्रों का भविष्य दाव पर लगा है और उच्च शिक्षा विभाग के एक आला अधिकारी का कहना है कि उन्हें इस संबंध में अभी कोई जानकारी नहीं है।
अब सीधे काउंसलिंग के माध्यम से प्रवेश के निर्देश
नर्सिंग घोटाला उजागर होने के बाद मध्य प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पिछले दो सत्रों से नर्सिंग के सभी पाठ्यक्रमों में एंट्रेंस परीक्षा के माध्यम से प्रवेश दिए जा रहे थे। हालांकि इसके चलते बीएससी और एमएससी में 60 से 70 प्रतिशत सीटें खाली रहीं, जबकि जीएनएम और पोस्ट बेसिक में 90 प्रतिशत तक सीटें नहीं भर सकीं। हाल ही में आईएनसी ने एमएससी, पोस्ट बीएससी और जीएनएम पाठ्यक्रमों में सीधे काउंसलिंग के माध्यम से प्रवेश के निर्देश जारी किए हैं। काउंसलिंग के माध्यम से सीधे प्रवेश होने से प्रवेश संख्या बढ़ेगी, लेकिन गुणवत्ता प्रभावित होगी। प्रदेश में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के परिक्षेत्र में 33 नर्सिंग कालेज, डीएविवि इंदौर के 25, रानी दुर्गावती विवि जबलपुर के 25, विक्रम विवि उज्जैन के 22 और जीवाजी विवि ग्वालियर के अंतर्गत 18 नर्सिंग कॉलेज हैं। एक ओर कालेजों को संबद्धता की जगह निरंतरता देने के विभाग के आदेश से विश्वविद्यालयों को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। अब कालेजों की मांग है कि वे विवि को प्रवेशित छात्र संख्या के अनुसार प्रति सीट शुल्क देंगें। इधर विवि अपने नियम के अनुरूप आवंटित सीट के अनुसार फीस की मांग रहे हैं। इस विवाद के चलते कालेज संबद्धता नहीं ले रहे हैं।  चेयरमेन मप्र नर्सिंग काउंसिल डॉ. बीनू सिंह का कहना है कि हम आईएनसी के निर्देश अनुसार सत्र 2026-27 के प्रवेश करेंगे। अब तक सत्र 25-26 के लिए कालेजों की निरंतरता नहीं हुई है, इसके लिए उच्च शिक्षा विभाग को मार्च से अब तक तीन रिमांइडर लेटर लिख चुके हैं।
नर्सिंग शिक्षा माफिया की मनमानी चल रही
व्हीसल ब्लोअर रवि परमार का कहना है कि प्रदेश में नर्सिंग शिक्षा माफिया की मनमानी चल रही है, जिम्मेदार मौन या निष्क्रिय हैं। इसका खामियाजा प्रदेश के भोले-भाले छात्र-छात्राएं और उनके परिजन भुगत रहे हैं, उनके भविष्य के साथ लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है। 2022-23 सत्र के छात्र अभी द्वितीय वर्ष तक ही पहुंच पाए हैं, जबकि उन्हें अब तक अंतिम वर्ष में होना था। 2020-21 सत्र के परिणाम और परीक्षाएं अब तक लंबित हैं। घोटाले के चलते सत्र 2023-24 को शून्य घोषित किया जा चुका है। वहीं मेडिकल युनिवर्सिटी के अंर्तगत 2024-25 की पहले सेमेस्टर की परीक्षा हाल ही में हुई है, जबकि अभी इन छात्रों को चौथे सेमेस्टर में होना था। इधर, 2025-26 से कॉलेज उच्च शिक्षा विभाग में जुड़ गए हैं, लेकिन अब तक विश्वविद्यालयों से संबद्धता नहीं ली। ऐसे में यह सत्र भी पिछड़ चुका है। अब आईएनसी के निर्देश पर मप्र नर्सिंग काउंसिल नए सत्र 2026-27 में प्रवेश प्रक्रिया की शुरुआत करेगा, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग के स्पष्ट दिशा-निंदेश के अभाव में नर्सिंग शिक्षा व्यवस्था में असमंजस और गहराने की आशंका है। 2015 से पहले उच्च शिक्षा के अधीन रहे नर्सिंग कॉलेज की निरंतरता समाप्त हो गई थी। 11 साल बाद इन्हें नवीन मानते हुए विभाग ने एनओसी दी और इससे 4 करोड़ रुपये से अधिक शुल्क वसूला। बाद में कॉलेजों की मांग पर विश्वविद्यालयों को इन्हें निरंतर मानने का आदेश जारी कर दिया। यह मामला काफी चर्चा में रहा, यह सवाल भी उठा कि जब विभाग के लिए कॉलेज नए हैं, तो वही कालेज विश्वविद्यालयों के लिए पुराने कैसे हो गए।

Related Articles