
- पीएचक्यू ने जारी किया नया आदेश, सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान के बाद जागी पुलिस
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। वन व रेत माफियाओं और शिकारियों के खिलाफ मौके पर कार्रवाई के दौरान वनकर्मियों को अब अपनी चिंता करने की जरूरत नहीं है। जंगल या घटना स्थल पर जवाब के तौर पर लिये गए एक्शन का वन कर्मियों के कैरियर पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आरोपी चाहकर भी अव्वल तो वन अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ सीधी एफआईआर दर्ज नहीं करा सकेंगे, यदि पुलिस एफआईआर दर्ज भी कर लेती है तो वन कर्मियों की गिरफ्तारी अब आसान नहीं होगी। मैदानी पुलिस को वन कर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के लिए भी वरिष्ठ अधिकारियों से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में रेत माफियाओं द्वारा वन रक्षक हरकेश गुर्जर की ट्रैक्टर से कुचलकर की गई हत्या पर सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान लेने के बाद एमपी पुलिस जागी है। इस मामले में अदालत द्वारा चंबल अभयारण्य में बढ़ते अवैध रेत खनन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर लगाई फटकार के बाद पीएचक्यू के अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) ने वन विभाग के मैदानी अमले की सुरक्षा के लिए नए निर्देश जारी किए हैं। स्पेशल डीजी पंकज श्रीवास्तव द्वारा सभी एसपी और पुलिस कमिश्नरों को जारी आदेश के मुताबिक, अब ड्यूटी के दौरान वन रक्षकों, वनपालों और उप वन क्षेत्रपालों पर किसी भी अपराध में एफआईआर दर्ज करने या अभियोजन चलाने से पहले राज्य सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि वन कर्मी बिना किसी डर के माफियाओं और शिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सके।
एफआईआर से पूर्व मंजूरी जरूरी
पीएचक्यू ने निर्देश में साफ किया है कि चंबल जैसे संवेदनशील इलाकों में अवैध खनन रोकने और वन्य प्राणियों के संरक्षण में लगे वन कर्मियों को बीएनएसएस 2023 की धारा 218 के तहत सुरक्षा दी जाएगी। यदि किसी वन कर्मी की गिरफ्तारी की नौबत आती है, तो भी पुलिस को बेहद सतर्कता बरतनी होगी। नए प्रावधानों के तहत अब किसी वन कर्मी को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा, जब तक पुलिस के पास पुख्ता विश्वास करने का कारण न हो। पुलिस को गिरफ्तारी का लिखित आधार भी बताना होगा, जिससे वन अमले को झूठे मुकदमों में फंसाए जाने का खतरा कम होगा। पीएचक्यू ने पुराने आदेशों का भी हवाला दिया है, जिसके तहत वन रक्षकों और उच्च अधिकारियों को आत्मरक्षा के लिए हथियार इस्तेमाल करने की छूट दी है। वनों और वन उपज की सुरक्षा के लिए तैनात कर्मचारी अब संबंधित वन मंडलाधिकारी की सिफारिश पर बंदूक के लाइसेंस ले सकेंगे। अवैध खनन रोकने या आत्मरक्षा में वन कर्मी गोली चलाते हैं, तो भी पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। ऐसे मामलों में पुलिस केवल तभी संज्ञान ले सकेगी जब कलेक्टर द्वारा कराई गई मजिस्ट्रियल जांच में यह साबित हो जाए कि हथियार का उपयोग अनावश्यक था।
8 अप्रैल की घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शुरू की सुनवाई
8 अप्रैल को मुरैना के दिमनी इलाके में हुई घटना ने देशभर में वन कर्मियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए थे। यहां रेत माफिया ने अवैध रेत से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली को रोकने की कोशिश कर रहे ड्यूटी पर तैनात वनकर्मी हरकेश गुर्जर की ट्रैक्टर से कुचलकर जान ले ली थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकारों को चेतावनी दी थी कि यदि चंबल में अवैध खनन नहीं रुका तो वहाँ अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी जाएगी। अदालत ने साफ शब्दों में कहा था कि अगर सरकार अपने अधिकारियों की रक्षा नहीं कर सकती, तो मशीनरी का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसके बाद पीएचक्यू ने यह नया सर्कुलर जारी किया है।
