- मप्र हाईकोर्ट अब 13 मई से लगातार तीन दिन करेगी अंतिम सुनवाई

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र में ओबीसी आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित प्रकरणों में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया अटक गई है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद आवश्यक रिकॉर्ड समय पर हाईकोर्ट में प्रस्तुत नहीं किए जा सके, जिसके चलते अंतिम सुनवाई नहीं हो पाई। अब मप्र हाईकोर्ट में इन मामलों पर अगली सुनवाई 13, 14 और 15 मई को होगी। सुनवाई टलने के साथ ही राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कांग्रेस ने सरकार पर जानबूझकर आरक्षण प्रक्रिया को रोकने और करोड़ों रुपये खर्च कर महंगे वकील खड़े करने का आरोप लगाया है, जबकि सरकार ने अपना पक्ष मजबूती से रखने की बात कही है। वहीं सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की पीठ को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट में दायर पांच याचिकाएं अभी हाईकोर्ट में ट्रांसफर नहीं हुई हैं। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित याचिकाओं के स्थानांतरण के बाद ही समग्र सुनवाई की जाएगी। ओबीसी आरक्षण से जुड़े कुल चार महत्वपूर्ण प्रकरणों की सुनवाई उस समय प्रभावित हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के 19 फरवरी 2026 के आदेश के बावजूद राज्य सरकार इन मामलों का रिकॉर्ड समय पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ट्रांसफर नहीं करा सकी। इसके चलते कोर्ट के पास पूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे और अंतिम सुनवाई टालनी पड़ी। स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट को मजबूरन नई तारीखें तय करनी पड़ीं। ओबीसी आरक्षण मामलों की सुनवाई को लेकर राज्य सरकार ने नई अधिसूचना जारी की है। सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने कोर्ट में सरकार का आदेश प्रस्तुत करते हुए बताया कि अब विशेष अधिवक्ता सरकार की ओर से ओबीसी वर्ग का पक्ष नहीं रखेंगे। सरकार ने अपनी ओर से नए वकीलों को नामित किया है।
हाईकोर्ट में 100 से अधिक याचिकाएं दायर
गौरतलब है कि वर्ष 2019 में दायर याचिकाओं में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने को चुनौती दी गई थी। इस मामले में पक्ष और विपक्ष में हाईकोर्ट में 100 से अधिक याचिकाएं दायर हैं। आरक्षण के विरोध में दायर याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के इंदिरा साहनी एवं मराठा आरक्षण मामलों में तय सीमा के अनुसार कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। वहीं, कुछ याचिकाओं में 87:13 फॉर्मूले और होल्ड पदों पर भी आपत्ति जताई गई है। दूसरी ओर, आरक्षण के समर्थन में दायर याचिकाओं में ओबीसी वर्ग को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की मांग की गई है। पूर्व में राज्य सरकार ने इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित कराया था, लेकिन 19 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने सभी याचिकाएं वापस हाईकोर्ट भेज दी थीं। फिलहाल, हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं को व्यवस्थित कर पक्ष और विपक्ष के अनुसार अलग-अलग सुनवाई की तैयारी के निर्देश दिए हैं। मामले में विपक्ष में वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी, सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराजन सहित कई विधि विशेषज्ञ पक्ष रख रहे हैं।
राजेन्द्र भारती मामले में अगली पेशी 29 जुलाई को
दतिया के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। भ्रष्टाचार के 25 साल पुराने मामले में 3 साल की सजा मिलने के बाद राहत की उम्मीद लगाए बैठे पूर्व विधायक को फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सजा पर सुनवाई के लिए अगली तारीख 29 जुलाई तय कर दी है। यह सुनवाई न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा की बेंच ने की। दरअसल, शिकायतकर्ता पक्ष नोटिस का जवाब नहीं दे पाया था। ऐसे में जवाब पेश नहीं होने की वजह से अदालत ने मामले को आगे बढ़ा दिया है। अब 29 जुलाई 2026 को मामले की सुनवाई होगी। इससे पहले भी मामले की सुनवाई 1 बार आगे बढ़ चुकी है। कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती का राजनीतिक करियर अदालत के फैसले पर टिका है, क्योंकि उन्हें भूमि विकास बैंक धोखाधड़ी मामले में 3 साल की सजा सुनाई गई है। जिसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो चुकी है। इस सजा के बाद ही उन्हें विधायकी गवानी पड़ी थी। निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए भारती ने हाई कोर्ट में अपील की थी और साथ ही सजा पर रोक व जमानत की मांग की थी। लेकिन कोर्ट ने तुरंत राहत देने से इनकार करते हुए सुनवाई जुलाई तक टाल दी। सजा मिलते ही भारती की विधायकी समाप्त कर दतिया सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया है और इसकी सूचना चुनाव आयोग को भेजी जा चुकी है। अब जबकि हाई कोर्ट से जुलाई तक राहत की कोई संभावना नहीं दिख रही, दतिया में उपचुनाव की आहट तेज हो गई है।
