प्रदेश में गड़बड़ाया बिजली उत्पादन का गणित

  • बैकिंग डाउन से 5194 मिलियन यूनिट का नुकसान

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र में बिजली की मांग में उतार-चढ़ाव के कारण बिजली की मांग कम होने पर संयंत्रों की उत्पादन क्षमता कम करनी पड़ रही है। वहीं सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन के दौरान थर्मल पावर प्लांटों को बैकिंग डाउन के लिए मजबूर होना पड़ता है। इस कारण मप्र के ताप विद्युत संयंत्रों में अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के दौरान, ग्रिड संतुलन और बिजली की मांग में कमी (बैकिंग डाउन) के कारण कुल 5194.5 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का नुकसान हुआ है।  गौरतलब है कि जब बिजली की मांग कम होती है या ग्रिड में अतिरिक्त बिजली होती है, तो संयंत्रों को अपनी पूरी क्षमता से कम पर चलाना पड़ता है, जिसे बैकिंग डाउन कहते हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से सामने आया है कि यदि बैंकिंग डाउन नहीं होता, तो राज्य में बिजली उत्पादन कहीं अधिक हो सकता था और कई महीनों में उत्पादन दोगुना तक पहुंच सकता था।
गौरतलब है कि मप्र में बिजली उत्पादन बढ़ रहा है। इसके साथ ही खपत भी बढ़ रही है। इसलिए बिजली कंपनियों के लिए निर्बाध बिजली सप्लाई देना चुनौती है। इसमें भी घरेलू उपभोक्ताओं के साथ किसानों को भी अलग से बिजली दिए जाने का लक्ष्य है। इसी समस्या से निपटने के लिए अब प्रदेश में बिजली की कमी को पूरा करने के लिए राज्य सरकार नवकरणीय ऊर्जा पर जोर दे रही है, जिससे बिजली की खपत और उत्पादन के बीच सामंजस्य बिठाया जा सके। इस कारण प्रदेश में नवकरणीय ऊर्जा में 10 गुना तक की बढ़ोत्तरी हुई है। इसमें सोलर एनर्जी 4096.98 मेगावॉट है। वहीं, पवन ऊर्जा 2870.35 मेगावॉट और बायोमास में 108 मेगावॉट और जल परियोजनाओं से उत्पादन होने वाली बिजली 123.91 मेगावॉट है। इस कारण प्रदेश के ताप विद्युत संयंत्रों में पिछले साल अप्रैल से इस साल जनवरी के बीच बैकिंग डाउन के कारण कुल 5194.5 एमयू बिजली का नुकसान हुआ।
10 माह में 5194 मिलियन यूनिट का नुकसान
मप्र पॉवर जनरेशन कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक 10 महीनों में वास्तविक कुल बिजली उत्पादन 22036.9 मिलियन यूनिट रहा, जबकि बैंकिंग डाउन जोडऩे पर कुल संभावित उत्पादन 27231.4 एमयू तक पहुंचता। यानी करीब 19 प्रतिशत उत्पादन केवल बैकिंग डाउन के कारण कम हो गया। सबसे ज्यादा असर अक्टूबर महीने में देखने को मिला। इस दौरान वास्तविक उत्पादन केवल 1596.5 एमयू रहा, जबकि बैकिंग डाउन 1572.5 मिलियन यूनिट था। यदि बीडी नहीं होता, तो कुल बिजली उत्पादन 3169.0 एमयू तक जा सकता था, यानी लगभग आधी क्षमता का उपयोग ही नहीं हो पाया। ऊर्जा विभाग के जानकारों का मानना है कि यदि मांग का सटीक आंकलन और नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर प्रबंधन किया जाए, तो बैकिंग डाउन को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बैकिंग डाउन केवल उत्पादन में कमी ही नहीं लाता, बल्कि इससे आर्थिक नुकसान भी होता है। प्लांट तैयार रहने के बावजूद बिजली नहीं बना पाना, फिक्स्ड कॉस्ट का बोझ बढ़ाता है। इसके अलावा बार-बार लोड कम-ज्यादा करने से मशीनों पर भी असर पड़ता है। हालांकि दिसंबर और जनवरी में बैकिंग डाउन घटकर क्रमश: 205.3 और 255.6 एमयू रह गया, जिससे उत्पादन में सुधार हुआ और जनवरी में कुल उत्पादन 2739.1 एमयू तक पहुंच गया। कुल मिलाकर, 10 महीनों में 5194.5 एमयू बैकिंग डाउन यह दर्शाता है कि प्रदेश में उत्पादन क्षमता तो पर्याप्त है, लेकिन मांग और सप्लाई के असंतुलन के कारण बड़ी मात्रा में संभावित बिजली उत्पादन का नुकसान हो रहा है।
हर महीने हो रहा कम उत्पादन
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार बैकिंग डाउन का मुख्य कारण कम मांग और सौर-पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का अधिक उत्पादन है। जब ग्रिड में बिजली की उपलब्धता जरूरत से ज्यादा हो जाती है, तो कोयला आधारित संयंत्रों को कम लोड पर चलाना पड़ता है या बंद करना पड़ता है। इस वजह से सितंबर में 1969.8 एमयू उत्पादन के मुकाबले 556.0 एमयू बैंकिंग डाउन रहा। जुलाई और अगस्त में भी क्रमश: 370.4 और 380.5 एमयू बीडी दर्ज किया गया, जिससे उत्पादन प्रभावित हुआ। जून महीने में 440.3 एमयू और मई के महीने में 279.9 एमयू बैंकिंग डाउन रहा। पावर प्लांट स्तर पर भी इसका असर साफ दिखा। कई यूनिट्स को कम लोड पर चलाना पड़ा, जबकि कुछ यूनिट्स लंबे समय तक बंद रहीं। उदाहरण के तौर पर, कुछ महीनों में एसजीपीटी और एसएसटीपीएस की इकाइयों का उत्पादन लगभग शून्य तक पहुंच गया।

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