न अधिकारी-कर्मचारी, बढ़ा योजनाओं का भार

  • मप्र में सरकारी विभागों के हाल-बेहाल…

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। बढ़ती जनसंख्या के मान से  सरकार नई-नई योजनाएं और परियोजनाएं शुरू कर रही है। लेकिन प्रदेश में ब्यूरोक्रेट्स से लेकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की भारी कमी है। इस कारण प्रदेश के सरकारी विभागों का हाल बेहाल है। विभागों में न पर्याप्त अधिकारी हैं, न कर्मचारी। इसका परिणाम यह हो रहा है कि न तो योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन हो पा रहा है और न ही जनता का काम समय पर हो रहा है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से सभी सरकारी 54 विभागों में आईएएस, आईपीएस, आईएफएस के साथ ही अन्य अधिकारियों-कर्मचारियों की कमी बनी हुई है।  प्रदेश में करीब डेढ़ लाख से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। इस कारण आम लोगों को समय पर सेवाएं नहीं मिल पा रही है … प्रशासनिक कामों की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है। अस्पतालों में डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ नहीं है।
कुछ विभागों में 40 प्रतिशत तक पद रिक्त
प्रदेश में एक तरफ सरकार बड़े-बड़े सरकारी भवन बन रही है। बड़ी-बड़ी मशीनें, उपकरण खरीदे जा रहे हैं परंतु आमजन की सहायता के लिए जरूरी मानव संसाधन की कमी बड़ा संकट है। कुछ विभागों में 40 प्रतिशत तक पद रिक्त हैं। कई जगह तो ऐसे अधिकारी-कर्मचारी ही नहीं हैं जिनका आमजन से सीधा सरोकार है। उदाहरण के रूप में वन विभाग को लें तो वनों में पेड़ों की अवैध कटाई रोकने और वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए बड़े दावे किए जाते हैं, पर सच्चाई यह है कि विभाग के पास पर्याप्त अमला ही नहीं है। आईएफएस कैडर के 296 पदों में से 185 ही कार्यरत हैं। राज्य वन सेवा के स्वीकृत पद 359 ही हैं। इनमें भी 142 ही कार्यरत हैं। वनरक्षक, वनपाल, डिप्टी रेंजर और रेंजर के मिलाकर 20,676 पदों में से 5,452 रिक्त हैं। यह हाल तब है जब टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मध्य प्रदेश में पिछले पांच वर्षों में 147 बाघों की मौत हुई है। इसमें 16 की मौत शिकार या करंट लगने से हुई है। कुछ ऐसी ही स्थिति दूसरे विभागों की भी है। राज्य सरकार ने पिछले साल 70 हजार पदों पर भर्ती की, इसके बाद भी डेढ़ लाख से अधिक पद रिक्त हैं। उनमें भी ओबीसी आरक्षण के चलते 10 हजार पदों पर नियुक्ति रुकी है तो पदोन्नति में आरक्षण के चलते कई विभागों में उच्च पदों पर प्रभारियों से काम चलाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कई विभागों में तो वर्षों से नए पद ही सृजित नहीं किए गए हैं, जबकि आवश्यकता बढ़ती जा रही है। जैसे पुलिस को लें तो नए थाने खुलने पर ही नए पद सृजित होते हैं। इसी तरह से स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञों के नए पद वर्ष 2011 के बाद सृजित नहीं हुए, जबकि तब से अब तक प्रदेश की आबादी में डेढ़ करोड़ की बढ़ोतरी हुई है।
कुछ विभागों में स्थिति चिंताजनक
प्रदेश के कुछ विभागों की स्थिति तो चिंताजनक है। जिला अस्पताल, सिविल अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों को पदस्थ किया जाता है। विशेषज्ञों के 5,443 पद स्वीकृत हैं पर पदस्थ मात्र 1,495 हैं। 3,948 रिक्त हैं। इस कारण सीजर डिलीवरी की सुविधा प्रदेश के 140 शासकीय अस्पतालों में ही मिल पा रही है। शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्य प्रदेश की देश में सबसे बुरी स्थिति है। प्रति हजार में 37 शिशुओं की एक वर्ष के भीतर मौत हो जाती है। चिकित्सा अधिकारियों के 6,513 पदों में से 2,689 खाली पड़े हैं। स्वास्थ्य विभाग देख रहे उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का कहना है कि सीधी भर्ती में जितने पदों के लिए विज्ञापन जारी होता है उसके एक तिहाई भी नहीं मिल पाते। मेडिकल कालेजों में फैकल्टी के 50 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। पुलिस विभाग 20 प्रतिशत पद रिक्त हैं। आरक्षकों के एक लाख 26 हजार पदों में से एक लाख ही पदस्थ हैं। बल की कमी के चलते जरूरत के अनुसार थाने और चौकियां नहीं खुल पा रही हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तीन वर्ष तक प्रतिवर्ष 7500 पदों पर भर्ती के निर्देश दिए हैं, जिसमें पहले वर्ष की भर्ती प्रक्रिया चल रही है। पुलिस में प्रतिवर्ष लगभग दो हजार कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं। नई भर्ती में भी करीब 10 प्रतिशत ज्वाइन नहीं करते। इस तरह पुलिस बल में वास्तविक वृद्धि विज्ञापित पदों में लगभग दो तिहाई की ही हो पा रही है।

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