मंदिर तोडक़र बनी मस्जिद

  • भोजशाला विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट से भूचाल

गौरव चौहान
भोजशाला विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट ने नया भूचाल ला दिया है। मप्र हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के आदेश के पालन में एएसआई ने 22 मार्च 2024 से भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद परिसर और उसके 50 मीटर परिधीय क्षेत्र में वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और उत्खनन किया। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप की गई और इस दौरान मौजूदा संरचना के स्वरूप को बदले बिना काम किया गया। जांच और उत्खनन के दौरान मिली सभी वस्तुओं का विधिवत दस्तावेजीकरण किया गया। इनमें शिलालेख, मूर्तियां, सिक्के, स्थापत्य अवशेष, मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा, पत्थर, धातु और कांच की वस्तुएं शामिल हैं। जो इस बात का प्रमाण दे रहे हैं कि भोजशाला में मंदिर और मठ था। इन्हें मुगल काल में ध्वस्त करके वहां स्थापित मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया था। इसकी गवाही परिसर में बनाई गई अब्दुल्ला शाह चंगाल के मकबरे के गेट पर लगा एक शिलालेख दे रहा है। यह शिलालेख 1436-1469 ई. तक मालवा सल्तनत के सुल्तान रहे खिलजी वंश के संस्थापक महमूद खिलजी का है। इस शिलालेख का उल्लेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में खंड चार के पृष्ठ संख्या 260 पर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस शिलालेख की 17वीं और 18वीं पंक्तियों में लिखा है कि यहां पहले एक प्राचीन धार्मिक मंदिर और शैक्षणिक केंद्र (मठ) मौजूद था। उस स्थल पर देवताओं की मूर्तियां थीं, जिन्हें नष्ट कर दिया गया और इस स्थान को मस्जिद व मजार में परिवर्तित कर दिया गया।
साल 1951 में प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष (राष्ट्रीय महत्व की घोषणा) अधिनियम के तहत भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया था। इसी वजह से पूरी जांच बेहद सावधानी से की गई ताकि मौजूदा ढांचे को कोई नुकसान न पहुंचे। ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) सर्वे आंगन में किया गया। इसमें तीन परतों वाली भू-आकृति का पता चला। पहली परत लगभग 1 मीटर मोटी है, जिसमें पत्थर की पट्टियों से बनी संरचनाएं हैं और स्पष्ट स्तरीकरण नहीं दिखता। दूसरी परत 4-5 मीटर तक फैली है और खंडित सामग्री से भरी है। तीसरी परत 5 मीटर से अधिक गहराई में है और इसे लगभग अक्षुण्ण आधार स्तर माना गया है, जहां सभी संरचनाएं स्थित हैं।
जांच में सामने आए चौकाने वाले तथ्य
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक सर्वेक्षण, उत्खनन, शिलालेखों के अध्ययन, मूर्तियों और स्थापत्य टुकड़ों की जांच के आधार पर कहा जा सकता है कि मौजूदा संरचना एक पूर्ववर्ती बेसाल्ट संरचना के ऊपर निर्मित है जिसका निचला हिस्सा आज भी आधार के रूप में मौजूद है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस स्थल पर वास्तुकला के तीन अलग-अलग चरण रहे। मौजूदा ढांचा तीसरे चरण का प्रतिनिधित्व करता है जो पहले के क्षतिग्रस्त ढांचे के ऊपर निर्मित है। उत्खनन में पक्की ईंटों से बनी संरचनाएं भी मिलीं। दक्षिण-पश्चिम कोने में खुदाई के दौरान सामने आई दीवारें बताती हैं कि शुरुआती संरचनाएं प्राकृतिक मिट्टी पर ईंटों से बनी थीं। मोटी और ऊंची दीवारें संकेत देती हैं कि यह संभवत: सार्वजनिक उपयोग की विशाल संरचना रही होगी। मुख्य संरचना के आसपास की संरचनाओं का स्तर समय-समय पर ऊंचा किया गया, जिससे संकेत मिलता है कि यह स्थल लंबे समय तक उपयोग में रहा। ठोस चबूतरे, मोटी ईंटों की दीवारें और फर्श सार्वजनिक उपयोग का संकेत देते हैं।
जगह-जगह मंदिर के प्रमाण
एएसआई ने सर्वे रिपोर्ट में शिलालेख पर फारसी में मुद्रित बातों का पक्षकारों की सुविधा के लिए अंग्रेजी और हिंदी में अनुवाद किया है। उसके अनुसार, खिलजी शासक महमूद शाह के शिलालेख की आयत 17-18, जो हिजरी वर्ष 859 (1455 ईस्वी) का है इसमें लिखा है- एक बहादुर व्यक्ति बड़ी सेना के साथ धर्म के केंद्र से इस पुराने आश्रम (मठ) में पहुंचा। उसने देवताओं की मूर्तियां तहस-नहस कर दीं और पूजने की जगह (मूर्तियों-मंदिर) को ताकत के बल पर नमाज पढऩे की जगह मस्जिद बना दिया। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, शिलालेख की लिखावट, परिसर में मिली मूर्तियों और वास्तुकला के अवशेष बताते हैं कि पत्थर की मूल संरचना को बाद में बदलकर मस्जिद बनाया गया। खंभों और स्तंभ खंड की कला से संकेत मिलता है कि ये पहले मंदिर का हिस्सा थे, जिन्हें बाद में मस्जिद निर्माण में पुन: उपयोग किया गया। खिड़की फ्रेम पर देवी-देवताओं की मूर्तियां अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में हैं। एक खंभे पर देवताओं की कटी-फटी आकृतियां हैं। भोजशाला का सच यही है कि इसके रूप को बदला गया। मंदिर को मस्जिद में बदलने के लिए इमारत को नुकसान पहुंचाया गया। यह कहना है सेवानिवृत अधिकारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, धार, डीके रिछारिया का।
दोनों पक्ष के अपने-अपने दावे

मामले में याचिकाकर्ता (मंदिर पक्ष) आशीष गोयल का कहना है कि शिलालेख इस बात की गवाही देता है कि यहां प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर मूर्तियों को नष्ट किया गया और बाद में मस्जिद में परिवर्तित किया गया। सर्वे का यह तथ्य भोजशाला को सरस्वती (वाग्देवी) मंदिर सिद्ध करने के पक्ष में महत्वपूर्ण साक्ष्य है। वहीं, कमाल मौलाना वेलफेयर कमेटी, धार के सदर अब्दुल समद (मस्जिद पक्ष) का तर्क है कि 1903 और 1904 में एएसआई के ही सर्वे में यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि यह स्थान मस्जिद है और उसकी संरचना भी मस्जिद जैसी ही है। अब नई सर्वे रिपोर्ट में तथ्य बदले नजर आ रहे हैं। हम कोर्ट में आपत्तियां दर्ज कराएंगे। इस बीच, लंदन के म्यूजियम में रखी वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति को भारत वापस लाने का मुद्दा गुरुवार को मध्य प्रदेश विधानसभा में उठा। विधायक प्रताप ग्रेवाल द्वारा लिखित सवाल में पूछा गया कि प्रतिमा को वापस लाने के लिए अब तक क्या प्रयास किए गए। इस पर प्रदेश के संस्कृति विभाग के राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने लिखित जवाब में बताया कि इस संबंध में लगातार पत्राचार जारी है। गौरतलब है कि वाग्देवी की प्रतिमा 1930 में अंग्रेज अपने साथ ले गए थे और यह प्रतिमा फिलहाल लंदन के म्यूजियम में रखी है। बता दें कि भोजशाला के सरस्वती (वाग्देवी) मंदिर बनाम मौला कमाल दरगाह मस्जिद विवाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में विचाराधीन है। 2024 में एएसआई द्वारा 98 दिन तक किए गए भोजशाला परिसर के वैज्ञानिक सर्वे की 2189 पृष्ठों की रिपोर्ट पर हाई कोर्ट ने मंदिर और मस्जिद पक्ष से आपत्तियां मांगी हैं। मामले में अगली सुनवाई 16 मार्च को प्रस्तावित है।

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