ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर मप्र!

ऊर्जा क्षेत्र
  • सौर ऊर्जा रेवोल्यूशन से कभी नहीं कटेगी बिजली

मप्र अब बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है। इसके लिए प्रदेश सरकार का फोकस स्वच्छ और हरित ऊर्जा पर है। सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र को लेकर जो कार्ययोजना बनाई है उसके अनुसार सौर ऊर्जा रेवोल्यूशन से प्रदेश में कभी बिजली नहीं कटेगी।

विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मप्र स्वच्छ और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में एक अग्रणी राज्य के रूप में उभर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लिए वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन और वर्ष 2070 तक नेट जीरो कार्बन फुटप्रिंट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। मप्र इस राष्ट्रीय संकल्प को साकार करने में पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ रहा है। प्रदेश ने बीते 12 वर्षों में नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 19 गुना वृद्धि की है। वर्तमान में मप्र की कुल ऊर्जा उत्पादन का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हरित ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त हो रहा है। यह अभूतपूर्व उपलब्धि राज्य की ऊर्जा नीति, तकनीकी नवाचारों और निवेशक-हितैषी दृष्टिकोण का परिणाम है। राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। मप्र अपनी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण देश के अग्रणी ऊर्जा सरप्लस राज्यों में शामिल है। राज्य की नीति स्वच्छ ऊर्जा-आत्मनिर्भर भारत के विजन को साकार कर रही है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मप्र को आत्मनिर्भर बनाने के मिशन पर काम कर रहे हैं। इस कड़ी में सरकार का फोकस बिजली उत्पादन पर है। सरकार के प्रयासों से प्रदेश बिजली ट्रांसमिशन में बड़ी क्रांति करने जा रहा है। अगर प्रदेश सरकार का यह प्रयोग सफल रहा तो, भविष्य में किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। 24 घंटे बिजली मिलने से किसानों को सिंचाई और दूसरी जरूरतों के लिए सस्ती बिजली मिल सकेगी। बिजली सब्सिडी घटाने में भी मदद मिलेगी। यानि शहरी से लेकर ग्रामीण क्षेत्र दिन-रात जगमगाएंगे, लोगों को कम दाम में 24 घंटे बिजली मिलेगी। इतना ही नहीं यह प्रयोग पर्यावरण के लिए भी बहुत असरदार होगा। प्रदेश ग्रीन एनर्जी का हब बन जाएगा। दरअसल, मप्र के मुरैना में देश का पहला सोलर प्लस स्टोरेज पावर प्लांट बनने जा रहा है। जो 880 मेगावाट प्रति घंटा की क्षमता का होगा। यह काम मप्र पावर ट्रांसमिशन कंपनी जबलपुर की देखरेख में चल रहा है। यह एक किस्म का बहुत बड़ा इनवर्टर है, जो दिन में सोलर पावर से बनी बिजली को बैटरी में स्टोर करेगा और रात में इसे सप्लाई करेगा। पावर ट्रांसमिशन के क्षेत्र में यह एक बड़ा क्रांतिकारी कदम है। इससे पहले दुनिया के सबसे बड़े संयंत्रों में से एक सोलर पावर प्लांट रीवा में लगाया गया है। जिसे रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड ने लगाया था। खास बात तो यह है कि रीवा सोलर प्लांट से दिल्ली मेट्रो रफ्तार भर रही है। देश में ऐसा पहली बार हुआ था, जब मेट्रो का संचालन सौर ऊर्जा से किया गया। बताया जा रहा है इस प्रोजेक्ट के लिए मुरैना जिले में 4300 हेक्टेयर जमीन चिन्हित की गई है। कैलारस और जौरा में कई गांवों में भूमि आवंटित की गई है। इसके साथ ही इस प्रोजेक्ट में 300 करोड़ का खर्च आएगा। अगर मप्र सरकार का यह प्लान सफल होता है, तो इससे मिलने वाली बिजली लगभग 2.50 पैसा प्रति किलो वाट प्रति घंटा मिलेगी। बिजली आज हमारे समाज की बुनियादी जरूरत है। बिना बिजली हम आज के जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकते। इलेक्टिसिटी की मांग लगातार बढ़ रही है। केवल मप्र के संदर्भ में बात की जाए तो बीते दिनों मप्र की बिजली कंपनियों ने लगभग 19 हजार मेगावाट बिजली की सप्लाई की। यह अब तक की सबसे अधिक बिजली सप्लाई है।

बिजली उत्पाद के स्रोत
मप्र में बिजली उत्पादन के तीन स्रोत हैं। पहला थर्मल पावरप्लांट, दूसरा जल विद्युत और तीसरा सोलर एनर्जी। बिजली परंपरागत तरीके से ताप विद्युत घर में पैदा की जाती है। मप्र में बिजली उत्पादन में ताप विद्युत घरों में कोयले का इस्तेमाल किया जाता है। मप्र पावर जेनरेटिंग कंपनी खुद भी बिजली बनाती है और बड़े पैमाने पर बिजली खरीदती भी है। अमरकंटक तापीय विद्युत संयंत्र अनूपपुर, सतपुड़ा तापीय विद्युत संयंत्र सारणी, चांदनी ताप विद्युत संयंत्र नेपानगर, विंध्याचल थर्मल पावर प्लांट सिंगरौली, संजय गांधी ताप विद्युत घर बिरसिंहपुर-उमरिया, सिंगाजी ताप विद्युत घर खंडवा, पेंच ताप विद्युत संयंत्र छिंदवाड़ा जैसे कुछ बड़े बिजली संयंत्र हैं। वहीं कुछ छोटे बिजली संयंत्र भी हैं। जो मुख्य रूप से कोयले को जलाकर बिजली बना रहे हैं। बहुत छोटे पैमाने पर गैस आधारित बिजली संयंत्र बनाए गए हैं। थर्मल पावर प्लांट को चलाने में जीवाश्म ईंधन की जरूरत होती है। मप्र के संदर्भ में कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट केवल तभी तक चलाए जा सकते हैं, जब तक की कोयला उपलब्ध है। जिस दिन खदानों से कोयला खत्म हो जाएगा, तो इन पावर प्लांट से बिजली उत्पादन नहीं किया जा सकता। बिजली का दूसरा स्त्रोत बांध से निकलने वाले पानी से चलने वाले विद्युत संयंत्र है। मप्र में बरगी बांध, इंदिरा सागर, बाणसागर, पेंच, रिहंद, ओंकारेश्वर, टैंस, महेश्वर जैसे बांधों से बिजली बनाई जा रही है। इसके साथ कुछ ऐसे बांध भी हैं, जिनके साथ बनी बिजली हमें उत्तर प्रदेश और राजस्थान के साथ बंटनी पड़ती है। लेकिन जल विद्युत एक सीमा से ज्यादा बड़ा नहीं किया जा सकता, क्योंकि बड़े बांधों का अक्सर विरोध होता है और बड़े बांधों को पर्यावरणीय खतरे के रूप में भी देखा जाता है। बांध बनाना बहुत खर्चीला काम भी है। इस समय सबसे ज्यादा चर्चा सौर ऊर्जा पर है, क्योंकि सौर ऊर्जा कभी खत्म होने वाली नहीं है, इसके विस्तार करने की भी खूब संभावना है। थर्मल पावर और जल विद्युत से इसका उत्पादन सस्ता और सरल भी है। इसलिए मप्र पावर जेनरेशन कंपनी ने सौर ऊर्जा के कई संयंत्र स्थापित किए हैं और आगे करने जा रहे हैं। फिलहाल मप्र में रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्लांट, ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर प्लांट और विदिशा के सांची का सोलर प्लांट स्थापित किया है। मप्र पावर ट्रांसमिशन कंपनी के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हितेश तिवारी का कहना है कि मप्र सोलर पावर के मामले में तेजी से आगे बढ़ रहा है और वर्तमान में हमारा उत्पादन 4000 मेगावाट तक पहुंच गया है। हितेश तिवारी ने बताया कि सोलर पावर प्लांट में बिजली का उत्पादन दिन में होता है और दिन में बिजली की उतनी अधिक खपत नहीं होती। बिजली की ज्यादा खपत रात में होती है और रात में सोलर प्लांट का बिजली उत्पादन बंद हो जाता है। कुछ ऐसा ही हाल पवन चक्की के साथ भी है। पवन चक्की केवल तभी उत्पादन देती है, जब हवा तेज चलती है। ऐसी स्थिति में यह तय नहीं है कि पवन चक्की की बिजली कब बनेगी और कब नहीं बनेगी।
उन्होंने बताया कि यह एक बड़ी समस्या थी, लेकिन दुनिया में कई जगह इस समस्या का समाधान निकाल लिया गया है। इस दिशा में मप्र पावर ट्रांसमिशन कंपनी ने भी एक कदम आगे बढ़ाया है। सरकारी कंपनी एमपीएनआरईडी और एमपी पावर ट्रांसमिशन कंपनी मुरैना में 880 मेगावाट प्रति घंटा क्षमता का बैटरी एनर्जी स्टोर सिस्टम लगाने जा रही है। हितेश तिवारी का कहना है कि इस सिस्टम के लग जाने के बाद सौर ऊर्जा से बनी बिजली को बैटरी में जमा कर लिया जाएगा। रात में जब इसकी जरूरत होगी, तब इसे सप्लाई कर दिया जाएगा। 880 मेगावाट की क्षमता किसी एक बड़े शहर को बिजली देने के लिए पर्याप्त है। फिलहाल छत्तीसगढ़ में ऐसा ही एक प्लांट चल रहा है, लेकिन उसकी क्षमता मात्र 100 मेगावाट की है। मप्र बहुत बड़ी बैटरियों के साथ 880 मेगावाट की क्षमता वाला प्लांट लगा रहा है। इस प्लांट में बहुत बड़ी-बड़ी बैटरियां होगी। केंद्र सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 2030 तक लगभग 400 गीगाबाइट प्रति घंटा के स्टोरेज सिस्टम डेवलप करने हैं। हितेश तिवारी का कहना है कि सोलर ऊर्जा और पवन चक्की से मिलने वाली ऊर्जा बिजली उत्पादन का स्थाई विकल्प है। अभी तक इन ऊर्जा स्रोतों की ऊर्जा को छोटे पैमाने पर स्टोर किया जाता था, लेकिन बैटरी एनर्जी स्टोर सिस्टम इन्हें बड़े पैमाने पर स्टोर करेगा। जब जरूरत होगी, तब इसे सप्लाई के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। बिजली स्टोर का यह तरीका एक क्रांतिकारी कदम है। हितेश तिवारी ने सोलर पावर को ग्रिड में कैसे सप्लाई किया जाता है, इस मामले में शोध भी किया है, क्योंकि जब बड़े पैमाने पर सोलर पावर प्लांट में बिजली बनती है तो उसका युक्ति पूर्ण इस्तेमाल भी बहुत जरूरी है। उनका शोध पत्र पर कई राज्यों के पावर ट्रांसमिशन कंपनी अध्ययन कर रही हैं। वहीं इस प्रयोग को लेकर शहरी क्षेत्र जबलपुर के शिवनगर में रहने वाले अखिलेश त्रिपाठी का कहना है कि महंगी बिजली आम आदमी का बजट बिगाड़ देती है। हमने अक्सर सुना है कि कोयले के दाम बढ़ाने की वजह से बिजली के दाम बढ़ा दिए जाते हैं। कम से कम सोलर एनर्जी में यह समस्या नहीं होगी और एक ही दाम पर बिजली मिलती रहेगी। इससे शहरी आबादी को सस्ती बिजली उपलब्ध हो सकेगी। पर्यावरणविद् संजीव पांडे का कहना है कि कोयला गैस और परमाणु ऊर्जा के जरिए जो बिजली बनाई जा रही है। उससे कई पर्यावरणीय संकट खड़े हो रहे हैं। खदानों की वजह से जंगल नष्ट होते हैं और कोयला जलाने से वायु प्रदूषण होता है। दूसरी तरफ परमाणु बिजली घर खतरनाक माने जाते हैं। इसलिए सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करके बिजली बनाना पर्यावरण की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका है। इसका इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा किया जाना चाहिए, क्योंकि बिजली के साथ-साथ पर्यावरण को ठीक रखना भी हमारी जिम्मेदारी है। सरकार को ज्यादा से ज्यादा ऐसे विकल्पों पर ही काम करना चाहिए। जिनमें प्रकृति का नुकसान कम से कम हो। छोटे पैमाने पर यह प्रयोग उन घरों में होता है, जिनके छत पर सोलर सिस्टम लगा हुआ है, लेकिन अब यह घर से निकलकर शहरों तक पहुंच गया है। बिजली की प्लानिंग करने वाले अधिकारियों का कहना है कि वह दिन दूर नहीं, जब हम अपनी जरूरत की पूरी बिजली गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से बनाएंगे और उसे स्टोर भी कर पाएंगे। यह कम खर्चीला तो है, लेकिन बिजली की समस्या का यह स्थाई निदान है।

बैटरी स्टोरेज सिस्टम से सस्ती बिजली
मप्र बिजली ट्रांसमिशन में बड़ी क्रांति करने जा रहा है। अगर प्रदेश सरकार का यह प्रयोग सफल रहा तो, भविष्य में किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। 24 घंटे बिजली मिलने से किसानों को सिंचाई और दूसरी जरूरतों के लिए सस्ती बिजली मिल सकेगी। बिजली सब्सिडी घटाने में भी मदद मिलेगी। यानि शहरी से लेकर ग्रामीण क्षेत्र दिन-रात जगमगाएंगे, लोगों को कम दाम में 24 घंटे बिजली मिलेगी। इतना ही नहीं यह प्रयोग पर्यावरण के लिए भी बहुत असरदार होगा। प्रदेश ग्रीन एनर्जी का हब बन जाएगा। मप्र में सौर और पवन जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बनने वाली बिजली को अब सुरक्षित रखकर जरूरत के समय इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके लिए राज्य में बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली की बड़ी परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं। दरअसल, मप्र में बिजली व्यवस्था को मजबूत बनाने और सौर ऊर्जा का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं। राज्य में कुल 750 मेगावॉट क्षमता की बैटरी स्टोरेज परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी, जिनसे करीब 3900 करोड़ का निवेश आने की संभावना है। इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य यह है कि जब सौर ऊर्जा उपलब्ध न ही जैसे सुबह-शाम के पीक समय या रात में-तब भी बिजली की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इससे बिजली कटौती कम होगी और ग्रिड की स्थिरता बढ़ेगी। परियोजना के लिए राज्य के चार प्रमुख हाई वोल्टेज सबस्टेशनों का चयन किया गया है। इनमें बिरसिंहपुर (पाली), बीना, सेंधवा और राजगढ़-ब्यावरा शामिल हैं। इन सभी स्थानों पर 220 केवी स्तर पर बैटरी स्टोरेज सिस्टम स्थापित किए जाएंगे, ताकि पूरे प्रदेश में संतुलित तरीके से बिजली आपूर्ति की जा सके।
परियोजना के तहत डेवलपर्स सौर ऊर्जा से बैटरियों को चार्ज करेंगे और जरूरत के समय बिजली ग्रिड में देंगे। इससे पीक डिमांड के दौरान महंगी थर्मल बिजली पर निर्भरता कम होगी। अधिकारियों के अनुसार, यह कदम बिजली लागत को नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण साबित होगा। इस पूरी योजना का क्रियान्वयन पॉवर मैनेजमेंट कंपनी द्वारा किया जा रहा है, जो राज्य में बिजली खरीदने वाली मुख्य एजेंसी है। कंपनी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कई सुविधाएं भी दे रही है, जैसे भूमि उपलब्ध कराना और ग्रिड से चार्जिग के लिए व्यवस्था करना। मप्र में इस तरह की बड़ी परियोजनाएं शुरू होना ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं से न सिर्फ बिजली व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि बड़े पैमाने पर निवेश और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। आने वाले वर्षों में राज्य को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। मध्य प्रदेश में प्रस्तावित बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम परियोजनाओं के लिए विस्तृत तकनीकी, सुरक्षा और संचालन संबंधी मानक निर्धारित किए गए हैं। इन निर्देशों का उद्देश्य ग्रिड की विश्वसनीयता बढ़ाना, बिजली की गुणवता सुधारना और बैटरी आधारित ऊजार्जभडारण प्रणाली को सुरक्षित एवं टिकाऊ बनाना है। इन नियमों के तहत डेवलपर्स को सुरक्षा, परीक्षण, मॉनिटरिंग और पर्यावरणीय प्रबंधन से जुड़े कई अनिवार्य प्रावधानों का पालन करना होगा। बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली एक ऐसी व्यवस्था होती है जिसमें बिजली को स्टोर किया जा सकता है। जैसे दिन में जब सौर प्लांट से ज्यादा बिजली बनती है, तो उसे सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इस अतिरिक्त बिजली को बैटरी में जमा कर लिया जाता है, ताकि रात में या मांग बढऩे पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। इससे ग्रिड में संतुलन बना रहता है और बिजली की लगातार आपूर्ति हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बैटरी स्टोरेज भविष्य की ऊर्जा प्रणाली का अहम हिस्सा है। इससे न केवल बिजली की विश्वसनीयता बढ़ती है बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग भी अधिक प्रभावी हो जाता है। राज्य में चार हाईवोल्टेज सबस्टेशनों पर वे परियोजनाएं लगेगी – बिरसिंहपुर (पाली) सबस्टेशन बीना सबस्टेशन सेंधवा सबस्टेशन और राजगढ़-ब्यावरा सबस्टेशन में यह प्रोजेक्ट लयए जाएंगे। इन परियोजनाओं से 24 घंटे स्थिर बिजली आपूर्ति संभव होगी। सौर ऊर्जा का बेहतर उपयोग होगा, बिजली कटौती में कमी आएगी, राज्य में लगभग 3900 करोड़ रुपये का निवेश आएगा और रोजगार व उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा।

4100 मेगावॉट बिजली खरीदेगी कंपनी
बिजली उत्पादन में सरप्लस राज्य माने जाने वाले मप्र को लेकर एक नई चिंता उभर रही है। 2029 के बाद बिजली की कमी की आशंका जताई गई है। इसी के मद्देनजर मप्र विद्युत विनियामक आयोग (मप्रईआरसी) ने 4100 मेगावाट नई बिजली व्यवस्था की तैयारी शुरू कर दी है। इसमें से 3200 मेगावाट के थर्मल प्लांट और 900 मेगावाट की खरीद की योजना बनाई गई है। प्रदेश में औद्योगिक उत्पादन में तेजी, शहरीकरण, ग्रामीण विद्युतीकरण योजनाओं के विस्तार और बढ़ते कृषि पंप कनेक्शनों के चलते बिजली की खपत में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज हो रही है। सीईए की रिपोर्ट बताती है कि अगले तीन वर्षों में मप्र में औसत बिजली मांग 8-10 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ सकती है। उद्योगों में निवेश, नए औद्योगिक क्षेत्र, आईटी और डेटा सेंटर प्रोजेक्ट, मेट्रो रेल और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट जैसे बड़े बुनियादी ढांचा कार्यों के लिए बिजली की भारी खपत होगी। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू बिजली कनेक्शनों की संख्या में तेजी से इजाफा होने से भी मांग का ग्राफ ऊपर जाएगा। जानकारी के अनुसाी, मप्र विद्युत विनियामक आयोग (मप्रईआरसी) ने राज्य की भविष्य की बिजली जरूरतों को देखते हुए बिजली खरीदी को मंजूरी दे दी है। प्रदेश में 3200 मेगावॉट बिजली नए पावर प्रोजेक्ट्स से और शेष 900 मेगावॉट पुराने पावर प्लांटों से खरीदी जाएगी। हालांकि 900 मेगावॉट की बिजली खरीदी के लिए विस्तृत विश्लेषण कर फिर से आवेदन करने को कहा गया गया है। नए पॉवर प्रोजेक्टों से 3200 मेगावॉट खरीदी की मंजूरी मिल चुकी है। नए और पुराने प्रोजेक्टों से 4100 मेगावॉट बिजली खरीदी जाएगी। यह खरीदी 25 साल की अवधि के पावर परचेज एग्रीमेंट के तहत होगी। प्रदेश में मप्र जनरेटिंक कंपनी के ताप विद्युत ग्रह से 5400 मेगावाट, मप्र जनरेटिंक कंपनी के जल विद्युत ग्रह से 921.58 मेगावाट, संयुक्त क्षेत्र के जल विद्युत गृह और अन्य से 2484.13 मेगावाट, केंद्रीय क्षेत्र के ताप विद्युत गृह 5251.74 मेगावाट, दामोदर घाटी विकास निगम के ताप विद्युत गृह 3401.5 मेगावाट, नवकरणीय ऊर्जा स्रोत 5171 मेगावाट बिजली मिलती है। इस तरह प्रदेश में कुल बिजली उत्पादन क्षमता 22730 मेगावाट की है। अभी प्रदेश में बिजली की डिमांड 14 से 15 हजार मेगावाट है। प्रदेश में वर्तमान में सरप्लास बिजली 8 से 9 हजार मेगावाट है।
आयोग के अनुसार, केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) की रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि वर्ष 2027-28 तक मप्र में बिजली की मांग में वृद्धि होगी। वर्तमान प्रदेश में बिजली की मांग 19,000 मेगावॉट के करीब पहुंच चुकी है, जो आने वाले वर्षों में 22,000 मेगावॉट के आसपास हो सकती है। इसको देखते हुए बिजली की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है। नए अनुबंध के तहत कोयला आधारित सुपरक्रिटिकल तकनीक वाले थर्मल पावर प्लांटों और कुछ अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं से बिजली ली जाएगी। 900 मेगावॉट क्षमता राज्य के पहले से चालू और सक्षम पुराने पावर स्टेशनों से मिलेगी, जिससे तत्काल जरूरत की आपूर्ति हो सकेगी। आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस मंजूरी का मतलब बिजली खरीदी की दर (टैरिफ) तय होना नहीं है। बिजली कंपनियों को इसके लिए अलग से टैरिफयाचिका दायर करनी होगी, जिसमें प्रस्तावित दरें, लागत का आधार, ईधन आपूर्ति समझौते और अन्य वित्तीय विवरण पेश किए जाएंगे। इसके बाद उपभोक्ताओं और हित धारकों से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए जाएंगे, फिर आयोग दरें तय करेगा। आयोग ने बिजली कंपनियों को यह भी निर्देश दिया है कि खरीदी के सभी अनुबंधों में ईंधन आपूर्ति की गारंटी, ट्रांसमिशन नेटवर्क क्लीयरेंस और पर्यावरण मंजूरी की शर्तें स्पष्ट रूप से शामिल हों। साथ ही, इन अनुबंधों की निगरानी समय-समय पर होगी, ताकि बिजली आपूर्ति और वित्तीय प्रभाव का आकलन किया जा सके। दरअसल मप्र में उद्योगों के विस्तार, घरेलू उपभोग में वृद्धि और गर्मियों के दौरान एसी लोड बढऩे से मांग में तेज उछाल आ रहा है। अगर समय पर नई क्षमता नहीं जोड़ी गई तो आने वाले वर्षों में पिक डिमांड के समय बिजली संकट की संभावना बढ़ जाएगी।

टोरेंट पॉवर मप्र में 22 हजार करोड़ का निवेश करेगी
प्रदेश में एनर्जी जेनरेशन के लिए शुरू राज्य सरकार की नीतियों के रिजल्ट आकार लेने लगे हैं। टोरेंट पॉवर और अडानी पॉवर कंपनियों ने अब ऊर्जा उत्पादन के लिए प्रदेश में काम करना शुरू कर दिया है। टोरेंट पॉवर कंपनी 22 हजार करोड़ और अडानी पॉवर कंपनी 10 हजार 500 करोड़ रुपए का निवेश मप्र में करेगी। इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 17 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। प्रदेश की अर्थव्यवस्था में बदलाव के साथ बिजली की मांग बढ़ रही है, विशेष रूप से बेस लोड पॉवर की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ऊर्जा अधोसंरचना में निवेश के लिए सरकार फोकस कर काम कर रही है। इन दोनों ही कम्पनियों द्वारा लगाए जाने वाले प्लांट्स के लिए कोयले की सप्लाई केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी। टोरेंट पॉवर 1600 मेगावॉट थर्मल प्रोजेक्ट के लिए प्रदेश में 22 हजार करोड़ रुपए का निवेश करेगी। टोरेंट पॉवर लिमिटेड को मप्र पॉवर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड से 1600 मेगावॉट के कोयला आधारित बिजली संयंत्र की स्थापना के लिए लेटर ऑफ अवार्ड दे दिया है। यह अहमदाबाद-स्थित समूह द्वारा बिजली क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा निवेश है। यह परियोजना ग्रीनफील्ड 2&800 मेगावॉट की अल्ट्रा-सुपर क्रिटिकल तकनीक पर आधारित होगी और इसे डिज़ाइन, निर्माण, वित्तपोषण, स्वामित्व और संचालन मॉडल के तहत विकसित किया जाएगा।
टोरेंट इस संयंत्र की पूरी क्षमता मप्र पावर मैनेजमेंट कम्पनी लिमिटेड को 25 साल की पॉवर परचेज एग्रीमेंट पॉवर परचेस एग्रीमेंट के तहत 5.829 रुपए प्रति यूनिट की दर से आपूर्ति करेगा। यह परियोजना पीपीए पर हस्ताक्षर होने के 72 महीनों के भीतर चालू होनी है। परियोजना लागत का लगभग 70 प्रतिशत ऋण के माध्यम से पूरा किया जाएगा। इस प्लांट के लिए कोयले का आवंटन मप्र पावर मैनेजमेंट कम्पनी द्वारा केंद्र सरकार की शक्ति नीति के अंतर्गत किया जाएगा। यह परियोजना अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल तकनीक पर आधारित होगी, जिससे पारंपरिक थर्मल यूनिट्स की तुलना में बेहतर दक्षता और कम उत्सर्जन मिलेगा। टोरेंट पॉवर का यह निवेश केंद्र सरकार के 2032 तक 80 गीगावॉट अतिरिक्त कोयला आधारित क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने में रोल प्ले करेगा। इससे ग्रिड को स्थिर करने के लिए आवश्यक बेसलोड क्षमता जुड़ेगी। इस परियोजना के निर्माण के दौरान 10 हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़ेंगे। अडानी पॉवर मप्र में 800 मेगावॉट का ताप विद्युत संयंत्र 10 हजार 500 करोड़ रुपए की लागत से विकसित कर मप्र को बिजली आपूर्ति करेगी। इस परियोजना के तहत 800 मेगावॉट की क्षमता वाला एक नया ताप विद्युत संयंत्र स्थापित किया जाएगा। यह प्लांट अनूपपुर जिले में लगेगा। प्लांट को 54 महीनों में चालू किया जाएगा। यह कदम प्रदेश की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करेगा। मप्र पॉवर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड अल्ट्रा-सुपर क्रिटिकल ताप विद्युत संयंत्र विकसित करने और उससे बिजली आपूर्ति के लिए लेटर ऑफ अवार्ड दे चुकी है। यह संयंत्र डिज़ाइन, निर्माण, वित्त, स्वामित्व और संचालन मॉडल के तहत स्थापित किया जाएगा। अनूपपुर प्लांट सस्ती और प्रतिस्पर्धात्मक दरों पर बिजली उपलब्ध कराने में भूमिका निभाएगा। इस प्लांट के लिए कोयले की सप्लाई भारत सरकार की शक्ति योजना के अंतर्गत मप्र को आवंटित की गई है। परियोजना निर्माण चरण में 7000 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा और चालू होने के बाद इसमें लगभग एक हजार स्थायी कर्मचारी कार्यरत होंगे।

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