
- गलत प्रमोशन वाले बचे, ईमानदारों पर टीईटी का बंधन
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। स्कूलों में पढ़ाने वाले वर्ग एक, दो, तीन, नियमित अध्यापक-शिक्षकों से लेकर व्याख्याता और राजपत्रित अधिकारी तक आए-दिन सडक़ों पर नजर क्यों आते हैं? सबसे ज्यादा आंदोलन-प्रदर्शन स्कूली शिक्षा का अमला ही क्यों करता है? इन सवालों का सटीक जवाब देने दो मामले ही काफी हैं। पात्रतानुसार 88 शिक्षक प्रधानाध्यापकों को आठ साल पहले ही व्याख्याता बन जाना था, पर अधिकारियों की गलती से सामान्य वर्ग के पदों पर अनुसूचित जाति के शिक्षकों को पदोन्नत कर दिया गया। गलत ढंग से पदोन्नत हुए शिक्षक तो व्याख्याता बनकर टीईटी से भी गए, लेकिन जिनका हक मारा गया वे पदोन्नत तो हुए नहीं, उल्टा अब परीक्षा की बाध्यता में फंस गए। यही हाल वर्ग तीन शिक्षकों के पद पर चयनित हुए 800 से ज्यादा अभ्यर्थियों का है। चयन होने के बाद भी ये सडक़ पर पड़े हैं तो वर्ग दो के शिक्षक पुराने नियमों पर भी भर्ती होकर नौकरी कर रहे हैं। लोक शिक्षण संचालनालय ने 17 सितंबर 2008 को हुई विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक में बड़ी संख्या में शिक्षक-प्रधानाध्यापकों को मापदंडों के आधार पर व्याख्याता पद पर पदोन्नत किया गया था। सूची जारी होते ही अधिकारियों की बड़ी गलती सामने आई, जिसमें अधिकारियों ने सामान्य वर्ग के पदों पर अनुसूचित जाति संवर्ग से संबंधित राजनीति शास्त्र के 84 और अर्थशास्त्र के 4 शिक्षकों को पदोन्नत कर दिया था। कुल पदोन्नति भी स्वीकृत पदों से दोगुना कर दी गई थीं। लापरवाही सामने आई तो आननफानन में पुनरीक्षित डीपीसी के आदेश जारी कर दिए। मगर शिक्षक लगातार मांग करते रहे, अगस्त 2009, जनवरी 2012 और दिसंबर 2014 में डीपीसी की बैठक के बाद भी इस गलती को नहीं सुधार गया। तीनों ही बैठकों में बड़ी संख्या में अन्य शिक्षक पदोन्नत कर व्याख्याता बना दिए गए। गलत ढंग से पदोन्नति देने वालों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। पदोन्नति से छूटे 88 शिक्षक-प्रधानाध्यापक आज भी संघर्ष ही कर रहे हैं।
हर छह माह में डीपीसी भी
इसी बीच सामान्य प्रशासन विभाग ने 2013 में आदेश जारी किया कि हुई हवा सभी विभाग हर छमाही में डीपीसी की बैठक कर पात्र लोक सेवकों को पदोन्नति प्रदान करें। मगर स्कूल शिक्षा विभाग ने इस आदेश को ही हवा में उड़ा दिया। बाकी पदों के लिए डीपीसी होती रही, विभाग और संचालनालय के अधिकारी, व्याख्याता से प्राचार्य पद पर पदोन्नति हो गई। मगर इन छूटे हुए शिक्षकों को व्याख्याता बनाने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। शिक्षकों ने दबाव बनाया तो लंबे समय बाद अक्टूबर 2015 में डीपीसी की बैठक आयोजित कर ली गई। इस बैठक में भी न तो 7 साल पहले लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर कोई कार्रर्वा की गई और न छूटे हुए शिक्षकों के नाम पदोन्नति सूची में शामिल किए गए। इतना ही नहीं, गलत ढंग से पदोन्नत हुए शिक्षकों के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। हर छह माह में डीपीसी की बैठक का मापदंड भी स्कूल शिक्षा विभाग में नहीं बन सका।
शिक्षकों के लिए हर पांच साल में पदोन्नति भी बेमानी
लोक शिक्षण संचालनालय में भी हर वर्ग के शिक्षकों के लिए हर पांच वर्ष में पदोन्नति का प्रावधान है। इसमें पांच साल की गोपनीय चरित्रावली आधार होती है। मगर यह नियम स्कूल शिक्षा विभाग में पूरी तरह से दम तोड़ चुका है। हजारों सहायक शिक्षक, शिक्षक, व्याख्याता जिस पद पर नियुक्त होते हैं उसी पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं। पूरे सेवाकाल में उन्हें एक भी पदोन्नति नहीं मिल पाती। समयमान वेतनमान भी बहुत से शिक्षकों को नहीं मिल पाता। हालांकि कमोन्नति से वेतनमान जरूर बढ़ जाता है। यही हालत पदोन्नति से छूटे 88 शिक्षकों की है। आठ साल से मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव में वे संघर्ष कर रहे हैं।
