- कर्जमाफी का अधूरा हिसाब:11 लाख किसान डिफाल्टर, किसान संघ ने मुख्यमंत्री के सामने रखा प्रस्ताव
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
कर्जमाफी की एक राजनीतिक घोषणा किसानों के लिए राहत के बजाय बैंकिंग व्यवस्था में स्थायी परेशानी बन गई। मध्य प्रदेश में कर्जमाफी योजना के कारण 11 लाख से अधिक किसान डिफाल्टर हो गए हैं। अब भारतीय किसान संघ ने इन किसानों को दोबारा नियमित श्रेणी में लाने का रास्ता सुझाया है। संघ ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मांग की है कि किसानों का ब्याज माफ किया जाए और मूलधन दो किश्तों में जमा कराया जाए। इससे किसानों पर एकमुश्त भुगतान का बोझ नहीं पड़ेगा और वे फिर से बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ सकेंगे।
मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठक में किसान संघ ने यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया। करीब दो घंटे चली बैठक में कृषि, राजस्व, वन और बिजली विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में 48 मांगों पर चर्चा हुई। किसान संघ के करीब 20 प्रतिनिधियों ने अपनी बात रखी। मुख्यमंत्री ने अधिकांश मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाया। डिफाल्टर किसानों के प्रस्ताव पर उन्होंने कहा कि इसे दिखवाया जाएगा कि क्या बेहतर किया जा सकता है।
कर्जमाफी से राहत मिली नहीं, डिफॉल्टर का दाग लग गया
किसान संघ का तर्क है कि कर्जमाफी योजना के कारण बड़ी संख्या में किसानों के ऋण खाते नियमित नहीं हो पाए। इसका असर उनकी आगे की ऋण पात्रता पर भी पड़ा। किसान संघ चाहता है कि सरकार बैंकों के साथ समन्वय कर ब्याज माफी का रास्ता निकाले और मूलधन की वसूली दो किश्तों में करे। इस प्रस्ताव के पीछे मकसद केवल बकाया वसूली नहीं, बल्कि किसानों को दोबारा नियमित कर्जदार बनाना है। यदि सरकार इस पर सहमत होती है तो बड़ी संख्या में किसानों को अगली फसल के लिए संस्थागत ऋण लेने में राहत मिल सकती है। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। बैठक में किसान संघ के नेताओं और कृषि विभाग के सचिव निशांत वरबड़े के बीच मंडियों में दस टन क्षमता के तौल कांटे लगाने को लेकर तीखी बातचीत हुई। किसान संघ के प्रतिनिधि कमल सिंह आंजना ने कहा कि छह महीने बीतने के बाद भी मंडियों में कांटे लगाने का काम पूरा नहीं हुआ है। निर्धारित 131 कांटों में से केवल 29 ही लगाए जा सके हैं। इस पर सचिव वरबड़े ने कहा कि कांटे लगाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने देरी का कारण पूछा और कहा कि फंड की कमी भी नहीं है। इसके बाद सचिव ने तीन महीने में टेंडर प्रक्रिया पूरी कर कांटे लगवाने की बात कही।
समर्थन मूल्य पर खरीदी नहीं होने का मुद्दा भी उठा
किसान संघ ने छतरपुर की मूंगफली और भिंड-मुरैना के बाजरे की समर्थन मूल्य पर खरीदी नहीं होने का मुद्दा उठाया। आंजना ने कृषि सचिव से कहा कि इस मामले में केवल देखने की बात नहीं होनी चाहिए, बल्कि किसानों की उपज की खरीदी सुनिश्चित करनी होगी। बैठक में कम वर्षा वाले जिलों में बोरवेल खनन पर रोक लगाने की मांग भी रखी गई। अधिकारियों ने इसे कलेक्टरों के स्तर का विषय बताया तो किसान प्रतिनिधियों ने कहा कि सरकार की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी होंगे तो कार्रवाई प्रभावी होगी।
भोपाल के बड़े तालाब और पश्चिमी बायपास पर भी चिंता
किसान संघ ने भोपाल के बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र का मुद्दा भी अलग से उठाया। संघ का कहना था कि जल संरक्षण और कैचमेंट की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर किसानों को नुकसान नहीं होना चाहिए। पश्चिमी बायपास परियोजना को लेकर भी किसान संघ ने स्पष्ट किया कि इसके निर्माण में किसानों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। गांवों की मूल पहचान और ग्रामीण स्वरूप को बनाए रखने पर भी जोर दिया गया। संघ ने कहा कि विकास परियोजनाओं के कारण गांवों को शहरी विस्तार में समेटने या किसानों की जमीन प्रभावित करने से बचाया जाना चाहिए।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाले पशुपालकों को अनुदान
बैठक में मुख्यमंत्री ने प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए गोपालन को आर्थिक सहयोग देने की बात कही। सरकार गौशालाओं का संचालन करने वाले ऐसे पशुपालकों को भी अनुदान का लाभ देने पर काम करेगी, जो प्राकृतिक खेती को मजबूत करने में योगदान देंगे। इसके लिए किसानों की सहकारी समितियों को गोपालन के लिए आर्थिक सहायता देने की पहल की जाएगी। मुख्यमंत्री का जोर खेती में गोवंश आधारित प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को प्रोत्साहित करने पर रहा।
48 मांगों पर चर्चा, अब फैसलों का इंतजार
बैठक में भारतीय किसान संघ की ओर से कमल सिंह आंजना, महेश चौधरी, गिरिजा देवी ठाकुर, चंद्रकांत गौर सहित विभिन्न प्रांतों के अध्यक्ष, संगठन मंत्री और प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य मौजूद रहे। बैठक में मुख्यमंत्री का सकारात्मक रुख किसानों के लिए उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन असली परीक्षा मांगों पर अमल की होगी। खासकर 11 लाख से अधिक डिफाल्टर किसानों के ब्याज माफी और मूलधन की दो किश्तों में वसूली का प्रस्ताव ऐसा मुद्दा है, जिस पर फैसले का सीधा असर प्रदेश के लाखों किसान परिवारों पर पड़ सकता है।
