
- महंगे दाम पर दवा खरीदने की मजबूरी
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। राजधानी के जयप्रकाश (जेपी) जिला अस्पताल में हीमोफीलिया मरीजों के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाले जीवनरक्षक हीमोफीलिया फैक्टर का स्टॉक पूरी तरह खत्म हो गया है। इससे अस्पताल पर निर्भर मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ गई है। कई मरीजों को इलाज के लिए दूसरे अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जबकि कुछ निजी मेडिकल स्टोर्स से महंगी कीमत पर दवा खरीदने को मजबूर हैं।
स्टॉक समाप्त होने से मरीजों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा
जेपी अस्पताल में प्रदेश के विभिन्न जिलों से हीमोफीलिया मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। अस्पताल में फैक्टर उपलब्ध रहने से मरीजों को समय पर उपचार मिल जाता था, लेकिन अब स्टॉक समाप्त होने से स्थिति गंभीर हो गई है। जिन मरीजों को अचानक ब्लीडिंग की समस्या होती है, उनके लिए तत्काल फैक्टर मिलना बेहद जरूरी होता है। ऐसे में दवा उपलब्ध नहीं होने से उनके स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है।
नियमित उपलब्धता है बेहद जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हीमोफीलिया के मरीजों के लिए फैक्टर की नियमित उपलब्धता बेहद जरूरी है। दवा में थोड़ी भी देरी मरीज की स्थिति को गंभीर बना सकती है। इसलिए अस्पतालों में इसका पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना आवश्यक है।
कई बार अचानक ब्लीडिंग की स्थिति से बढ़ा खतरा: हीमोफीलिया मरीजों को कई बार अचानक ब्लीडिंग की समस्या हो जाती है। ऐसी स्थिति में तुरंत फैक्टर इंजेक्शन देना जरूरी होता है, ताकि खून का बहना नियंत्रित किया जा सके। सरकारी अस्पतालों में दवा नहीं मिलने से मरीजों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। समय पर इलाज न मिलने से उनकी स्वास्थ्य स्थिति बिगडऩे की आशंका बढ़ रही है। खासकर ऐसे मरीज जिनके शरीर में फैक्टर की कमी ज्यादा है, उनके लिए यह स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। मरीजों के परिवारों का कहना है कि वे पहले सरकारी अस्पतालों से निशुल्क या कम लागत में उपचार की उम्मीद करते थे, लेकिन अब उन्हें निजी बाजार का सहारा लेना पड़ रहा है।
हीमोफीलिया एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी
हीमोफीलिया एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर में खून का थक्का सामान्य रूप से नहीं जमता। ऐसे में मामूली चोट लगने पर भी लंबे समय तक रक्तस्राव होता रहता है। कई बार बिना किसी बाहरी चोट के शरीर के अंदर भी ब्लीडिंग शुरू हो जाती है, जो मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इस बीमारी से पीडि़त लोगों को समय-समय पर क्लाटिंग फैक्टर इंजेक्शन देना आवश्यक होता है। यही दवा उनके लिए जीवनरक्षक का काम करती है।
निजी मेडिकल
स्टोर्स से महंगी दवा खरीदने की मजबूरी
निजी अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स से ला रहे मरीजों के परिजनों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में दवा नहीं मिलने के कारण उन्हें निजी अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स का सहारा लेना पड़ रहा है। वहां यह इंजेक्शन काफी महंगा मिलता है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। कई मरीज नियमित डोज भी नहीं ले पा रहे हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पडऩे की आशंका बढ़ गई है।
