53 जलाशयों में से केवल 14 में ही 90 फीसदी से ज्यादा जलस्तर

जलाशयों
  • वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट और एप्को की रिपोर्ट ने अतिक्रमण, शहरीकरण, सीवेज प्रदूषण और प्रशासनिक लापरवाही की खोली पोल

    भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में जलाशयों के तेजी से विलुप्त होने का मामला अब पर्यावरणीय संकट का रूप लेता जा रहा है। नदियों और तालाबों से समृद्ध माने जाने वाले मध्यप्रदेश में पिछले एक दशक में करीब 12 हजार से अधिक छोटे-बड़े जलाशय समाप्त हो चुके हैं। यानी हर साल औसतन 1200 जलाशय समाप्त हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अतिक्रमण, शहरीकरण, सीवेज प्रदूषण और प्रशासनिक लापरवाही इसके प्रमुख कारण हैं। जानकारी के मुताबिक वर्ष 2018-19 में प्रदेश में लगभग 20 हजार जलस्रोत और वेटलैंड चिन्हित किए गए थे, लेकिन वर्तमान में इनमें से करीब 40 प्रतिशत जलाशय अस्तित्व खो चुके हैं। कई स्थानों पर जलाशयों की जमीन पर अतिक्रमण हो गया, जबकि कुछ जगहों पर वे पूरी तरह सूख गए। इसका सीधा असर भूजल स्तर और नदियों के प्रवाह पर पड़ रहा है। हालत यह है कि आधे से ज्यादा जलाशय अतिक्रमण की चपेट में हैं, जबकि कई जलस्रोत प्रदूषण और गाद जमाव के कारण अपना अस्तित्व खो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में प्रदेश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
    वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश के 53 प्रमुख जलाशयों में से केवल 14 में ही 90 प्रतिशत से अधिक जल स्तर बचा हुआ है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि राज्य से निकलने वाली अधिकांश नदियां प्रदूषण, अवैध गतिविधियों और अतिक्रमण के कारण प्रभावित हो रही हैं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और गाद जमाव ने प्राकृतिक तालाबों और झीलों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। भोपाल की सारंगपानी झील और इंदौर की अन्नपूर्णा झील इसका बड़ा उदाहरण हैं। वर्षों से सीवेज और धार्मिक कचरे के कारण इन जलाशयों की स्थिति लगातार बिगड़ती गई है। धार जिले के मांडू क्षेत्र के कई ऐतिहासिक तालाब भी अब सूखकर लगभग समाप्त हो चुके हैं।
    एप्को की रिपोर्ट में गंभीर संकेत
    पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (एप्को) की रिपोर्ट ने भी प्रदेश के जलाशयों की बिगड़ती स्थिति पर चिंता जताई थी। रिपोर्ट में भोज-आद्र्रभूमि, बड़ी और छोटी झील में बढ़ते प्रदूषण तथा अनधिकृत सीवेज बहाव का उल्लेख किया गया था। वहीं इंदौर की सिरपुर झील सहित अन्य वेटलैंड क्षेत्रों में जलीय वनस्पतियों और जीवों के खत्म होने का खतरा भी सामने आया। विशेषज्ञों का कहना है कि जलाशयों के समाप्त होने का असर केवल पेयजल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे जैव विविधता, कृषि और भूजल स्तर पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा।
    कई जिलों में ‘गायब’ हो गए तालाब
    प्रदेश के कई जिलों में तालाबों के रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति में भारी अंतर सामने आया है। दमोह जिले में पहले 11 तालाब चिन्हित थे, लेकिन अब केवल 8 ही बचे हैं। कचौर तालाब, कैदी की तलैया और उमा मिस्त्री की तलैया पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं। इसी तरह रीवा जिले के पुखा मनीराम पंचायत में 25 लाख रुपए की लागत से बना तालाब रिकॉर्ड में दर्ज है, लेकिन मौके पर उसका कोई अस्तित्व नहीं है। अमलिया पंचायत में भी एक तालाब सरकारी दस्तावेजों में मौजूद है, लेकिन जमीन पर दिखाई नहीं देता। ग्रामीणों द्वारा कई बार तालाब चोरी होने की शिकायत तक दर्ज कराई जा चुकी है।
    अमृत सरोवर योजना से जगी उम्मीद
    केंद्र सरकार ने जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए मिशन अमृत सरोवर योजना शुरू की थी। इसके तहत प्रत्येक जिले में कम से कम 75 अमृत सरोवर विकसित करने का लक्ष्य तय किया गया था। हालांकि प्रदेश के सभी जिलों में यह योजना अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी। कई स्थानों पर केवल कागजी प्रगति के आरोप भी लगे। इसके बावजूद पिछले दो वर्षों में मध्यप्रदेश ने अमृत सरोवरों के जल क्षेत्र में 128 प्रतिशत वृद्धि दर्ज कर देश में पहला स्थान प्राप्त किया है। सरकार का दावा है कि इससे कई क्षेत्रों में भूजल स्तर सुधारने में मदद मिली है।
    श्रमदान से बचाए जा रहे जलाशय
    आदिवासी अंचलों में परंपरागत हलमा यानी सामूहिक श्रमदान के जरिए तालाबों और कुओं को पुनर्जीवित करने की पहल भी सफल रही है। विशेषकर झाबुआ जिले में ग्रामीणों ने श्रमदान से कई पुराने जलस्रोतों का जीर्णोद्धार किया है। राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत भी पिछले दो वर्षों में कई पुराने तालाबों और जलाशयों के संरक्षण का कार्य किया गया है। इसके सकारात्मक परिणाम कुछ क्षेत्रों में दिखाई देने लगे हैं और सूखती नदियों में फिर से जल प्रवाह शुरू हुआ है। पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष पांडेय के अनुसार प्रदेश के हजारों जलस्रोत खत्म हो चुके हैं और कई बड़े जलाशय अपना मूल स्वरूप खो रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जलाशयों के संरक्षण, अतिक्रमण हटाने और सीवेज नियंत्रण के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में जल संकट और गंभीर हो जाएगा।

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