अब सीवेज का पानी बनेगा कमाई का जरिया

पानी

– नगरीय निकाय उद्योगों और रेलवे को बेचेंगे पानी
– रोज निकल रहे 1639 एमएलडी ट्रीटेड पानी का होगा व्यावसायिक इस्तेमाल

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में अब सीवेज का पानी नगरीय निकायों की कमाई का नया जरिया बनेगा। घरों से निकलने वाले गंदे पानी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में साफ करने के बाद निकाय इसे उद्योगों, रेलवे और निर्माण कार्यों के लिए बेचेंगे। इससे एक ओर निकायों की आय बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर उद्योगों और अन्य कामों में भूजल तथा पेयजल का इस्तेमाल कम किया जा सकेगा। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने इसके लिए यूज्ड वाटर पॉलिसी तैयार की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 28 अक्टूबर को इंदौर में होने वाले अर्बन कॉन्क्लेव में इसे जारी करेंगे।
अभी प्रदेश के अधिकांश एसटीपी से निकलने वाले उपचारित पानी का इस्तेमाल मुख्य रूप से गार्डनिंग जैसे कामों में किया जा रहा है। नई नीति के तहत इस पानी का व्यावसायिक उपयोग बढ़ाया जाएगा। पहले चरण में एसटीपी के आसपास स्थित ऐसे उद्योगों और संस्थानों की पहचान होगी, जिन्हें पेयजल की गुणवत्ता वाला पानी नहीं, बल्कि सामान्य औद्योगिक उपयोग के लिए बड़ी मात्रा में पानी चाहिए। उद्योगों में मशीनों की कूलिंग और धुलाई, रेलवे में कोच व प्लेटफॉर्म की सफाई, निर्माण कार्य, सडक़ों की धुलाई और उद्यानों की सिंचाई में ट्रीटेड वाटर की आपूर्ति की जाएगी। इसके लिए नगरीय निकाय निर्धारित दरों पर पानी बेचेंगे। जरूरत के अनुसार निजी निवेशकों की भागीदारी भी ली जाएगी।
घरों तक भी पहुंचेगा सस्ता ट्रीटेड वाटर
नीति के अगले चरण में आवासीय क्षेत्रों में भी उपचारित पानी की आपूर्ति की व्यवस्था विकसित की जाएगी। घरों में फ्लश, गाडिय़ों की धुलाई और गार्डनिंग जैसे कामों के लिए इसकी आपूर्ति की जा सकेगी। इससे इन कामों में पेयजल के इस्तेमाल को कम करने में मदद मिलेगी। विभाग की योजना टर्शियरी एसटीपी स्थापित करने की भी है। इन संयंत्रों में पानी को अतिरिक्त स्तर पर उपचारित कर अधिक शुद्धता वाले उपयोग के लिए तैयार किया जाएगा। इन्हें सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर विकसित किया जाएगा। सरकार निवेशकों को जमीन आवंटन, निवेश में छूट और प्रोत्साहन देने की व्यवस्था करेगी। हालांकि, फूड और फार्मा उद्योगों को इस पानी की आपूर्ति नहीं की जाएगी।
सागर में शुरू हुआ प्रयोग, निकाय को होने लगी आय
यूज्ड वाटर के व्यावसायिक इस्तेमाल का प्रयोग सागर में शुरू किया जा चुका है। यहां एसटीपी से उद्योगों और रेलवे को उपचारित पानी दिया जा रहा है। विभाग के मुताबिक, इससे नगरीय निकाय की आय बढ़ी है। सागर के अनुभव के आधार पर अब प्रदेश के दूसरे नगरीय निकायों में भी इस व्यवस्था को लागू करने की तैयारी है। इस नीति का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि प्रदेश के कई शहरों में गर्मियों के दौरान पानी की मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ जाता है। खासतौर पर मालवा क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार होने के साथ जलस्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में उद्योगों को वैकल्पिक जलस्रोत उपलब्ध कराने से पेयजल और भूजल पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।
रोज 1639 एमएलडी पानी का हो रहा ट्रीटमेंट
प्रदेश में प्रतिदिन करीब 2666 मिलियन लीटर सीवेज निकलता है। एसटीपी के माध्यम से रोज लगभग 1639 एमएलडी पानी का उपचार किया जा रहा है, जबकि उपचारित पानी के उपयोग की मौजूदा क्षमता करीब 1117 एमएलडी बताई गई है। यानी ट्रीटमेंट के बाद उपलब्ध पानी का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि कई नालों को एसटीपी से नहीं जोड़ा जा सका है। सीवेज नेटवर्क का विस्तार होने और नालों को ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचाने की व्यवस्था पूरी होने पर उपचारित पानी की उपलब्धता और बढ़ सकती है। इसके लिए नगरीय विकास विभाग अमृत-2.0, स्वच्छ भारत मिशन और अर्बन डेवलपमेंट कंपनी के माध्यम से काम कर रहा है।
 पानी की बचत और निकायों की आय
नई नीति का उद्देश्य सीवेज को अपशिष्ट के बजाय उपयोगी संसाधन के रूप में विकसित करना है। यदि उद्योगों, रेलवे और निर्माण कार्यों में उपचारित पानी की नियमित मांग तैयार होती है, तो निकायों को इससे राजस्व मिलेगा और पेयजल आपूर्ति पर दबाव भी कम होगा। हालांकि, इसके लिए एसटीपी से उपभोक्ताओं तक पाइपलाइन, गुणवत्ता की निगरानी, नियमित आपूर्ति और उचित दरें तय करना अहम होगा। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के मुताबिक, प्रदेश में उपयोग किए गए पानी को दोबारा इस्तेमाल में लाने के लिए नीति तैयार की गई है। निजी निवेशकों की मदद से एसटीपी से निकलने वाले पानी को जरूरतमंद उद्यमों तक पहुंचाया जाएगा। इससे भूजल और पेयजल की बचत के साथ नगरीय निकायों की आय बढ़ाने का रास्ता खुलेगा।

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