
- नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में तेजी लाने के लिए सख्त नियम लागू
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है। इसके बावजुद सोलर और विंड एनर्जी के कई प्रोजेक्ट धीमी गति से चल रहे हैं। इसको देखते हुए मप्र विद्युत विनियामक आयोग ने नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में तेजी लाने के लिए सख्त नियम लागू किए हैं, जिसके तहत डिस्कॉम द्वारा लेटर ऑफ क्रेडिट जारी करने के 45 दिनों के भीतर बिजली उत्पादन शुरू करना अनिवार्य होगा। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी परियोजना को तकनीकी या अन्य कारणों से अधिक समय की आवश्यकता होती है, तो तीन महीने तक की अतिरिक्त अवधि एसएलडीसी/ आरएलडीसी द्वारा दी जा सकेगी, जबकि इससे अधिक विस्तार के लिए आयोग की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी। जानकारी के अनुसार, मप्र विद्युत विनियामक आयोग ने प्रदेश में रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए बिजली उत्पादन शुरू किए जाने की प्रक्रिया में बदलाव किया है। इसके तहत सोलर विंड एनर्जी सख्ती की गई है, जिससे इन प्रोजेक्ट से ज्यादा से ज्यादा बिजली उत्पादन किया जा सके। आयोग ने बिजली उत्पादन बढ़ाने इंफर्म पावर (प्रारंभिक बिजली उत्पादन) को लेकर नई समय-सीमा तय कर दी है।
अब 45 दिन में शुरू करना होगा बिजली उत्पादन
नए प्रावधानों के अनुसार अब रिन्यूएबल एनर्जी जनरेटिंग स्टेशन (सोलर, बिंड) और एनजी स्टोरेज सिस्टम (ईएसएस) को पहली बार बिड से जुडऩे के बाद अधिकतम 45 दिनों के भीतर नियमित संचालन की स्थिति में आना होगा। वहीं, अन्य पारंपरिक बिजलीघरों (जैसे थर्मल और हाइड्रो) के लिए इंफर्म पावर की अधिकतम अवधि एक वर्ष निर्धारित की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से रिन्यूएबल ऊर्जा परियोजनाओं में देरी की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा और परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से चालू करने का दबाव बढ़ेगा। इससे न केवल ग्रिड की विश्वसनीयता में सुधार होगा, बल्कि राज्य में स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को हासिल करने में भी तेजी आएगी। हालांकि, डेवलपर्स के सामने चुनौती यह रहेगी कि वे सीमित समय-सीमा के भीतर सभी तकनीकी परीक्षण, ग्रिड सिंक्रोनाइजेशन और वाणिज्यिक संचालन से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी करें। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव तेज, पारदर्शी और जवाबदेह ऊर्जा प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
बची बिजली बेच सकते हैं बिजलीघर
ट्रायल रन के नियमों में भी राहत दी गई है। पहले जहां लगातार 4 घंटे का सफल परीक्षण जरूरी था, अब इसे एक दिन में कुल 4 घंटे (क्यूम्युलेटिव) कर दिया गया है। खासकर जल विद्युत परियोजनाओं को राहत देते हुए कहा गया है कि यदि पानी की कमी के कारण पूरी क्षमता का परीक्षण संभव न हो, तो उपलब्ध जल स्तर पर परीक्षण के आधार पर भी कमर्शियल ऑपरेशन डेट (सीओडी) घोषित की जा सकेगी। बिजली बाजार से जुड़ा एक बड़ा फैसला लेते हुए आयोग ने कहा है कि सेक्शन 62 के तहत टैरिफ पाने वाले बिजलीघर अब बिना उपभोक्ता (डिस्कॉम) की अनुमति के भी अपनी बची हुई बिजली को डे-अहेड मार्केट में बेच सकेंगे। इससे जनरेटिंग कंपनियों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा, हालांकि इससे होने वाला लाभ पीपीए के अनुसार उपभोक्ता और कंपनी के बीच बांटा जाएगा। वहीं डाटा पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सभी इकाइयों के लिए ऑटोमैटिक मीटर रीडिंग अनिवार्य कर दी गई है। वहीं सोलर, विंड और स्टोरेज जैसे इन्वर्टर अधारित संसाधनों को रात में भी रिएक्टिव पावर सपोर्ट देने के लिए सक्षम रहना होगा, और इसके लिए उपयोग की गई बिजली को सिस्टम लॉस माना जाएगा, उसका अलग से शुल्क नहीं लिया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे रिन्यूएबल ऊर्जा को तेजी से जोडऩे और बिजली बाजार को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
