- राज्य निर्वाचन आयोग कर रहा तैयारी, महीनों की आचार संहिता से मिलेगी राहत
- गौरव चौहान

मध्यप्रदेश में 2027 में प्रस्तावित नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग चुनावी प्रक्रिया को कम समय में पूरा करने की तैयारी कर रहा है। आयोग का फोकस सिर्फ मतदान के चरण घटाने पर नहीं, बल्कि लंबे समय तक लागू रहने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास और सरकारी कामकाज पर पडऩे वाले असर को कम करने पर है। मौजूदा व्यवस्था में पंचायत चुनाव तीन चरणों और नगरीय निकाय चुनाव दो चरणों में कराए जाते हैं। इससे चुनावी प्रक्रिया लंबी खिंचती है और अलग-अलग चरणों के कारण आचार संहिता का प्रभाव भी लंबे समय तक बना रहता है। आयोग अब पंचायत चुनाव को एक चरण और नगरीय निकाय चुनाव को भी एक ही चरण में कराने की संभावनाओं पर काम कर रहा है।
राज्य निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूरे प्रदेश में एक साथ मतदान कराने की है। इसके लिए पर्याप्त ईवीएम, मतदान दल, सुरक्षा व्यवस्था और लॉजिस्टिक्स की उपलब्धता का आकलन किया जा रहा है। आयोग यह भी देख रहा है कि एक चरण में मतदान होने के बाद मतगणना और परिणाम की प्रक्रिया को किस तरह तेजी से पूरा किया जा सकता है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो चुनावी प्रक्रिया को मौजूदा व्यवस्था की तुलना में काफी कम समय में पूरा किया जा सकता है। इसी रणनीति को अंतिम रूप देने से पहले 16 और 17 सितंबर को रायपुर में अंतर-राज्यीय राज्य निर्वाचन आयुक्तों की बैठक प्रस्तावित है। इसमें मध्यप्रदेश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त भी शामिल होंगे। बैठक में दूसरे राज्यों में अपनाई जा रही चुनावी व्यवस्थाओं, ईवीएम प्रबंधन, एक चरण में मतदान कराने की तकनीकी क्षमता और कम चरणों में चुनाव पूरा करने के मॉडल पर चर्चा होगी। दूसरे राज्यों के अनुभवों के आधार पर मध्यप्रदेश में चुनावी प्रक्रिया को लेकर आगे की रणनीति तय की जा सकती है।
ईवीएम से लेकर लॉजिस्टिक्स तक सबसे बड़ी चुनौती
पूरे प्रदेश में एक ही चरण में निकाय चुनाव कराने के लिए पर्याप्त संख्या में ईवीएम उपलब्ध कराना सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू होगा। इसके अलावा मतदान दलों की तैनाती, सुरक्षा बल, परिवहन, स्ट्रांग रूम और मतगणना केंद्रों की व्यवस्था भी एक साथ करनी होगी। यानी चुनाव के चरण घटाने से प्रक्रिया छोटी जरूर होगी, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर एक ही समय में बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने की चुनौती बढ़ जाएगी।
अक्टूबर में उपचुनाव की भी तैयारी
इसी बीच नगरीय निकायों और पंचायतों में रिक्त पदों पर उपचुनाव कराने की तैयारी भी चल रही है। ये उपचुनाव अक्टूबर में कराए जाने की संभावना है। आगर मालवा जिले की सुसनेर नगर परिषद अध्यक्ष का पद 19 फरवरी 2026 से रिक्त है। इसके अलावा प्रदेश के 15 नगरीय निकायों में पार्षदों के कुल 85 पद रिक्त बताए गए हैं। 31 मार्च 2026 की स्थिति के अनुसार पंचायतों में भी जिला पंचायत सदस्य के 3, जनपद पंचायत सदस्य के 13, पंचों के 3753 और सरपंच के 74 पद रिक्त हैं। इन पदों पर भी उपचुनाव कराए जाने हैं।
लक्ष्य आचार संहिता की अवधि घटाना
आयोग की नई कवायद का सबसे बड़ा असर प्रशासनिक कामकाज पर पड़ सकता है। चुनाव कई चरणों में होने पर आचार संहिता का प्रभाव लंबे समय तक रहता है और नई योजनाओं, विकास कार्यों तथा सरकारी निर्णयों पर इसका असर पड़ता है। ऐसे में यदि 2027 के निकाय और पंचायत चुनाव कम चरणों में पूरे होते हैं तो सरकार और प्रशासन को चुनावी प्रक्रिया से जल्दी बाहर निकलकर सामान्य कामकाज पर लौटने का मौका मिलेगा। हालांकि अंतिम चुनाव कार्यक्रम, चरणों की संख्या और मतदान की तारीखों पर फैसला रायपुर बैठक सहित तकनीकी और प्रशासनिक आकलन के बाद ही होगा। फिलहाल आयोग का संकेत साफ है—2027 में चुनावी प्रक्रिया को छोटा और तेज करने की तैयारी है, ताकि आचार संहिता महीनों तक विकास कार्यों पर हावी न रहे।
चुनाव एक साथ हुए तो क्या होगा फायदा?
निकाय और पंचायत चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था लागू होती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा आदर्श आचार संहिता की अवधि कम होने के रूप में सामने आ सकता है।इसके अलावा प्रशासनिक मशीनरी को बार-बार चुनाव ड्यूटी में नहीं लगाना पड़ेगा। सुरक्षा बलों की तैनाती को बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकेगा। चुनाव सामग्री और संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल हो सकेगा। मतदान प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और तेज बनाया जा सकेगा। विकास कार्यों पर लंबे समय तक आचार संहिता का असर कम हो सकता है। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर बार-बार चुनावी जिम्मेदारियों का दबाव कम होगा।
प्रशासनिक और तकनीकी बदलाव की तैयारी
राज्य निर्वाचन आयोग चुनावों को एक साथ कराने की संभावनाओं को देखते हुए प्रशासनिक और तकनीकी व्यवस्था में बदलाव की तैयारी कर रहा है। इसके तहत चुनाव प्रबंधन, मतदान प्रक्रिया, कर्मचारियों की तैनाती और अन्य व्यवस्थाओं को एक साथ संचालित करने की क्षमता पर काम किया जा सकता है। एक साथ चुनाव कराने के लिए बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों, कर्मचारियों, सुरक्षा बलों और चुनाव सामग्री की आवश्यकता होगी। ऐसे में आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों चुनावों के लिए पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता और प्रभावी प्रबंधन की होगी।
विकास कार्यों पर कम पड़ेगा असर
राज्य निर्वाचन आयोग का मुख्य उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को इस तरह व्यवस्थित करना है कि विकास कार्य लंबे समय तक आचार संहिता के कारण प्रभावित न हों। यदि निकाय और पंचायत चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था सफल होती है, तो प्रदेश में चुनाव संबंधी गतिविधियों की कुल अवधि कम की जा सकती है। इससे प्रशासन को चुनाव के बाद विकास योजनाओं और सरकारी कार्यक्रमों पर तेजी से काम करने का अवसर मिलेगा। फिलहाल यह योजना तैयारी के स्तर पर है। चुनाव की तारीख, चरणों और एक साथ चुनाव कराने की अंतिम व्यवस्था को लेकर आधिकारिक निर्णय और विस्तृत कार्यक्रम बाद में सामने आएगा।
